Monday, 30 June 2025

जादुई चिराग नहीं है पत्रकारिता की डिग्री

अपने अभिभावकों की गाढ़ी कमाई से लाखों रुपए खर्च करने के बाद छात्रों के हाथ में जो पत्रकारिता की डिग्री आती है, उसके बारे में पत्रकारिता संस्थानों में समझाया जाता है कि यह डिग्री एक प्रकार का जादुई चिराग है। इसे घिसते यानी हासिल करते ही एक जिन्न आपके सामने प्रकट होगा और हाथ बांध कर कहेगा -क्या हुकुम है मेरे आका। फिर आप उससे सबसे बड़े मीडिया हाउस की नौकरी दिलाने को कहोगे और वह फौरन नियुक्ति पत्र आपके हाथ में थमा देगा। लेकिन ऐसा सच में होता नहीं है। पत्रकारिता की डिग्री न तो जादुई चिराग है और न ही जिन्न। यह तब-तक महज कागज का एक टुकड़ा है जब तक कि आप इसमें अपना एफर्ट्स नहीं डालते।

दरअसल पत्रकारिता की डिग्री आधार कार्ड की तरह है। जैसे आधार कार्ड आपके भारत का निवासी होने की पहचान है और यह बताता है कि आप आप हैं, ठीक वैसे ही पत्रकारिता की डिग्री इस बात की पहचान है कि आप पत्रकारिता के क्षेत्र से संबद्ध हैं। आप किसी अखबार में एंट्री पा सकते हैं लेकिन इसके लिए उस अखबार के गेट पर एंट्री से पहले अपनी चेकिंग करानी होगी ठीक वैसे ही जैसे हवाई अड्डे के गेट पर चेकिंग करानी होती है। हवाई अड्डे पर आपके सामान की पूरी जांच होती है। अखबारों के गेट पर यानी नियुक्ति से पहले आपको अपने सामान यानी अपनी हर तरह की क्षमताओं की चेकिंग करानी होगी। यहां आपकी जिन क्षमताओं की चेकिंग होगी, उनमें प्रमुख हैं -

- भाषा शुद्ध लिखने की क्षमता यानी आप हिंदी कितनी शुद्ध लिखते हैं 

- भाषा प्रवाह यानी तथ्यों को विस्तार से लिखने में आप कैसे हैं 

- अंग्रेजी कितना जानते-समझते हैं यानी अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करने में आप कितना माहिर हैं 

- सामान्य ज्ञान यानी देश-दुनिया में घट रही घटनाओं पर आपकी पकड़ कितनी है या नहीं है 

इन चीजों की चेकिंग होने और इसमें पास होने के बाद आपकी व्यक्तिगत तौर पर चेकिंग होगी यानी इंटरव्यू होगा। ठीक वैसे ही जैसे हवाई अड्डे पर सिक्योरिटी चेकिंग होती है। इंटरव्यू में जिन चीजों की चेकिंग होगी, उनमें प्रमुख हैं -

- आपकी पर्सनेलिटी, आपकी बॉडी लैंग्वेज और बात करने का आपका लहजा 

- आपका एटिट्यूड, जिम्मेवारियों के प्रति आपका एप्रोच और समस्याओं के समाधान के प्रति आपकी जवाबदेही 

- टीम वर्क को लेकर आपका रवैया और आपकी नेतृत्व क्षमता 

- अपने संस्थान के प्रति आपकी सोच

जिस तरह से हवाई अड्डे पर सिक्योरिटी चेकिंग के बाद आपको विमान में सवार होने की अनुमति मिलती है, ठीक उसी प्रकार इन सभी चेकिंग में सफल होने के बाद अखबार के गेट से अंदर आने की अनुमति मिलेगी यानी आपको नियुक्ति पत्र मिलेगा और आप जॉब हासिल कर पाएंगे।

तो अब जब भी आप किसी पत्रकारिता संस्थान में दाखिला लें तो अपना दिमाग साफ रखें कि पत्रकारिता की डिग्री जादुई चिराग नहीं है सिर्फ आधार कार्ड है।

Sunday, 29 June 2025

अंग्रेजी को दुलारा, हिंदी से किनारा

 पत्रकारिता के कुछ छात्रों/छात्राओं ने पूछा, हिंदी को कैसे सुधारें, वर्तनी को कैसे ठीक करें, इसके लिए कोई किताब मिलती है क्या। इन प्रश्नों के जवाब में मैंने पोस्ट लिखकर बताया था कि हिंदी को सुधारना है तो हिंदी में खूब लिखना होगा। मैंने यह भी बताया था कि लिखने का तरीका क्या होगा, कैसे लिखना है। मैंने एक माह का टास्क दिया था जिसे आपको करना है। एक माह बाद इसके रिजल्ट से मुझे अवगत कराना है फिर आगे का रास्ता मैं बताऊंगा। 

इस बीच आज मैं आपको हिंदी बोलने का भी टास्क देना चहता हूं। आप सोचिए जब आप अंग्रेजी बोलते हैं तो कितना सतर्क रहते हैं। एक-एक शब्द नाप-तोल कर बोलते हैं। डरते रहते हैं कि कोई शब्द या वाक्य गलत न हो जाए। आपको चिंता रहती है कि गलत बोल दिया तो सामने वाला क्या सोचेगा। लेकिन जब आप हिंदी बोलते हैं तो बिंदास रहते हैं। कुछ भी बोल देते हैं। सड़क को सरक बोल देते हैं। शक्कर को सक्कर बोल देते हैं। पानी को स्त्रीलिंग बना देते हैं, जिंदगी को पुलिंग बना देते हैं। हिंदी बोलते समय आप यह नहीं सोचते कि सामने वाला क्या सोचेगा। आप ऐसा इसलिए करते हैं कि हिंदी आपकी अपनी भाषा है। लेकिन यह कैसी सोच है, दूसरे की चीज को तो आप सहेजकर रखते हैं और अपनी चीज को बेतरतीब ढंग से। 

यदि आप सचमुच हिंदी सुधारना चाहते हैं तो इस सोच से निजात पाना होगा। हिंदी को किसी भी अन्य भाषा की अपेक्षा ज्यादा प्यार और सम्मान देना होगा। बोलते समय भी कोशिश करनी होगी कि आप हिंदी शुद्ध बोलें। इसके लिए अभ्यास करना होगा। आपको यह जानना होगा कि कौन-कौन से शब्द ऐसे हैं जो आप ग़लत बोलते हैं। लेकिन आप जानेंगे कैसे? इसके लिए एक तरीका अपनाया जा सकता है। तरीका इस प्रकार है -

-आप अच्छे-अच्छे वक्ताओं के भाषण सुनिए। उनके शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दीजिए। उनके लिंग प्रयोग पर ध्यान केंद्रित कीजिए। इससे आपको यह अंदाजा मिलेगा कि कौन-कौन शब्द पुलिंग और कौन-कौन से स्त्रीलिंग। 

- वक्ताओं में साहित्यिक, विचारक, मोटिवेशनल स्पीकर जैसे लोग शामिल करिए। आपको इनके विचारों को नहीं, इनकी भाषा पर ध्यान देना है। 

- आप साहित्यिक कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग सुन सकते हैं। लाइव सुनने को मिले तो और भी अच्छा। 

- कवि सम्मेलनों, मुशायरों को सुन सकते हैं। इनमें शुद्ध हिन्दी या उर्दू का इस्तेमाल किया जाता है।

लेकिन ध्यान रहे 

- वक्ताओं में राजनेताओं को कतई शामिल नहीं करिएगा। इनकी भाषणों में लपेटने और फेंकने वाले शब्द ज्यादा होते हैं। दूसरी बात, इनका भाषण सुनकर आपकी हिंदी ठीक हो न हो, आपको दिन में सपने देखने की आदत पड़ सकती है।

- वक्ताओं में धर्म गुरुओं, धार्मिक प्रचारकों को भी शामिल नहीं करिएगा। इनकी बातों को सुनकर आपको संसार नश्वर लगने लगेगा। आपके अंदर नैराश्य की भावना उत्पन्न हो सकती है। 

सबसे जरूरी बात 

आप प्रण कर लें कि परिवार में आपसी बातचीत, दोस्तों के साथ मौज-मस्ती के दौरान भी आप शुद्ध हिन्दी बोलेंगे। कम से कम शुद्ध हिन्दी बोलने की कोशिश तो शुरू कर ही देंगे।

यह टास्क भी एक माह का है। इसके रिजल्ट से भी मुझे अवगत करा सकें तो अति उत्तम।

Saturday, 28 June 2025

हिंदी पत्रकारिता में क्या-क्या गुल खिलाएगा एआई

एआई दोस्त या दुश्मन? दुनिया में अभी यह बहस जारी है। एआई को दोस्त बताने वाले इसे भविष्य का निर्माता बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मानव प्रगति की गति को तेज करने में यह अग्रणी भूमिका निभाएगा। लेकिन दूसरी ओर एआई को मानवता के लिए बड़ा खतरा बताने वाले भी कम नहीं हैं। इनका कहना है कि एआई जब बेलगाम हो जाएगा तब मानवता को कदम-कदम पर दुख देगा और तब इससे बचने का कोई रास्ता इंसानों के पास नहीं होगा। सच्चाई क्या है। पहले यह समझते हैं कि एआई के कारण पत्रकारिता में क्या-क्या बेहतर होगा यानी सकारात्मक बदलाव क्या होंगे।

सकारात्मक बदलाव 

ऐसी चर्चा है कि हिंदी पत्रकारिता में एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के प्रभाव से कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आने की संभावना है। इन परिवर्तनों से क्षमता और दक्षता बढ़ने की उम्मीद की जा रही है। कुछ उम्मीदें इस प्रकार हैं -
ऑटो राइटिंग 
यह कहा जा रहा है कि एआई क्रिकेट स्कोर, मौसम पूर्वानुमान, या शेयर बाजार अपडेट जैसे डेटा-आधारित छोटे समाचारों को ऑटोमैटिक रूप से लिखने में सक्षम है। यदि इन कामों की जिम्मेदारी एआई आधारित टूल्स को सौंप दिया जाता है तो पत्रकारों का समय बचेगा और वे इस समय का उपयोग ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण काम में लगा सकते हैं।

अनुवाद का काम 
एआई हिंदी समाचारों को अन्य भारतीय भाषाओं में तेजी से अनुवाद कर सकता है, जिससे पाठकों का दायरा बढ़ेगा और क्षेत्रीय पहुंच में सुधार होगा।

टेक्स्ट निर्माण 
एआई टूल्स साक्षात्कार या प्रेस कॉन्फ्रेंस को टेक्स्ट में बदल सकते हैं। इतना ही नहीं वे टेक्स्ट का सार भी अलग से निकाल सकते हैं। इस काम में यदि इन्हें लगाया जाता है तो पत्रकारों का काफी समय बच सकता है।

डाटा विश्लेषण 
एआई बड़े डाटा सेट का विश्लेषण करके जटिल रुझानों को उजागर कर सकता है, जिससे खोजी पत्रकारिता को बल मिलेगा।

नकारात्मक प्रभाव 
लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि इतने कामों को एआई को सौंप दिया जाता है तो इन कामों में लगे पत्रकार कहां जाएंगे। हिंदी पत्रकारिता में जॉब के मौके शुरू से ही कम मिलते रहे हैं। सामर्थ्यवान हिंदी अखबारों की संख्या बहुत ही सीमित है। इनमें भी यदि आधे से ज्यादा काम एआई के टूल्स करने लगेंगे तब मनुष्य क्या करेंगे क्योंकि ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण कामों में पहले से ही पत्रकार लगे हुए हैं। एआई टूल्स के कारण बेरोजगार होने वाले पत्रकार को नौकरियां कहां मिलेगी, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिए कम से कम हिंदी के संदर्भ में हमें बहुत सोच-समझकर एआई को प्रवेश दिलाना चाहिए। एआई के कुछ नुकसान इस प्रकार हो सकते हैं -
मैनपावर पर असर
- एआई स्वचालित टूल्स (जैसे ChatGPT आदि) के कारण पत्रकारों की भूमिका कम हो सकती है। डेटा-आधारित रिपोर्टिंग, अनुवाद और समाचार संकलन जैसे क्षेत्रों में इसका असर दिख सकता है।  
- छोटे मीडिया संस्थानों में रिपोर्टरों की आवश्यकता घट सकती है क्योंकि एआई कम लागत में समाचार उत्पादन कर सकता है। 
विश्वसनीयता पर खतरा 
- एआई द्वारा बनाए गए फेक वीडियो या झूठे समाचार हिंदी भाषी क्षेत्रों में तेज़ी से फैल सकते हैं जिससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है।  
- चुनावों या सामाजिक विवादों के दौरान एआई-जनित अफवाहें हिंसा या अशांति को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे पत्रकारिता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदना पर असर
- एआई-जनित समाचारों में मानवीय संवेदनाओं की कमी हो सकती है क्योंकि एआई टूल्स महसूस नहीं कर सकते हैं। उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं है। वे सामाजिक सरोकार से भी कोई वास्ता नहीं रखते हैं। इसलिए लोकल मुद्दों के प्रति उनका रवैया रूखा होगा। मानवीय एंगल की कहानियों का विश्लेषण भी एआई यंत्रवत ही करेगा। इनके साथ पाठकों का भावनात्मक जुड़ाव कम होगा। पाठकों को खबर पढ़ने में मजा नहीं आएगा। 
असल में एआई हिंदी पत्रकारिता के लिए एक दोधारी तलवार है। हालांकि यह दक्षता और पहुंच बढ़ाता है, लेकिन इससे होने वाले दुरुपयोग, रोज़गार संकट और नैतिक दुविधाओं जैसी चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भविष्य में इन जोखिमों को कम करने के लिए अनेक तरह के कायदे-कानून बनाने होंगे ताकि एआई के दुष्प्रभावों से बचा जा सके। यदि इससे बचाव का रास्ता नहीं निकाला गया तो भविष्य में एआई क्या-क्या गुल खिलाएगा, अभी कहना मुश्किल है।

 

Thursday, 26 June 2025

हिंदी की क्लास में शिक्षक भी आप और छात्र भी आप‌‌‌

अव्वल तो कमजोर भाषा (हिंदी या अंग्रेजी) वालों को पत्रकारिता में आना ही नहीं चाहिए और यदि किसी कारणवश आ गए तो सबसे पहले भाषा को सुधारने का काम करना चाहिए। इसके लिए हिंदी में सोचना शुरू कीजिए। फिर इसका अभ्यास हो जाए तो हिंदी सीखने के लिए रोजाना एक या दो घंटे का समय निकालिए। इस समय को पूर्णतः हिंदी की क्लास को दीजिए। अब आप पूछेंगे कि मैं किस क्लास की बात कर रहा हूं। यह क्लास लेगा कौन। तो भाई, यह क्लास आप खुद लेंगे। इस क्लास में शिक्षक भी आप ही होंगे और छात्र भी आप। फिर सवाल उठता है कि आप अपनी क्लास कैसे लेंगे। इसका तरीका मैं बताता हूं।

पहला कदम

सबसे पहले संकल्प लें कि मुझे अपनी हिंदी को मजबूत बनाना है। अपने संकल्प को तारीख के साथ नोट कर लीजिए। संकल्प के बाद यह तय करिए कि सुबह या अपनी सुविधानुसार एक घंटे का समय इस काम में लगाएंगे। फिर तीन काम शुरू करें 

- आज के अखबार को पूरा पढ़ना। ध्यान रहे अखबार ऑनलाइन नहीं होना चाहिए। 

- अखबार के किसी पेज की लीड खबर को अपनी डायरी में लिखना। खबर को हूबहू डायरी में लिख लीजिए। 

- अब इस खबर को अपने हिसाब से दोबारा लिखिए यानी इससे एक नई खबर बनाइए। इस खबर में नए-नए शब्दों का प्रयोग कीजिए। कुछ ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल कीजिए जिसे आप जानते हैं लेकिन उसकी स्पेलिंग में आपको कंफ्यूजन है। अब आप अपने लिखे हुए को किसी जानकार से चेक करा पाएं तो अति उत्तम है। आपको उचित सलाह मिल सकेगी और आपकी गलतियां सही हो जाएंगी। 

इस प्रक्रिया को एक माह तक करते रहिए। 

दूसरा कदम 

रोजाना अखबार पढ़ने के साथ-साथ अच्छी पत्रिकाएं और किताबें पढ़ने की आदत विकसित करिए। किताबों में बड़े साहित्यकारों की रचनाएं शामिल कर सकते हैं। 

इन दो कामों का आपको एक माह में रिजल्ट दिखने लगेगा। इन कामों को समझने में कोई उलझन महसूस हो तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं। 






Wednesday, 25 June 2025

पत्रकारिता के छात्र इन दो तारीखों को रखें याद

भारत की अंतरिक्ष यात्रा में अभी तक 3 अप्रैल, 1984 की तारीख महत्वपूर्ण थी क्योंकि इस दिन विंग कमांडर राकेश शर्मा ने तत्कालीन सोवियत संघ के सोयुज टी-11 से अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी थी। यह किसी भी भारतीय की पहली अंतरिक्ष यात्रा थी और राकेश शर्मा भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री बने। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूछने पर कि अंतरिक्ष से हमारा भारत कैसा लग रहा है, राकेश शर्मा ने कहा था - सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा। 

अब भारत की अंतरिक्ष यात्रा एक और तारीख जुड़ गई।  यह है 25 जून 2025 की तारीख जब भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने एएक्स-4 से अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी। इस समय अंतरिक्ष से शुभांशु शुक्ला ने कहा- What a ride!

यह जानना दिलचस्प होगा कि भारत की पहली अंतरिक्ष यात्रा के समय शुभांशु शुक्ला का जन्म भी नहीं हुआ था। भारत की पहली अंतरिक्ष यात्रा के 41 साल बाद कोई भारतीय अंतरिक्ष में गया है। एक और बात। शुभांशु शुक्ला सिर्फ अंतरिक्ष यात्रा नहीं कर रहे बल्कि वे पायलट की भूमिका भी निभा रहे हैं। 

अब भविष्य में जब भी भारत की अंतरिक्ष उड़ान की चर्चा होगी तब इन दो तारीखों को याद किया जाएगा। इसलिए पत्रकारिता से जुड़े सभी लोगों को इन दो तारीखों और घटनाओं को हमेशा याद रखना चाहिए।

नकचढ़े बॉस से कैसे निपटें

यदि आपका बॉस बहुत गुस्सैल है। हमेशा उसकी त्योरियां चढ़ी होती हैं और पूरे दफ्तर में उसे नकचढ़ा समझा जाता है तो जाहिर है आपका सबों का ऑफिस टाइम हमेशा तनावपूर्ण रहता होगा। हर वक्त डर लगा रहता होगा कि पता नहीं कब किसकी बारी आ जाए। अब ऐसी हादत में  आप बॉस को तो बदल नहीं सकते लेकिन अपनी आदत तो बदल सकते हैं। एक साधारण सा फार्मूला अपनाइए और नतीजा देखिए।

फार्मूला यह है कि अगली बार जब बॉस आपको अपनी केबिन में बुलाए तो सिर झुकाकर जाइए। जब तक बॉस के सामने रहें, सिर झुकाकर रहें। ध्यान रहे कि बॉस से आई कॉन्टेक्ट बिल्कुल न हो। 


क्या होगा इससे? 

+ बॉस का ग़ुस्सा बढ़ेगा नहीं।

+ धीरे-धीरे बॉस की त्योरियां ढीली पड़ जाएंगी। 

+ उसकी चढ़ी हुई नाक नीचे उतर आएगी।


क्यों होगा ऐसा 

ऐसा इसलिए होगा क्योंकि आपने आंखें झुका लीं। सारा खेल आंखों का है। आंखें चार होते ही प्यार भी होता है और तकरार भी होता है। 

यह फार्मूला अपनाइए और नतीजा देखिए।

Tuesday, 24 June 2025

हिंदी सीखनी है तो हिंदी में सोचना शुरू कीजिए

 यदि आप स्कूल में होते तो चुटकी बजाकर हिंदी सीख जाते क्योंकि उस उम्र में सीखना आसान होता है। उस समय व्याकरण पढ़ना बोरिंग नहीं लगता लेकिन अब इस उम्र में व्याकरण पढ़ना बोरिंग लग सकता लेकिन व्याकरण का बुनियादी ज्ञान तो चाहिए होगा जो मैं समझता हूं कि आपके पास पहले से है। यदि व्याकरण का बुनियादी ज्ञान है तो शुद्ध हिंदी लिखना कोई रॉकेट साइंस नहीं लगेगा। फिर भी इसमें मेहनत और लगन की जरूरत तो पड़ेगी ही। छात्रों की मांग पर कुछ टिप्स दे रहा हूं। लेकिन इतने से काम नहीं चलेगा। इसके आगे भी बहुत कुछ करना होगा। यदि सचमुच आप अपनी हिंदी सुधारना चाहते हैं तो कमर कस लीजिए और शुरू हो जाइए। 

पहला कदम 

आप सबसे पहले एक काम कीजिए। आम बोलचाल में आप जितने भी अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए सामान्य हिंदी के शब्द ढूंढिए। इन हिंदी शब्दों का दिमाग में भंडारण कीजिए। इससे आपके पास हिंदी शब्दों का एक कोष तैयार हो जाएगा।

दूसरा कदम

इसके बाद हिंदी में सोचना शुरू कर दीजिए। हिंदी में सोचने का मतलब यह है कि आपके मन-मस्तिष्क में जो विचार या ख्याल उत्पन्न हो रहे हैं वे हिंदी में उभरें। 

उदाहरण - यदि आप सोच रहे हैं -मैं आज शाम अपने दोस्तों से मिलूंगा। तो इसमें शाम के लिए इवनिंग और दोस्तों के लिए फ्रेंड्स शब्द न आए। इस प्रक्रिया से आप हिंदी में सोचना शुरू कर सकते हैं। इसे लगातार करिए ताकि यह आपकी सोच में शामिल हो जाए‌। 

तीसरा कदम

जब आप हिंदी में सोचने लगेंगे तब आपका मन हिंदी में लिखने का भी होगा। जब ऐसा हो जाए तो आप समझ लीजिए कि हिंदी सीखने की यात्रा पर आप निकल चुके हैं।

अगले ब्लॉग में आगे की बात।

Sunday, 22 June 2025

पत्रकारिता के छात्र सबसे पहले हिंदी सुधारें

मुझे लगातार पत्रकारिता के छात्रों के सवाल मिल रहे हैं। इनमें पत्रकारिता में करियर से जुड़े अनेक तरह के सवाल होते हैं। मैं सवालों के जवाब देने का भरसक प्रयास करता हूं। इस क्रम में मैंने एक गंभीर बात नोटिस की है कि मुझसे सवाल पूछने वाले छात्रों में दस में से आठ छात्र शुद्ध हिन्दी नहीं लिख पाते हैं। किसी में लिंग दोष होता है तो किसी में वर्तनी की गड़बड़ी। यहां तक कि वाक्य विन्यास भी गड़बड़ होता है। यदि आप चार पंक्तियों के सवाल में भी हिंदी शुद्ध नहीं लिख पा रहे हैं तो यह एक गंभीर बात है क्योंकि पत्रकारिता में भाषा का शुद्ध होना पहली शर्त है। पत्रकारिता के क्षेत्र में भाषा सबसे जरूरी हथियार है जिसके बल पर आप करियर में बुलंदी हासिल कर सकते हैं। यदि यह हथियार कमजोर है तो फिर जंग कैसे लड़ेंगे? दिक्कत यह है कि भाषा को शुद्ध लिखने की पढ़ाई न तो पत्रकारिता संस्थान में पढ़ाई जाती है और न ही मीडिया संस्थान में। यह हुनर आपको खुद सीखना होगा और यदि आप यह हुनर नहीं हासिल कर पाते हैं तो मेरी सलाह होगी कि आप अपना प्रोफेशन बदल लें। पत्रकारिता में बिना अच्छी भाषा के आप ज्यादा ऊंचाई हासिल नहीं कर पाएंगे। कुछ साल बाद जब आपको करियर में अपेक्षित ग्रोथ नहीं मिल पाएगा तो आप पत्रकारिता को कोसेंगे। इससे अच्छा है कि समय रहते फैसला कर लें कि आपको क्या करना है। यदि आप पत्रकारिता छोड़ने का फैसला नहीं करते हैं तो सबसे पहले आपको अपनी भाषा सुधारने का प्रयास शुरू करना चाहिए। यह एक दिन में नहीं होगा। इसके लिए सतत् स्वाध्याय, मेहनत और लगन की जरूरत होती है। आपको लंबे समय की इस मेहनत के लिए खुद को तैयार करना चाहिए क्योंकि इसका कोई शॉर्टकट नहीं है।

आप यदि इस कठोर परिश्रम के लिए तैयार हैं तो आपको अनुशासित ढंग से इस पर क्रमवार आगे बढ़ना होगा। यह काम आप किसी विशेषज्ञ की देखरेख में करें तो अच्छा रहेगा। इसके लिए आपको लंबे समय तक गाइडेंस की जरूरत पड़ेगी। 

अभी के लिए इतना बता दूं कि अच्छी भाषा के बिना पत्रकारिता में आपका करियर बुलंदी तक पहुंच पाएगा, इसमें संदेह है क्योंकि हर हिंदी अखबार को शुद्ध और अच्छी हिंदी लिखने वालों की ही जरूरत होती है।

Saturday, 21 June 2025

नए जमाने की पत्रकारिता का जंतर-मंतर

जंतर-मंतर क्या है। सांप और बिच्छू का जहर उतारना हो, किसी की बुरी नजर उतारनी हो तो जंतर-मंतर की जरूरत पड़ती है। इसके लिए ओझा-गुणी को खोजना पड़ता है। फिर उसे मनाना पड़ता है। दान-दक्षिणा देना होता है। फिर शुरू होती है जंतर-मंतर की फूंक। लेकिन पत्रकारिता में कैसा जंतर-मंतर। कौन ओझा-गुणी। कैसा दान-दक्षिणा। 

पुराना समय होता है मैं यह कहता कि निष्पक्ष रहकर, स्वतंत्रता और निर्भीकता से रिपोर्टिंग करो, खबरें लिखो, प्रेस कॉन्फ्रेंस में ठोककर सवाल पूछो। यह मत देखो कि सामने
कौन है। कोई जवाब न दे तो फिर पूछो। तब तक पूछो जब तक जवाब नहीं मिल जाता क्योंकि सवाल पूछना तो पत्रकारिता का बुनियादी हक है और जवाब देना हर किसी की जिम्मेदारी। सवाल पूछना पत्रकारिता का काम भी है और फ़र्ज़ भी। इसलिए फ़र्ज़ निभाते रहो। यही पत्रकारिता का सबसे बड़ा मंत्र है। पत्रकारिता में इससे बड़ा ओझा-गुणी कोई नहीं है। 

लेकिन यह पुराना समय नहीं है। नया समय है, नया युग है। इस युग का जंतर भी अलग है और मंतर भी। इस युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता काम करती है, असली बुद्धि आराम करती है। अब कृत्रिम मेधा से कैसे कहूं कि ठोककर सवाल पूछो, ठोककर लिखो और जमकर पत्रकारिता करो। वैसे भी इस समय देश और समाज में विकास और निर्माण की आंधी चल रही है। हर कोई विकास के गीत गाए जा रहा है। इसलिए आज विकास ही जंतर है और विकास के रास्ते में कोई सवालिया रोड़ा नहीं अटकाना ही मंतर है। अभी सवाल पूछे नहीं जा सकते क्योंकि सवाल पूछना संदेह पैदा करना माना जाता है और संदेह करना अपराध जैसा माना जा रहा है। इसलिए आज के समय की पत्रकारिता का जंतर-मंतर और ओझा-गुनी इस प्रकार हो सकते हैं- 

- सवाल मत पूछो। यदि पूछना जरूरी है तो वही सवाल पूछो जिसका जवाब सबको पता है। यानी कोई ऐसा सवाल मत पूछो जो बवाल पैदा करे। 

- जितना दिखता है उतना ही जानो। इसके आगे जानने की ललक को दबाकर रखो। ललक की झलक बाहर नहीं निकलनी चाहिए क्योंकि यदि यह बाहर निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। 

- अपने काम से काम रखो। दूसरों के मामले में तांक-झांक नहीं करो। पत्रकारिता कर रहे हो तो पत्रकारिता करो। पत्रकारिता को जांच एजेंसियों में तब्दील मत करो। 

- मीडिया में रहने के लिए इसके अनुरूप व्यवहार भी करो। मीडिया का धर्म है अपने पाठकों को घटनाओं से अवगत कराना है। पाठकों को घटनाएं बताओ, घटना के पीछे की कहानी नहीं। ध्यान रहे कि यह सिर्फ उपदेश नहीं आज का वास्तविक ज्ञान है। 

- पत्रकारिता को नौकरी समझो और इसे नौकरी की तरह करो। यह मत समझो कि मीडिया में हो तो समाज को बदल दोगे। समाज बदलने की जिम्मेदारी किसी और ने उठा ली है। 

इस जंतर-मंतर को याद रखो। अच्छे से नौकरी करो, वेतन लो और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम गुजारो। कभी-कभी पहाड़ों की सैर पर भी निकला करो। इससे पता चलेगा कि दुनिया में चोटियां और भी हैं।

Friday, 20 June 2025

पत्रकारिता की सात जरूरी फालतू बातें

पत्रकारिता गंभीर काम है। इसमें हर काम सोच-समझकर इमानदारी से किया जाता है। इसलिए इसमें फालतू बातों के लिए जगह नहीं है। लेकिन ऐसा कोई काम नहीं है जिसमें कुछ बातें फ़ालतू नहीं होती है। पत्रकारिता में भी ऐसी कुछ बातें हैं जो अब सिर्फ कहने के लिए होती हैं। जैसे, 


पहली बात 

पत्रकारिता में सदा सच लिखना होता है। 

दूसरी बात 

पत्रकारिता में काम करने वाले लोग समाज के प्रति वफादार होते हैं।

तीसरी बात 

इस क्षेत्र में धोखाधड़ी, चालाकी और धूर्तता के लिए जगह नहीं है।

चौथी बात 

पत्रकारिता की डिग्री से जीवन के सारे सपने पूरे होते हैं।

पांचवीं बात

पत्रकारिता का काम चौकीदार के काम जैसा होता है। 

छठी बात 

पत्रकार बनना परिवार के लिए फख्र की बात है। 

सातवीं बात

पत्रकारों की समाज में बहुत इज्जत है।


ये सात बातें जरूरी भी हैं और फालतू भी। यह आप पर निर्भर करता है कि इसे आप किस रूप में लेते हैं।

Wednesday, 18 June 2025

नौकरी में सर्वाइवल ट्रिक

एक समय था जब पत्रकारिता में दुर्व्यवहार या अपमान जैसी हरकतें लगभग शून्य थी। उस समय पत्रकारिता का क्षेत्र दंभ नहीं गौरव से भरा होता था क्योंकि उस समय के पत्रकारों के पास अपने उसूल और मार्गदर्शन हुआ करते थे। इसलिए सीखने और सिखाने का समृद्ध माहौल था जिसमें भाईचारे का जबरदस्त तड़का लगता रहता था। लेकिन आज स्थितियां उल्ट गई हैं। आज पत्रकारिता में भी पद के साथ दंभ और घमंड जैसे गुण अपने आप आ जाते हैं और छोटा-सा इंचार्ज भी खुद को तोप समझने लगता है। फिर शुरू हो जाता है अपने मातहतों के साथ दुर्व्यवहार का सिलसिला। यदि आपका इंचार्ज भी आपके साथ दुर्व्यवहार या ग़लत व्यवहार करता है, बात-बात पर चीखता-चिल्लाता है तो आप इससे बचने के लिए एक उपाय कर सकते हैं।

उपाय यह है कि अगली बार जब आपका इंचार्ज गुस्से में आपको बुरा-भला कहे तो आप किसी तरह उसकी तस्वीर खींच लो या उस घटना का वीडियो बना लो। फिर जब उसका गुस्सा ठंडा पड़ जाए तो इंचार्ज को एकांत में ले जाकर वह वीडियो दिखा दो। फिर शांत भाव से बोलो- यह वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत सारे लाइक्स बटोरेगा। सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े कांड होते रहते हैं। आप भी छोटा सा कांड कीजिएगा तो क्या बिगड़ जाएगा। वीडियो देखकर आपके इंचार्ज के संभल जाने के पूरे चांस हैं। फिर वह आपके साथ दुर्व्यवहार करना बंद कर देगा। वैसे इस कांड के बूमरैंग करने का खतरा भी है। 

हां, यह टेंशन मत लेना कि ऐसा करना ब्लैकमेलिंग है। यह ब्लैकमेलिंग कतई नहीं कहलाएगा क्योंकि यह सर्वाइवल ट्रिक है, ब्लैकमेलिंग नहीं। जिंदा रहने का हर व्यक्ति को अधिकार है। आखिर हर किसी को अपनी रक्षा करने का कानूनी हक मिला हुआ है। 

Tuesday, 17 June 2025

पत्रकारिता में सफलता का पहला टीका

जब आप पत्रकारिता संस्थान से अपने हाथ में डिग्री या डिप्लोमा लिए बाहर निकलते हैं तब आपके हाथ तो खाली होते और लेकिन आपकी आंखों में सपने भरे हुए होते हैं। इसके साथ मन में उमंग और उत्साह का उफान होता है और आत्मविश्वास का सहारा होता है। एक बात और नोट करने लायक है कि उस समय आपके सामने रास्ते स्पष्ट नहीं होते हैं सिवाय इसके कि मीडिया संस्थानों को खटखटाना है और किसी एक अच्छे से दरवाजे को खोलना है। इस दरवाजे को खोलना ही सफलता का पहला टीका है। 

जीवन के इस मोड़ पर सहारा बनते हैं आपकी काबिलियत, शिक्षा, हुनर और हौसला। इन चार चीजों के दम पर आप अपने लिए सफलता के पहले टीके को हासिल करेंगे और फिर इस टीके के बल पर जिंदगी का सफर आगे बढ़ाएंगे। एक और चीज जो इस वक्त सबसे बड़ा हथियार है, वह है आपका आत्मविश्वास। खुद पर भरोसा। पहले टीके के बाद खुद पर आपका भरोसा बढ़ेगा और बढ़ना चाहिए क्योंकि इसे आपने अपनी काबिलियत के दम पर हासिल किया है। 


क्या करेगा पहला टीका 

यह समझते हैं कि पहला टीका आपके अंदर क्या-क्या बदलाव लाएगा, क्या-क्या बेहतर करेगा। पहला टीका आपके अंदर की असुरक्षा के वायरस को समाप्त करेगा। आपके अंदर की हीन भावना का नाश करेगा। आपको अंदर से बुलंद करेगा, आत्मविश्वास की नई लहर का संचार करेगा। आपको तनकर खड़ा होने की ताकत देगा। साथ ही आपको आपकी मंजिल की ओर एक कदम आगे बढ़ाएगा। इसलिए यह टीका हर किसी की जिंदगी के लिए जरूरी होता है। तो हर किसी को चाहिए कि इस टीके को जल्दी से जल्दी हासिल कर ले ताकि आगे के दूसरे डोज की तैयारी शुरू कर सकें। 


कैसे हासिल करें पहला टीका 

सबसे पहले तो आप यह तय कर लें कि आपको जाना कहां है। प्रिंट मीडिया में, डिजिटल मीडिया में, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में या पीआर एजेंसी में। इसे तय करने के बाद ही आप अपने लिए रास्ता बना पाएंगे। लेकिन ऐसी सलाह दी जाती है कि आपको जाना कहीं भी हो लेकिन एक-दो साल के लिए प्रिंट मीडिया में जरूर जाना चाहिए ताकि आपकी नींव मजबूत हो सके। प्रिंट मीडिया में आज भी रगड़ कर काम कराया जाता है और शुरू-शुरू में रगड़ कर काम करना भविष्य के लिए अच्छा होता है। इसलिए कोशिश करें कि शुरुआत प्रिंट मीडिया से करें। वहां आपकी ग्रूमिंग भी सही दिशा में होगी और मेहनत करने की क्षमता विकसित होगी। 

Monday, 16 June 2025

जब घर तक पहुंचे दफ्तर की किचकिच तो यह फार्मूला अपनाओ

घर और दफ्तर दो ऐसी जगहें हैं जहां हम अपना सबसे ज्यादा टाइम बिताते हैं। इसलिए इन दो जगहों की हरेक चीज का हम पर असर होता है, हर छोटी-बड़ी घटना हमें परेशान कर सकती है। घर तो घर है, यहां होने वाली हर घटना हमारी निजी थाती है लेकिन दफ्तर सार्वजनिक स्थल है जहां घटने वाली हर घटना का असर व्यापक होता है और यदि आपके दफ्तर में किचकिच, खिचखिच ज्यादा है और उसे आप घर तक ला रहे हैं या घर तक लाना आपकी मजबूरी है तो क्या होगा। तीन बातें हो सकती हैं-

- घर में व्याप्त शांति में व्यवधान आ सकता है। 

- आप दफ्तर की किचकिच निपटाओगे और उधर घर पर नई किचकिच पैदा होती चली जाएगी।

- फिर आप दोहरी किचकिच में उलझ जाओगे और जिंदगी झंड हो जाएगी। 

इससे बचने का एकमात्र और सच्चा रास्ता यह है कि दफ्तर की किचकिच दफ्तर में ही निपटाओ। दफ्तर से वापस अकेले घर आओ।


Sunday, 15 June 2025

हम भारत के लोग कहीं भी मर जाते हैं

अहमदाबाद में विमान हादसा बड़ी त्रासदी है। पूरा देश शोकाकुल है। दुनिया हैरान है। लेकिन हम भारत के लोग कभी हैरान नहीं होते क्योंकि हम सिर्फ विमान दुर्घटना में ही नहीं मरते हैं, हेलीकॉप्टर गिरने से भी मरते हैं। ट्रेन से गिरकर भी मरते हैं, पुल टूट जाता है तो भी मरते हैं। यहां तक कि बारिश में भी मर जाते हैं। आंधी-तूफान, बारिश आई नहीं कि दीवारें गिरने लगते हैं, पेड़ गिरने लगते हैं, मकान टूटने लगते हैं और हम मरते रहते हैं। अक्सर सड़क पर खड़े पोल भी गिर जाते हैं और हम मर जाते हैं। कभी प्रकृति हमें मारती है तो कभी सिस्टम हमें मारता है। 
इसलिए हम हैरान नहीं होते क्योंकि जब हम मरते हैं तो अखबारों में खबरें बनती हैं। एक-दो दिन शोर मचता है। सुकून देने वाले बयान आते हैं। हम आश्वस्त होते हैं कि अब ऐसा नहीं होगा लेकिन फिर वैसा ही हो जाता है और हम फिर मर जाते हैं। सिस्टम को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। 
अब कोई क्या करे जब हम मरने पर उतारू हो जाते हैं तब कोई क्या करे। हम ट्रेन के पायदान पर लटक कर सफर करते हैं क्योंकि हमें अपने काम पर समय पर पहुंचना होता है और हर ट्रेन में एक जैसी भीड़ होती है। हम लटक जाते हैं और मर जाते हैं। कोई करे तो क्या करे। आंधी-तूफान बारिश में हम सड़क पर होते ही क्यों हैं जो पोल हमारे ऊपर गिर जाते हैं। हम भी क्या करें। नौकरी के लिए घर से निकलना जरूरी होता है, इसलिए निकलते हैं। हम पुल पर चलते-चलते भी मर जाते हैं। अब अंग्रेजों के जमाने का पुल कभी न कभी तो टूटेगा ही। समय रहते किसी ने सोचा नहीं कि यह पुराना हो गया है, टूट भी सकता है। हमने भी तो नहीं सोचा। विश्वास करते रहे कि जब सरकार ने इसे बंद नहीं किया तो मजबूत ही होगा। नहीं सोचा तो भुगत भी लिया। 
लेकिन इन चीजों पर एक बात तो हम कह ही सकते हैं-
हम भारत के लोग कभी नहीं शर्माते हैं 
हम भारत के लोग कहीं भी मर जाते हैं।

Saturday, 14 June 2025

संडे पोस्ट - जब दफ्तर का माहौल काटने को दौड़े

मैं जब पटना में एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक अखबार के प्रादेशिक संस्करण में था तब दोपहर दो बजे दफ्तर जाते समय कई बार ऐसा लगता था कि दफ्तर नहीं जाकर कहीं भाग जाऊं। क्यों? क्योंकि दफ्तर का माहौल इतना भीषण था कि काटने को दौड़ता था। दफ्तर को लेकर ऐसा डरावना अहसास हो तो आदमी क्या करे। मेरे दफ्तर का माहौल इतना जहरीला था कि उसे बर्दाश्त करने के लिए विशेष तरह की ऊर्जा की जरूरत होती थी। लेकिन अपने भाग जाने वाले ख्याल को जबरदस्ती दबाकर मैं दफ्तर पहुंचता था और फिर सब कुछ ठीक हो जाता था। क्यों? क्योंकि मैं हर तरह के जहरीले माहौल का सामना करता था। माहौल जहरीला है तो उससे बचने का सबसे कारगर उपाय है उसका सामना करना। 

यदि आपको भी कभी ऐसा महसूस हो तो आप निम्न कुछ कामों से दफ्तरी जहर का एंटी डॉट तैयार कर सकते हैं- 

*️⃣ आप दफ्तर दस मिनट पहले पहुंचें और काम खत्म होने या ड्यूटी खत्म होने के आधे घंटे बाद निकलें। आपके ऐसा करते ही जहरीले माहौल में दरार पड़ने लगेगी। 

*️⃣ दफ्तर में व्यस्त रहें। मस्त रहें और यदि मस्त नहीं रह पा रहे हैं तो मस्त रहने का स्वांग जरूर करें।

*️⃣ जहरीले साथियों के साथ ज्यादा से ज्यादा आमना-सामना करें।

*️⃣ दफ्तर के माहौल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए ऊंची आवाज में बोलना भी जरूरी है। इसके लिए मौका तलाशें और मौका मिलते ही फट पड़ें।

इतने में ही जहर का एंटी डॉट तैयार हो जाएगा। यकीन मानिए फिर दफ्तर काटने के लिए नहीं दुलारने के लिए दौड़ेगा।

जॉब में बने रहने के लिए हुनर सीखें, हुज्जत नहीं

हुनर और हुज्जत में बहुत फर्क है। दोनों के बीच कोई समानता नहीं है लेकिन जॉब के दौरान दोनों को सीखने के समान अवसर मिलते हैं। यह आप पर निर्भर है कि आप क्या सीखते हैं। आप जो भी सीखें लेकिन एक बार इनके बीच के फर्क पर जरूर गौर कर लीजिए।

हुनर और हुज्जत में पहला फर्क तो यह है कि हुनर को किसी से सीखना पड़ता है और हुज्जत करना अपने आप आ जाता है। इसे किसी से सीखने की जरूरत नहीं है।

दूसरा फर्क यह है कि हुनर से आपको कोई मुकाम हासिल हो सकता है, किसी चीज में सफलता हासिल हो सकती है और हुज्जत से मिल रहा कोई मुकाम हाथ से फिसल सकता है, सफलता की जगह निराशा मिल सकती है।

तीसरा फर्क यह है कि हुनर हासिल करने का काम नीरस लग सकता है, उबाऊ लग सकता है लेकिन हुज्जत में बहुत रस है, इसे करने में मज़ा बहुत आता है। लोग मजा ले-लेकर हुज्जत करते हैं, पानी पी-पीकर हुज्जत करते हैं। एक आदमी शुरू करता है तो पूरा मुहल्ला जमा हो जाता है क्योंकि हुज्जत संक्रमण की तरह फैलता है। 

यदि आप जॉब में हुज्जत करेंगे तो हुनर नहीं मिलेगा और यदि हुनर सीखना चाहते हैं तो हुज्जत से दूर रहना होगा।

Thursday, 12 June 2025

123 साल बाद पुरुष से पूर्ण बराबरी कर पाएंगी महिलाएं

विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट-2025 में यह कहा गया है कि यदि महिला और पुरुष समानता के लिए किए जा रहे उपायों की गति ऐसी ही बनी रही तो पूरी तरह समानता आने में 123 साल लगेंगे। इस रिपोर्ट के अनुसार महिला और पुरुष समानता के मामले में भारत पिछड़ रहा है। 148 देशों की सूची में भारत का स्थान 131वां है जबकि पिछले साल यह 129वां था। इस तरह भारत इस साल दो पायदान नीचे चला गया है जो चिंता की बात है। दक्षिण एशियाई देशों में भारत सबसे निचले स्थान पर है। हालांकि संतोष की बात है कि पाकिस्तान भारत से नीचे के पायदान पर है। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि हालांकि भारत में शिक्षा और आर्थिक स्थिति के मामले में महिलाओं की स्थिति में हल्का सुधार आया है लेकिन देश में राजनीतिक रूप से महिलाएं अभी भी काफी पीछे हैं। 

रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक समानता के मामले में दक्षिण एशियाई देशों में बांग्लादेश सबसे आगे है। इसने 75 स्थानों की छलांग लगाई है और इस साल 24वें स्थान पर पहुंच गया है। दुनिया में लैंगिक समानता के मामले में आइसलैंड नंबर वन बना हुआ है। आइसलैंड लगातार 16वें साल से इस स्थान पर बना हुआ है। दूसरे पर फिनलैंड और तीसरे स्थान पर नार्वे है।

Wednesday, 11 June 2025

क्या करें जब आप संपादक बन जाएं

पत्रकारिता में संपादक बनने का सपना हर पत्रकार देखता है लेकिन इस पद तक थोड़े से लोग ही पहुंच पाते हैं। जो इस पद पर पहुंचते हैं उनके सामने चुनौतियों का अंबार लगा होता है। कई लोग तो इन चुनौतियों में ऐसा उलझते हैं कि उनके लिए इस पद पर बना रहना भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए जब भी आप इस पद पर पहुंचते हैं तब सबसे सबसे पहले अपने पद को सुरक्षित रखने का इंतजाम कर लें। फिर  प्रबंधन को आश्वस्त करें कि पूरे ग्रुप में इस पद के लिए आपसे ज्यादा उपयुक्त व्यक्ति दूसरा नहीं हो सकता है। लेकिन यह सब होगा कैसे। आइए समझते हैं -

*️⃣ टीम व्यवस्थित और अनुशासित करें।  

हो सकता है कि आपके आने से पहले जो भी संपादक था, उसने पूरी अव्यवस्था फैला रखी हो तो आपको सबसे पहले अपने हिसाब से व्यवस्था बनानी होगी। टीम को फिर से अनुशासित करना होगा। साथ ही टीम को नए सिरे से मोटिवेट करना होगा। यह काम सबसे जरूरी इसलिए है क्योंकि यही टीम आपको सफल या असफल बनाएगी। टीम को तीन प्वाइंट पर तैयार करें 

- हर एक को उसकी सही भूमिका बताएं 

- हरेक से अपनी अपेक्षाएं भी बताएं 

- हरेक को उनके करियर में ग्रोथ समझाएं 

इससे आपकी टीम को आपके साथ करने में सहुलियत होगी और वह बेहतर परफॉर्म कर पाएगी।

*️⃣ अगले तीन साल का टारगेट सेट करें 

अपने लिए अगले तीन साल के लिए टारगेट सेट करें। मतलब यह कि अगले तीन साल में अखबार को आप सर्कुलेशन वाइज कहां पहुंचाना चाहते हैं। कंटेंट वाइज क्या-क्या सुधार करना चाहते हैं। इन दो टारगेट को पूरा करने के लिए अपनी टीम को भी तैयार करें, उन्हें इसके अनुसार काम करने के लिए प्रेरित करें। उन्हें तीन बातें समझाएं 

- अखबार को बेहतर बनाना क्यों जरूरी है 

- इसका सर्कुलेशन वाइज ग्रोथ क्यों जरूरी है 

- अखबार बेहतर स्थिति में आएगा तो हरेक के करियर में कैसे और कितना ग्रोथ हो सकता है।

*️⃣ रणनीति बनाएं

तीन साल के टारगेट को पूरा करने के लिए हर साल के लिए टारगेट तय करें। यह तय करें कि एक साल में कितना ग्रोथ हासिल करेंगे। इसके लिए तीन चीजों पर फोकस करें 

- ग्रोथ एरिया चिह्नित करें। मतलब यह है कि कंटेंट के स्तर पर क्या हासिल करना है। जैसे, यदि खबरों को भाषा की अशुद्धियां से मुक्त करना, खबरों के शीर्षक में चमत्कार पैदा करना आदि। 

- यह सही है कि संपादक को अखबार के सर्कुलेशन से कोई मतलब नहीं होता है लेकिन कंटेंट में सुधार लाकर और खबरों का रीडर कनेक्ट बढ़ाकर अखबार को नए पाठकों के बीच प्रवेश दिलाना संपादक का ही काम है। तभी सर्कुलेशन विभाग को वहां जल्दी सफलता मिल सकती है और अखबार का विकास हो सकता है।

- अखबार को विश्वसनीय बनाएं। इससे ब्रांड की ताकत मजबूत होगी और आपके अखबार की धमक बढ़ेगी।

*️⃣ एक डाक एडिशन को गोद लें 

इन दिनों अखबारों का पूरा फोकस सिटी एडिशन को मजबूत करने में लगा रहता है। यह सही भी है। सिटी एडिशन ही लीडर एडिशन होता है। लेकिन आप सिटी एडिशन पर मेहनत करने के साथ-साथ किसी एक ऐसे डाक एडिशन को गोद ले लें जिसमें ज्यादा संभावना दिखाई दे। इस डाक एडिशन पर भी ध्यान दें। आम तौर पर संपादक डाक एडिशन पर व्यक्तिगत तौर पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। यदि आप ऐसा करेंगे और मेहनत के बल पर उसके ग्रोथ में बढ़ोतरी कर पाते हैं तो यह आपके लिए पल्स प्वाइंट होगा। प्रबंधन भी इस प्रयास की सराहना करेगा। यह आपके ग्रोथ के लिए भी बेहतर होगा।

अंतिम बात, प्रबंधन के संपर्क में रहें और उससे हर अपडेट शेयर करें। अपने हर अभियान और योजना से प्रबंधन को अवगत कराएं। इनके परिणामों की जानकारी दें। यह जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये सारी बातें आपके पक्ष में जाएगी। प्रबंधन की नजर में आपका वैल्यू बढ़ेगा। यह आपके करियर ग्रोथ के लिए बेहतर बात होगी।

#journalism #editor #management 


Tuesday, 10 June 2025

प्रेस विज्ञप्तियों का अपना मिजाज होता है

अखबार के दफ्तरों में प्रेस ब्रीफिंग, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रेस विज्ञप्ति बहुत ही जाने-पहचाने शब्द हैं। सबको पता होता है कि इनका क्या मतलब है। प्रेस ब्रीफिंग किसी खास घटना या आयोजन या ऐसी ही किसी गतिविधि को लेकर की जाती थी जिसमें खास घटना से जुड़े अपडेट को बताया जाता था या है। इसमें सिर्फ उस खास घटना से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं जिसे लेकर यह ब्रीफिंग की गई है। ये छोटी अवधि के कार्यक्रम हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में हर कोई जानता है। यह पूर्व नियोजित कार्यक्रम है और इसकी तैयारी एक या दो दिन पहले से की जाती है। हालांकि कभी-कभी एक घंटे की सूचना पर भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई जाती है। इसमें सवाल-जवाब का लंबा दौर भी चलता है। पूछे जाने वाले सवाल इस बात पर निर्भर होते हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कौन कर रहा है। इसमें चाय-पानी का इंतजाम होता है। चाय-पानी का स्तर भी इस बात पर निर्भर करता है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कौन कर रहा है। 

प्रेस विज्ञप्ति कभी भी जारी होने वाला कागज है। यह सीधे अखबार के दफ्तर में पहुंचता है। पहले इस कागज को पहुंचाने कोई व्यक्ति आता था। आज से 30-40 साल पहले इस कागज को पहुंचाने वे लोग आते-जाते रहे थे जो आज बड़े-बड़े नेता बन बैठे हैं। अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रेस विज्ञप्ति आसानी से अखबार के दफ्तर या रिपोर्टर के पास पहुंच जाती है। प्रेस विज्ञप्तियों का लेन-देन ज्यादातर व्हाट्सएप और मेल पर होता है।

मोटे तौर पर प्रेस विज्ञप्तियां दो प्रकार की होती हैं। सरकारी और गैर-सरकारी। पहले के समय में इन दोनों विज्ञप्तियों में मूल फर्क यह होता था कि इनमें कोई फर्क नहीं होता था। दोनों तरह की विज्ञप्तियां एक काम अच्छे से करती थी और वह है हिंदी भाषा को अलोकप्रिय बनाना। 


सरकारी विज्ञप्ति 

सरकारी विज्ञप्तियों का मिज़ाज अलग होता है। इसमें सरकारी सूचनाएं होती हैं लेकिन इनकी भाषा सबसे अलग होती है। इन विज्ञप्तियों की भाषा में यदि अखबार में खबर लिखी जाए तो एक सप्ताह में सारे पाठक अखबार पढ़ना छोड़ देंगे क्योंकि सरकारी भाषा का अपना अंदाज है, अपनी शब्दावली है। यह आमतौर पर आम बोलचाल की भाषा से अलग होती है। इसमें इस्तेमाल किए गए शब्दों को समझना सबके बस की बात नहीं है। हालांकि अब सरकार की ओर से ऐसे प्रयास भी किए जा रहे हैं कि सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों को भी सामान्य शब्दों में तैयार किया जाए। लेकिन सरकार तो सरकार है, उसका हर काम अपनी ही शैली में होता है।


गैर सरकारी विज्ञप्ति 

ऐसी विज्ञप्तियां प्राइवेट कंपनियों की ओर से जारी होती हैं। कंपनियां इसमें अपने नए प्रोडक्ट, लांचिंग, इवेंट, अभियान आदि के बारे में खबरें देती हैं। कंपनियां अपने वार्षिक लेखा-जोखा भी प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से बताती हैं। यह अंग्रेजी और हिंदी में होती हैं। इनकी भाषा सरकारी विज्ञप्तियों से थोड़ी बेहतर होती है। 

हर तरह के संस्थान विज्ञप्तियां जारी करते हैं। यह मीडिया को अपनी गतिविधियों की जानकारी देने का सबसे सस्ता और सुलभ माध्यम है। इससे अखबार और रिपोर्टर को भी खबर हासिल करने में आसानी हो जाती है। लेकिन अब अखबारों के प्रबंधन के लिए प्रेस विज्ञप्तियां सिरदर्द बन रही हैं क्योंकि यह खबरों की होम डिलीवरी है और जब खबरें रिपोर्टर के घर तक पहुंच रही हैं तो रिपोर्टर स्पॉट पर क्यों जाएं। इसलिए रिपोर्टरों को विज्ञप्तियां बहुत पसंद हैं लेकिन अखबार प्रबंधन इससे परेशान रहता है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि खबरें कमजोर होती जा रही हैं, घटनाओं की कवरेज नीरस हो रही हैं। 

Monday, 9 June 2025

जेनरेशन चाहे जितनी मॉर्डन हो जाए, अखबार आज भी वैसे ही निकलता है

लोग कहते हैं कि अब जेन बीटा का युग आ गया है। इस युग में सब-कुछ हाई-फाई हो गया है। संवाद से लेकर मैसेजिंग का अंदाज बदल गया है। हाथों की जगह मशीनें काम करती हैं। जेन बीटा (2025-2039) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और वर्चुअल रियलिटी के साथ बड़ी होगी। एआई सबको सबकुछ सिखा-पढा रहा है और आगे भी सिखाएगा। गुरुओं की अब जरूरत नहीं होगी। 

ये सारे बातें सही हो सकती हैं। भले ही दुनिया कितनी भी बदल गई हो लेकिन अखबार में खबरें आज भी वैसे ही लिखी जाती हैं जैसे दशकों पहले लिखी जाती थीं। जेन बीटा हो या अल्फा या जेड, आज भी वही आठ कॉलम का अखबार है, वही लीड खबर है, वैसे ही शीर्षक लगते हैं, वैसा ही सब हेड भी बनता है। तकनीक भले ही कितनी भी आगे क्यों न चली गई हो लेकिन पत्रकारिता तो वही है। पत्रकारिता के मूल्य वही हैं। नैतिक जिम्मेदारी वही है। पत्रकारिता की आजादी के सवाल वही हैं। अखबारों में काम करने वाले चाहे जितने भी मॉर्डन हो गए हों लेकिन उन्हें खबरें तो वैसे ही लिखनी है जैसे पहले लिखी जाती थी। इंट्रो भी वैसा ही लिखना है। इंट्रो में आज भी फाइव डब्ल्यू और वन एच का फार्मूला अपनाया जाना है। खबरों की पुष्टि पहले भी होती थी, आज भी होती है। खबरों में स्रोत की जरूरत पहले भी थी, आज भी है। ऐसा तो नहीं है कि आप जेन बीटा के पत्रकार हो तो आप बिना पुष्टि और स्रोत के खबरें छाप दोगे। खबरों का संपादन भी वैसे ही करना है जैसा आज से दशकों पहले किया जाता था। पहले भी भाषा शुद्ध लिखना ज़रूरी था, आज भी जरूरी है। किसी भी जेनरेशन को ऐसी सुविधा नहीं मिली है कि वे भाषा अशुद्ध लिखें और अखबार में नौकरी कर लें। ध्यान रखने की जरूरत है कि यहां मैं सिर्फ अखबारों की बात कर रहा हूं।

तो फिर दोस्तो, बदला क्या है। बदला है सिर्फ काम करने का तरीका। आज जिस काम को करने में दस मिनट का समय लगता है, पहले उसी काम को करने में एक घंटा लगता था। जेनरेशन बदलने के साथ तकनीकी विकास की चमक बढ़ी है। पत्रकारों की पहली पीढ़ी धोती पहनती थी, आज के पत्रकार जींस और टी-शर्ट पहनते हैं। पहले की पीढ़ी के पास सूचनाएं हासिल करने के माध्यम कम थे। स्रोत कम थे लेकिन विश्वसनीयता पक्की थी। खबरों पर लोगों का भरोसा ज्यादा था। 
आज की पीढ़ी के पास सूचनाओं के असंख्य स्रोत हैं। हालांकि इससे फायदा हुआ है तो नुकसान भी कम नहीं हुआ है। समाज में कंफ्यूजन भी बढ़ा है। समाज का भरोसा घटा है। खबरों के असंख्य स्रोत के कारण आज पत्रकारिता पर तरह-तरह के आरोप भी लगने लगे हैं। पुरानी पीढ़ी के सामने यह दिक्कत कम थी। आज जेन बीटा को सबसे ज्यादा चुनौती झेलनी पड़ेगी।
जेन अल्फा पीढ़ी अभी-अभी पूरी हुई है। इसमें 2010 से 2024 के बीच जन्मे बच्चे शामिल थे। यह पीढ़ी तकनीकी ज्ञान और स्मार्ट डिवाइसों के साथ बड़ी हुई है। जेन अल्फा के बाद जेन बीटा पीढ़ी की अभी-अभी शुरुआत हुई है। इसमें 2025 से 2039 के बीच जन्मे बच्चे शामिल होंगे। जेन बीटा पीढ़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीकों के साथ बड़ी होगी।
जेन बीटा को पत्रकारिता में कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जैसे फेक न्यूज, फेक चेहरे, आधुनिकता के अंतर्विरोध, मशीनों का दखल, मूल्यों का क्षरण, नैतिक जिम्मेदारी का ह्रास आदि।
लेकिन ऐसा नहीं लगता कि जेन बीटा के जीवन काल में भी खबरों के ढांचे में कोई बुनियादी फर्क आने वाला है। हालांकि इस पीढ़ी के पास चुनौतियों का सामना करने के लिए तकनीकी ताकत ज्यादा होगी‌। फिर भी खबरें तो तब भी लिखी और पढ़ी ही जाएंगी‌।
आपका क्या सोचना है कि जेन बीटा के जीवन काल में पत्रकारिता का मूल मंत्र बदल जाएगा? क्या तकनीकी चमक-दमक के बीच पत्रकारिता के उसूल टिक पाएंगे? क्या तकनीक और उसूलों के बीच टकराव होगा? और यदि ऐसा होता है तो यकीन मानिए यह बहुत ही दिलचस्प जंग होगी। 

#jouralism #ai #jung #genbeeta 

Sunday, 8 June 2025

कभी न चूकें पत्रकारिता में पांच मौके

पत्रकारों के करियर में पांच मौके बहुत महत्वपूर्ण और निर्णायक होते हैं। इन मौकों पर पत्रकारों को अपनी काबिलियत को साबित करना होता है। साथ ही ये मौके पत्रकारों के लिए अपनी क्षमता और कौशल को बढ़ाने के लिए भी बेहतरीन होते हैं। आइए समझते हैं कि ये पांच मौके क्या हैं और कब-कब मिलते हैं। 

*️⃣ पहला मौका - जब किसी भी मीडिया में जॉब मिलती है।

पत्रकार के लिए यह पहला मौका है जब उसके जीवन में सबसे बड़ा बदलाव आता है। यहां से जिंदगी का नया दौर शुरू होता है। इसलिए इस मौके पर अपने दिमाग के सारे दरवाजे को खोल देना चाहिए क्योंकि अब जो कुछ भी नया मिलने वाला है, उन्हें आत्मसात करना है। इसके बाद जो भी आपको मिलेगा, वह जीवन भर काम आएगा। इसलिए जो भी मिलता है उसे समेटते चले जाइए बल्कि इस समय खोज-खोजकर ज्ञान, हुनर और कौशल को अपनाते जाइए। ये सभी चीजें जीवन में बहुत काम आने वाली हैं। इस मौके पर कुछ चीजों से दूर रहने की जरूरत है, जैसे -

- पूर्वाग्रह

- इगो 

- बदतमीजी 

*️⃣ दूसरा मौका - जब पहला प्रमोशन मिलता है।

करियर में पत्रकार के लिए दूसरा मौका तब आता है जब वह पहला प्रमोशन पाता है। प्रमोशन मिलने का एक मतलब यह भी है कि आप सही जा रहे हैं। आप जिम्मेवारियों को अच्छी तरह निभा रहे हैं, आप पॉजिटिव हैं और आपको अपनी इसी लाइन ऑफ एक्शन को बरकरार रखना है। इसका दूसरा मतलब यह है कि अब आपकी जिम्मेदारी बढ़ गई है। संस्थान ने आप पर भरोसा दिखाया है, उसे बनाए रखना है। अब आपको पहले से बेहतर परफॉर्मेंस देना है। इसमें यदि आप सब एडिटर या रिपोर्टर हैं तो आपको सीनियर सब एडिटर या सीनियर रिपोर्टर बनाया जा सकता है। इस समय भी आपको कुछ चीजों से दूर रहना है, जैसे -

- तकरार 

- ईर्ष्या 

- गैर जिम्मेदाराना हरकत 

*️⃣ तीसरा मौका - जब बड़ी जिम्मेदारी मिलती है।

यह ऐसा मौका है जो थोड़ी मुश्किल से मिलता है। इसमें आप सीनियर सब एडिटर या रिपोर्टर से चीफ सब एडिटर या चीफ रिपोर्टर बनाए जा सकते हैं। इसका मतलब है कि आप अब एक टीम को लीड करेंगे और किसी टीम को लीड करने का मतलब है लीडर बनना। लीडरों में कुछ खास क्वालिटी होनी चाहिए जिसके दम पर वह अपनी टीम का भरोसा जीतता है, अपनी टीम पर भरोसा करना भी आना चाहिए। संस्थान ने आपके अंदर यह क्वालिटी देखी है। इसलिए आपको इसे साबित भी करना होगा। साथ ही अपनी टीम से काम भी लेना है। इस अवसर पर आपको अपनी इस क्वालिटी को और विकसित भी करना है ताकि भविष्य में और बड़ी भूमिका के लिए तैयार हो सकें। इस समय भी आपको कुछ चीजों से दूर रहना चाहिए, जैसे -

- अनुशासनहीनता 

- काम में ढिलाई 

- हल्का व्यवहार 

*️⃣ चौथा मौका - जब जिम्मेदारी और बड़ी हो जाती है।

चीफ सब एडिटर या चीफ रिपोर्टर डेस्क कर्मियों या रिपोर्टर की एक छोटी टीम को लीड करता है लेकिन जब इससे आगे का प्रमोशन मिलने के बाद आप डिप्टी न्यूज एडिटर बनेंगे या इसके समान किसी पद पर जाएंगे तब आपको और बड़ी भूमिका मिलेगी। हो सकता है आप पूरे संस्करण के इंचार्ज बना दिए जाएं या इसके बराबर की कोई जिम्मेदारी मिले। इसमें आपको छोटी टीम नहीं बल्कि काम का बड़ा सा इलाका मिलता है। यहां आपको एक बड़ा मौका मिलता है नेतृत्व की क्षमता, टीम चलाने की सूझबूझ, जिम्मेवारियां संभालने की कूवत और क्राइसिस मैनेजमेंट का हौसला सबकुछ साबित करने का। इस समय आपको इन चीजों से परहेज़ करना है 

- कोताही 

- लूज टॉक 

- पक्षपात 

पांचवां मौका - जब संपादक की जिम्मेदारी मिलती है।

यहां तक पहुंचना हर किसी का सपना होता है। इस मौके का मिलना आपकी मंजिल हो सकती है लेकिन आपको सुस्ताना नहीं है बल्कि दोगुने जोश के साथ काम करना है क्योंकि यहां आप पर ही पूरा दारोमदार है। आप जिस कश्ती पर सवार हैं, उसके खेवनहार भी आप ही हैं और पतवार भी। इसलिए अपनी अक्ल और सूझबूझ से नाव चलाते हुए मंजिल तक इसे पहुंचाना आपकी जिम्मेदारी है। आप पर दोस्तों की नजर होगी और दुश्मनों की भी। चौबीस घंटे आप पर प्रबंधन की नजर भी बनी रहेगी। यहां आपको अब तक सीखे हुए अपने हर हुनर और कौशल को झोंक देना है। यहां आपको टीम नहीं चलाने के लिए पूरा अखबार मिलेगा। अखबार के कई संस्करण मिलेंगे ‌यानी काम करने और खुद को साबित करने का भरपूर मौका मिलेगा। खुलकर काम कीजिए और करवाइए। चूंकि आप पूरे संस्करण के अभिभावक हैं, इसलिए लेकिन अपने अंदर इन गुणों को बरकरार रखिए, जैसे,

- संवेदनशीलता 

- विनयशीलता 

- दयालुता 

कुछ चीजों से बचकर रहिए, जैसे -

- चुगली 

- चापलूसी 

- चौपाल 

ये पांच मौके सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, हर करियर में मिलते हैं। तो यह फार्मूला सभी नौकरी-पेशा पर लागू हो सकता है। आप किसी भी तरह की नौकरी करते हैं, इस फार्मूले को गांठ बांध लीजिए, आज़मा लीजिए, गारंटी है निराश नहीं होंगे।

#journalism, #formula #opportunities #five  





Saturday, 7 June 2025

हिंदी अखबारों में सब एडिटर कैसे बनें

दोस्तो, जब आप पत्रकारिता की डिग्री लेकर अपने संस्थान से बाहर निकलेंगे/ निकलेंगी और अखबारों के दरवाज़े पर खड़े होकर नौकरी कै लिए दस्तक देंगे तब कोई भी अखबार आपको सीधे सब एडिटर या रिपोर्टर नहीं बना देगा। अखबार आपको पहले ट्रेनी जर्नलिस्ट या प्रशिक्षु पत्रकार बनाएगा। एक या दो साल आपको इसी पद पर काम करना होगा। फिर अखबार तय करेगा कि आपको जूनियर सब एडिटर बनाया जाए या जूनियर रिपोर्टर। ये दोनों अलग-अलग पद हैं। (सब एडिटर डेस्क पर काम करता है और रिपोर्टर फिल्ड में। हालांकि आजकल अखबारों में सब एडिटर/रिपोर्टर रखने का चलन है ताकि जब चाहें प्रोफाइल बदल दें।) फिर इस पद पर दो साल काम करने के बाद आप सब एडिटर या रिपोर्टर बन सकते हैं लेकिन यह सब कुछ आपके परफॉर्मेंस पर निर्भर करेगा। 

यह है किसी भी हिंदी अखबार में सब एडिटर बनने का रास्ता। इसके दो फायदे हैं 

1️⃣ हिंदी अखबारों में ट्रेनी के रूप में एंट्री आसानी से मिल सकती है। 

2️⃣ ट्रेनिंग के दौरान आप वह सब कुछ सीख जाएंगे जो आप नहीं जानते हैं और जिसकी पढ़ाई आपने पत्रकारिता के कोर्स के दौरान नहीं की है। 

इसलिए पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने वाले हर शख़्स के लिए जरूरी है कि वह किसी अखबार में कम से कम एक-दो साल की ट्रेनिंग अवश्य ले। यही ट्रेनिंग आपके करियर की आधारशिला बनने में मदद करेगी और फिर आपके करियर को उड़ान देगी। 

इसलिए पत्रकारिता की डिग्री हाथ में आने के फौरन बाद किसी अखबार में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में प्रवेश पाने की कोशिश शुरू कर दें। कभी-कभी कुछ लोगों को यह मौका पढ़ाई के तीसरे बर्ष के दौरान ही मिल जाता है। तो इसके लिए भी कोशिश करते रहें। इस मामले में सही जानकारी और सलाह जबरदस्त काम करती है। तो सलाह भी लेते रहें।

पत्रकारिता के पांच यार कर देंगे बेड़ा पार

पत्रकारिता में कुछ स्किल ऐसी होती हैं जो समय पर या समय से पहले सीख लेने से प्रोफेशनल लाइफ आसान हो जाती है। परेशानी की जगह इत्मीनान हो जाता है। आज इन्हीं स्किल की चर्चा करते हैं। 

*️⃣ सबसे पहली स्किल है अपने अंदर स्ट्रांग न्यूज सेंस विकसित करना। पत्रकारिता में खबरों की समझ होना सबसे जरूरी चीज है। आपमें यदि न्यूज सेंस की कमी है तो आप पत्रकारिता में आने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करें। यदि न्यूज सेंस कमजोर है तो डेवलप करने की कोशिश करें। 

*️⃣ कैसे डेवलप करेंगे न्यूज सेंस? 

इसका एक तरीका यह हो सकता है। आज आप टीवी पर मुख्य समाचार सुन लीजिए। सिर्फ समाचार सुनिएगा, इसमें टीवी की रायता फैलाने वाली रिपोर्ट को शामिल नहीं करिएगा। मुख्य समाचारों को लिख लीजिए। अपने हिसाब से तय कीजिए कि इन खबरों में से कौन सी खबर कल के अखबार में पेज वन पर ली जा सकती है, कौन सी अंदर के पन्नों पर। अब पेज वन वाली खबरों में से तय कीजिए कि कौन-कौन सी खबर डबल कालम या उससे बड़ी ली जा सकती है। कौन सी खबर लीड बन सकती है। कौन सी खबर सिंगल कालम में ली जा सकती है। इसी तरह अंदर के पन्नों की खबरों के बारे में तय कर लें। दूसरे दिन अखबार में अपनी सूची से मिलान कीजिए कि आप कितने सही हैं या ग़लत। एक माह तक ऐसा कीजिए। आपका न्यूज सेंस बुलंद हो जाएगा।

*️⃣ दूसरी स्किल है न्यूज डेवलप करना। पत्रकारिता में यह स्किल भी बहुत जरूरी है। यदि आप अखबार में नौकरी नहीं कर रहे हैं तो आपके पास न्यूज डेवलप करने की सुविधा नहीं होगी। मैं बताता हूं कि आप कैसे यह सुविधा हासिल कर सकते हैं। आप किसी अखबार की वेबसाइट खोलिए। उसके होम पेज पर अनेक खबरों के शीर्षक दिखाई देंगे लेकिन खबरें नहीं। हेडिंग पर क्लिक करने के बाद खबर खुलती है। आप खबर नहीं खोलिए। दो चार हेडिंग चुन लीजिए। फिर उन पर ख़बरें डेवलप कीजिए। उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपने हेडिंग चुनी है- संपत्ति विवाद में बेटों ने पिता को मार डाला। इसे पढ़कर खबर समझ में आ रही है। अब काल्पनिक चरित्र, स्थान के हिसाब से खबर डेवलप कीजिए। ऐसा रोज़ दो चार खबरों के साथ कीजिए। इस पर मास्टरी हो जाएगी। 

*️⃣ तीसरी स्किल है खबर पुनर्लेखन। आप पूछोगे कि खबर पुनर्लेखन के लिए खबर कहां से आएगी। मैं बताता हूं कि खबर कहां से आएगी। खबर आएगी अखबार और वेबसाइट्स से। आप यहां से खबरें लीजिए और उन्हें दोबारा लिखिए। हालांकि ये खबरें पहले से ही संपादित हैं लेकिन आप यह समझें कि ये सभी असंपादित खबरें हैं। इन्हें नए तरीके से लिखिए। नया इंट्रो, शीर्षक और क्रासर बनाइए। देखिएगा आपने इन खबरों को नया एंगल दे दिया है। 

*️⃣ चौथी स्किल है अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद का अभ्यास। यह भी जरूरी स्किल में से एक है। कैसे होगा अनुवाद का अभ्यास। इसमें लिए मेहनत करनी होगी। अंग्रेजी अखबार की एक खबर का रोज अनुवाद करिए। साथ में अंग्रेजी हिन्दी शब्द कोष भी रखिए। जिन अंग्रेजी शब्दों का अर्थ नही पता है, उन्हें हिंदी अर्थ के साथ नोट करिए। एक माह ऐसा अभ्यास करने के बाद आप अनुवाद के मास्टर हो जाएंगे। 

*️⃣ पांचवीं स्किल है हिंदी टाइपिंग की। मोबाइल वाली नहीं, कंप्यूटर पर सीखने की बात कर रहा हूं।अखबार में नौकरी शुरू करने से पहले इसे सीख लोगे तो प्रोफेशनल लाइफ आसान हो जाएगी। 

ये पांच स्किल हैं और इनके दम पर पत्रकारिता का किला फतह करना बहुत ही शानदार अनुभव होगा। 

Friday, 6 June 2025

कितनी खतरनाक है डंकी रूट की पत्रकारिता

डंकी रूट से हर कोई परिचित हैं। यह माइग्रेशन का अवैध रूट है जिसकी सहायता से बिना वैध कागजातों के एक देश से दूसरे देश में प्रवेश किया जाता है। पत्रकारिता में भी ऐसे डंकी रूट हैं जिससे बिना वैध आइडेंटिटी और प्रशिक्षण के इस क्षेत्र में घुसपैठ की जाती है और फिर पत्रकारिता के मानकों की धज्जियां उड़ाई जाती है। ये वे लोग हैं जिनका उद्देश्य पत्रकारिता करना नहीं है बल्कि पत्रकारिता के नाम का इस्तेमाल किसी अन्य स्वार्थ को पूरा करना होता है। डंकी रूट की पत्रकारिता का मतलब है गैर-पारंपरिक, अनैतिक या शॉर्टकट तरीकों से खबरें बनाना या पत्रकार बनने की कोशिश करना। 

डंकी रूट एक ऐसा तरीका है जिसका इस्तेमाल कर लोग पत्रकारिता का उपयोग गलत मंसूबों को पूरा करने के लिए करते हैं। इसका उपयोग अक्सर अवैध या अनैतिक तरीकों से समाचार इकट्ठा करने या जानकारी प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इस तरीके से बनाया गया समाचार समाज के लिए घातक हो सकता है, सामाजिक ताना-बाना को नुक़सान पहुंचा सकता है। ऐसे समाचारों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए भी किया जा सकता है। कुछ उदाहरणों से बात स्पष्ट हो सकेगी -

*️⃣ फेक न्यूज 

डंकी रूट की पत्रकारिता में फेक या फर्जी न्यूज बनाना और फैलाना सबसे बड़ा काम है। आज की दुनिया में फेक न्यूज सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। इससे बचना मुश्किल है क्योंकि इसे बनाने में डंकी रूट वाले पत्रकारों के साथ वे भी शामिल हो रहे हैं जो प्रशिक्षित पत्रकार हैं। बिना सत्यापन के बनाई गई कोई भी खबर फेक न्यूज है। 

*️⃣ नैतिक मापदंडों का उल्लंघन 

पत्रकारिता में डंकी रूट का उपयोग अक्सर पत्रकारिता के नैतिक मानकों का उल्लंघन करता है और खबरों को सनसनीखेज बनाता है। इससे समाचार की विश्वसनीयता और पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है। पत्रकारों को हमेशा नैतिक मानकों का पालन करना चाहिए और जानकारी प्राप्त करने के लिए वैध और पारदर्शी तरीकों का उपयोग करना चाहिए।

*️⃣ स्रोतों का स्पष्ट नहीं होना 

डंकी रूट की पत्रकारिता में स्रोत स्पष्ट नहीं होते हैं और कभी-कभी तो खबरों में कोई स्रोत होता ही नहीं है। बिना स्रोत की खबरें रिपोर्टर की कपोल कल्पना मानी जाती है। इसमें अविश्वसनीय या अनैतिक स्रोतों से जानकारी प्राप्त की जाती है। जानकारी प्राप्त करने के लिए छिपे हुए या धोखेबाज़ तरीके को अपनाया जाता है।

*️⃣ माइक उठाया और बन गए रिपोर्टर 

कुछ लोग बिना जर्नलिज्म की डिग्री या अनुभव के, सोशल मीडिया या अवैध माध्यमों से सिर्फ माइक उठाकर पत्रकार बन जाते हैं। ऐसे लोगों को पत्रकारिता के कायदे-कानून पता नहीं होते हैं और वे सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए खबरें बनाने लगते हैं। ऐसे लोग सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर खबरों को नाटकीय ढंग से पेश करते हैं। आज तो यह खुले आम हो रहा है। 

*️⃣ दबाव की पत्रकारिता 

डंकी रूट की पत्रकारिता का खास चरित्र है कि यह या तो किसी पर दबाव डालने या किसी दबाव में आकर की जाती है। यह दोनों स्थिति पत्रकारिता के लिए घातक है।

Thursday, 5 June 2025

अखबार के फर्स्ट फोल्ड का महत्व

पत्रकार होने के नाते क्या आपने कभी अखबार के फोल्ड के ऊपर और फोल्ड के नीचे की स्पेस के बारे में सोचा है? समझा है कि इन दोनों स्पेस का क्या महत्व है? आइए आज इसके बारे में समझने की कोशिश करते हैं 

ब्रॉड शीट अखबार 50-52 सेंटीमीटर लंबा और 32-33 सेंटीमीटर चौड़ा होता है। यह अमूमन आठ कॉलम में विभक्त होता है। द टेलीग्राफ अपवाद है। इसे जब बराबर साइज में मोड़ा जाए तो लगभग 25-25 सेंटीमीटर में बंटता है। यानी 25 सेंटीमीटर ऊपर का हिस्सा और 25 सेंटीमीटर नीचे का हिस्सा। यह जो ऊपर का हिस्सा है, यह अखबारों के लिए सबसे कीमती स्पेस है। खबरों के लिहाज से यह स्पेस सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यही हिस्सा सामने दिखता है और इस स्पेस पर छपी खबरें या सामाग्रियां ही उन पाठकों को आकर्षित करती हैं जो फ्लोटिंग हैं। अखबार की दुनिया में फ्लोटिंग रीडर्स सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये रीडर्स किसी एक अखबार के समर्पित पाठक नहीं होते हैं। इनके बारे में यह कहा जाता हैं यह स्टॉल्स पर जाते हैं और जिस अखबार की खबरें उन्हें अच्छी लगती हैं, वे उसे खरीद लेते हैं। स्पष्ट है कि उन्हें अखबार के फोल्ड के ऊपर की खबरें ही दिखाई पड़ती हैं और वे इन्हीं खबरों के आधार पर अखबार खरीदते हैं। हालांकि ऐसे पाठकों को अखबार बेचने के मामले में अखबार विक्रेता भी अपनी मनमर्जी चलाते हैं। अखबारों की दुनिया में फ्लोटिंग रीडर्स को मेहमान पाठक भी कहा जाता है और अखबार वाले इन मेहमान पाठकों को अपने घर में स्थायी तौर पर बसाने की कोशिश करते रहते हैं। यह कोशिश कैसे की जाती है, इसके बारे में फिर कभी बात करेंगे।

इस तरह हमने देखा कि अखबार का ऊपरी हिस्सा यानी अखबार का फर्स्ट फोल्ड कितनी बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए अखबार का फर्स्ट फोल्ड बहुत ही चुस्त और विविधतापूर्ण तरीके से बनाया जाता है। इस स्पेस की खबरों का चयन खबरों की पठनीयता के आधार पर किया जाता है। लीड और सेकेंड लीड के अलावा उन खबरों को लगाया जाता है जो लोगों की रुचि और जरूरत के अनुरूप होती हैं। जाहिर है इस स्पेस पर पाठकों को खींच कर लाने वाली खबरें लगाने का प्रयास किया जाता है। 

यह स्पेस विज्ञापनों के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस स्पेस पर अक्सर आठ कॉलम की पांच सेंटीमीटर चौड़ी पट्टी वाला विज्ञापन लगाया जाता है। इस विज्ञापन के लिए अखबार चार्ज भी तगड़ा वसूलते हैं। यह चार्ज अखबारों की हैसियत के हिसाब से तय होता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि अखबार का निचला हिस्सा यानी सेकेंड फोल्ड कम महत्वपूर्ण होते हैं। अखबार जब पूरा खुलता है तब दोनों फोल्ड सामने होते हैं और यही पूरा अखबार है। अखबार खुलने के बाद दोनों फोल्ड का महत्व बराबर हो जाता है। इसलिए किसी भी अखबार के पूरे पेज वन को एक जैसी गंभीरता और शिद्दत के साथ तैयार किया जाता है। ऐसा नहीं है कि फर्स्ट फोल्ड पर ज्यादा और सेकेंड फोल्ड पर कम मेहनत की जाती है। दोनों फोल्ड पर समान मेहनत की जाती है ताकि पूरा पेज वन मजबूत और पठनीय बन सके‌।

पेज वन में ही अखबारों की जान बसी होती है। इसलिए इस पेज को तैयार करने में अखबार की क्रीम टीम को लगाया जाता है। इसमें उप संपादक से लेकर संपादक तक सक्रिय रूप से लगे रहते हैं। खबरों के चयन से लेकर खबरों की प्लेसिंग तक सावधानी रखनी होती है। एक भी खबर की गलत प्लेसमेंट दूसरे दिन अखबार को नुक़सान पहुंचा सकती है। 

पत्रकारिता के छात्रों को हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के अखबारों के पेज वन का अध्ययन करना चाहिए और इस पर अपने नोट्स बनाने चाहिए। भविष्य में ये काम आएंगे।

Wednesday, 4 June 2025

अखबारों में मास्टहेड और फोलियो का रिश्ता

दुनिया आपको क्यों पहचानती है क्योंकि आपका एक नाम और एक चेहरा है। हो सकता है आपके नाम वाले कई व्यक्ति हों लेकिन आपका चेहरा सिर्फ आपका है। यह किसी और का नहीं हो सकता है। ठीक इसी तरह हर अखबार का एक नाम और एक चेहरा होता है और इसी चेहरे को मास्टहेड कहते हैं जिस पर अखबार का नाम लिखा होता है। किसी एक अखबार का मास्डहेड दूसरे के जैसा नहीं हो सकता है। इसलिए आप अखबारों की भीड़ में दबे हुए अपने पसंदीदा अखबार की एक छोटी सी झलक देखकर भी उसको पहचान लेते हैं। यह मास्डहेड की खूबी और ताकत है। इसलिए मास्टहेड में जल्दी बदलाव नहीं किया जाता है क्योंकि यह किसी अखबार के ब्रांड की पहचान है और यह पहचान एक दिन में नहीं बनती है। इसे बनाने में दशकों का समय लगता है। यही पहचान पाठकों की पीढ़ी दर पीढ़ी को ट्रांसफर होती रहती है और अखबार को जीवित रखती है।


कहां होता है मास्टहेड 

मास्टहेड को सामान्य भाषा में नेमप्लेट या नाम पट्टी भी कह सकते हैं। यह अखबार के पहले पन्ने के टॉप में चौड़ी पट्टी की तरह होता है। यह पहले पन्ने पर होता है, इसलिए मास्टहेड कहलाता है। 


इसमें क्या लिखा होता है 

इसमें लिखी गई हर जानकारी महत्वपूर्ण है। सबसे बड़े प्वाइंट में अखबार का नाम लिखा जाता है। नाम लिखने की स्टाइल हर अखबार में अलग-अलग होती है और यही स्टाइल अखबार को एक अलग पहचान देती है। इसमें खास बात यह है कि यह स्टाइल कभी भी बदली नहीं जाती है। यह सदियों तक एक जैसी ही होती है। यदि आप किसी भी पुराने अखबार को देखेंगे तो दशकों पुरानी स्टाइल आज भी चल रही है। 

नाम के अलावा जिस दिन का अखबार है, वह तारीख, दिन, प्रकाशन वाले शहर का नाम लिखा होता है। साथ ही हिन्दी तिथि भी लिखी जाती है। पृष्ठ संख्या और संस्करण की जानकारी भी होती है। कुछ अखबार अंदर के पेजों की महत्वपूर्ण खबरों की सचित्र टीजर भी इस पर देते हैं। मास्टहेड के दोनों साइड के हिस्से को ईयर पैनल कहते हैं। पुराने समय में दोनों पैनल पर विज्ञापन छापे जाते थे लेकिन अब यहां तस्वीर के साथ खबरों की हेडिंग लगाई जाती है।

मास्टहेड का उद्देश्य पाठकों को प्रकाशन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करना होता है। 

कुछ अखबारों अंदर के पेजों खासकर लोकल पेज पर भी मास्टहेड जैसी चौड़ी पट्टी में अखबार का नाम लगाते हैं। इसे भी मास्टहेड कहते हैं लेकिन इसके ऊपर जानकारियां पहले पेज जैसी नहीं होती है।


क्या होता है फोलियो 

फोलियो अखबार के हर पन्ने के टॉप में लगी पतली सी पट्टी है। इस पट्टी के बीचोंबीच बड़े अक्षरों में पेज का नाम लिखा होता है। पेज के नाम पेज पर लगी खबरों के अनुसार होते हैं। जैसे, दिल्ली के लोकल पेजों पर दिल्ली, अपनी दिल्ली या इसी तरह का कोई नाम हो सकता है। यदि पूरे राज्य की खबरों का पन्ना है तो इसका नाम प्रादेशिक हो सकता है। इसी तरह हर पेज पर लगाई गई खबरों के हिसाब से नाम रखा जाता है। इस मामले में हर अखबार अपनी पसंद और जरूरत के हिसाब से नाम रखने के लिए स्वतंत्र हैं। पट्टी की एक तरफ अखबार का नाम, जगह का नाम, तारीख और दिन लिखा जाता है। आजकल दूसरी तरफ अखबार के वेबसाइट का एड्रेस लिखने का चलन है। 

खेल, कारोबार और संपादकीय पेजों पर विशेष तरह के फोलियो लगाने का चलन भी है। किसी खास मौके पर विशेष फोलियो बनाया जाता है। जैसे अभी ऑपरेशन सिंदूर के बाद लगभग सभी अखबारों में विशेष पेज छपते रहे हैं। इन पेजों पर अलग-अलग तरीके के फोलियो लगाए गए। ऐसे फोलियो की चौड़ाई सामान्य से ज्यादा हो सकती है, होती है। इसके नाम भी अलग-अलग रखे जाते हैं।

Tuesday, 3 June 2025

पत्रकारिता को लेकर चंद खुशफहमियां

पत्रकारिता को लेकर समझ के स्तर पर हमेशा से कुछ गलतफहमियां और कुछ खुशफहमियां रही हैं। आज से दो-तीन दशक पहले जब कोई व्यक्ति पत्रकार बनता था तब उसके दिमाग में पत्रकारिता को लेकर कुछ अलग तरह की खुशफहमियां होती थीं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं -

- पत्रकारिता से समाज बदल देंगे
- गरीबों की दशा सुधारेंगे
- देश में चेतना पैदा करेंगे
- शोषण के खिलाफ आवाज उठाएंगे
- सब-कुछ बदल देंगे

आज जब पत्रकारिता की डिग्री हाथ में लेकर बच्चे बाहर आते हैं तब उनके दिमाग में कुछ नई तरह की खुशफहमियां होती हैं। जैसे,

- डिग्री मिलते ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी 
- मीडिया में बहुत अच्छी सैलरी मिलती है
- फौरन न्यूज चैनल में एंकर बन जाएंगे
- खूब तरक्की होगी, सैलरी भी खूब बढ़ेगी
- जीवन खुशहाल रहेगा

लेकिन जब सच्चाई सामने आती है तब निराशा छाने लगती है। ऐसी स्थितियों में खुद को संभालने के लिए आज के समय के अनुसार कुछ उपाय करने चाहिए ताकि पीड़ा कम हो सके। सामयिक उपाय इस प्रकार हैं -
- पत्रकारिता के जुनून को बचाकर रखें, भविष्य में काम आएगा, वर्तमान में दिक्कत कम होगी
- नौकरी को नौकरी समझकर करें, पैशन नहीं। पीड़ा कम होगी
- जीवन का टारगेट सेट करें, प्रेरणा मिलेगी
- एक-दो नए हुनर सीखें, मन लगा रहेगा
- थोड़ी बहुत हुज्जत भी कर लिया करें, ऊर्जा लेवल बना रहेगा

सच्चाई तो यह है कि पत्रकारिता से समाज नहीं बदल रहा है बल्कि समाज पत्रकारिता को बदल रहा है। पत्रकारिता की हदें तय कर रहा है।
दूसरी सच्चाई यह है कि पत्रकारिता से जीवन खुशहाल नहीं बन रहा है। पत्रकारिता से सिर्फ घर चल रहा है और वह भी रोते-गाते।
#passion #job #journalism

Monday, 2 June 2025

अब दायित्व नहीं, प्रोफेशन बन गई है पत्रकारिता

आज से लगभग दो सौ साल पहले वर्ष 1826 में जब कोलकाता से उदन्त मार्तण्ड नाम से पहले हिंदी साप्ताहिक अखबार की शुरुआत हुई थी तब हिंदी पत्रकारिता का जन्म एक दायित्व के साथ हुआ था। इस अखबार को शुरू करने वाले पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इसकी शुरुआत हिंदी की सेवा और प्रगति के उद्देश्य के साथ की थी। उस समय उन्होंने देखा कि कोलकाता (तब देश की राजधानी) से  फारसी, बांग्ला, अंग्रेजी सभी भाषाओं में अखबार निकल रहे हैं लेकिन हिंदी भाषा में कोई अखबार नहीं निकलता है। तब उन्होंने हिंदी में भी अखबार निकालने का दायित्व उठाया और 30 मई, 1826 को उदन्त मार्तण्ड नामक से साप्ताहिक अखबार खड़ी बोली और ब्रजभाषा में शुरू किया। उदन्त मार्तण्ड का अर्थ है समाचार सूर्य। यह अखबार लगभग 19 महीने तक निकलता रहा लेकिन अर्थाभाव और मदद के अभाव के कारण बंद हो गया। भले ही लंबे समय तक इसका प्रकाशन नहीं हो पाया हो लेकिन इसने हिंदी पत्रकारिता की नींव डाल दी और आज उसी नींव पर हिंदी पत्रकारिता का परचम लहरा रहा है। 

इसका मतलब यह है कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही दायित्वों और जिम्मेवारियों को निभाने और चंद उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुआ है। हिंदी पत्रकारिता ने इसे साबित भी किया। आजादी की लड़ाई हो या सती प्रथा, छूआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियां के खिलाफ संघर्ष, हिंदी पत्रकारिता ने हरेक काम में हिस्सा लिया। जन जागरण का काम किया। समाज में हर तरह की कुरीतियों, संकीर्ण मानसिकता के खिलाफ जागरूकता फैलाई। आपातकाल हो या बिहार प्रेस बिल, सबका डटकर मुकाबला किया और प्रेस की आजादी को बहाल रखा। 

इस दौरान हिंदी पत्रकारिता ने अपने आप एक दायित्व की ओढ़ लिया था कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जन जागरण करेंगे और 21वीं शताब्दी की शुरुआत तक अपने इस दायित्व को पूरा भी करती रही लेकिन फिर हिंदी पत्रकारिता में दायित्व बोध कम होता चला गया। जैसे-जैसे तकनीकी विकास होता गया, मन बदलता गया। पत्रकारिता का उद्देश्य शिफ्ट होता गया। 'समाज के लिए पत्रकारिता' की भावना जगह पत्रकारिता में करियर की तलाश होने लगी। पत्रकारिता में मल्टीमीडिया की पढ़ाई शुरू हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि पत्रकारिता में एक उज्जवल भविष्य की संभावना दिखाई पड़ने लगी। समाज में पत्रकारिता की पहचान जब करियर के रूप में होने लगी तब अभिभावकों ने भी अपने बच्चों को इस तरफ भेजना शुरू कर दिया। पहले अभिभावक अपने बच्चों को पत्रकार बनाने में बिल्कुल भी रुचि नहीं लेते थे बल्कि इस क्षेत्र में जा रहे बच्चों पर लगाम लगा देते थे। कुछ हद तक यह अच्छा संकेत है। लेकिन जब समाज में पत्रकारिता करियर यानी प्रोफेशन यानी पेशा बन गई तो सब-कुछ बदल गया। दायित्व पूर्ति की भावना के साथ जिस हिंदी पत्रकारिता का आरंभ हुआ था, वह आज पेशा बन गई। इसे पेशा यानी प्रोफेशन के रूप में पहचान भी मिल गई। जैसे-जैसे यह पहचान मजबूत होती जाएगी, सामाजिक चेतना, सरोकार और सामाजिक दायित्व कम होता जाएगा। इन भावनाओं की जगह पेशा गत चालाकियां, बदमाशियां और अन्य चीजें भरती जाएंगी। कुछ नतीजे तो अभी से सामने आने लगे हैं। हिंदी पत्रकारिता में सिर्फ घटनाएं रिपोर्ट हो रही हैं, सिर्फ खबरें बन रही हैं। जनता का दर्द कहीं सहेजकर रिपोर्ट नहीं हो पा रहा है। सरकारों की चालाकियां सामने नहीं आ रही हैं। पिछड़ गए लोगों की पीड़ा सामने नहीं आ रही है। बहुत हुआ तो सड़क, बिजली, पानी पर सीरीज चला दी जाती है। पत्रकारिता का दायरा तय कर दिया गया है और उसे इस दायरे को दायित्व भी समझना पड़ रहा है।

खंडन और खंडन के कारणों पर गौर करें छात्र

पिछले दिनों दो प्रतिष्ठित अखबारों में पेज वन पर बहुत महत्वपूर्ण तरीके से समाचारों के खंडन प्रकाशित हुए हैं। इसमें एक हिंदी और दूसरे अंग्रेजी भाषा के अखबार हैं। 

पहला खंडन खुद को सबसे विश्वसनीय अखबार कहने वाले दैनिक भास्कर के 31 मई के दिल्ली संस्करण के पेज एक पर तीन कॉलम में दो लाइन हेडिंग के साथ छपा है। खंडन पेज वन के पहले फोल्ड में छपा है। दैनिक भास्कर ने 28 मई को  खबर प्रकाशित की थी कि भाजपा घर-घर सिंदूर पहुंचाएगी, 9 जून से शुरुआत। यह खबर गलत थी। भास्कर को पेज एक पर तीन कॉलम में खंडन छापना पड़ा और खेद भी व्यक्त करना पड़ा। 

इस खबर की सबसे बड़ी कमजोरी थी कि इसके बारे में भाजपा से आधिकारिक बयान नहीं लिया गया था। इसलिए इस बात पर जोर दिया जाता है कि हर खबर की पुष्टि जरूरी है। हर खबर पर सक्षम व्यक्ति से बात करनी जरूरी है। यह पत्रकारिता का सबसे बड़ा सिद्धांत है।

दूसरा खंडन टाइम्स ऑफ इंडिया के 2 जून के संस्करण में प्रकाशित हुआ है। यह भी पेज एक पर प्रकाशित हुआ है। हालांकि यह सिंगल कॉलम खबर है और संभवतः फोल्ड के नीचे छपा है लेकिन इसमें माफी मांगी गई है। टीओआई के लखनऊ और चेन्नई संस्करण में ख़बर छपी थी कि भाजपा कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका को अपने अभियान का चेहरा बनाएगी। खबर किसी प्रदेश स्तर के नेता के हवाले से थी लेकिन खबर गलत निकली।

इस खबर की कमजोरी यह थी कि इसके बारे में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से बात नहीं की गई थी। इसलिए अखबार को माफी मांगनी पड़ी।

Sunday, 1 June 2025

पत्रकारिता के छात्र जान लें, क्या होती है ग्रे लिस्ट और FATF

इस समय अखबारों में यह ख़बर लगातार छप रही है कि पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में शामिल करने के लिए भारत गंभीर प्रयास कर रहा है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत यह दबाव बना रहा है। पत्रकारिता के छात्रों को जानना चाहिए कि यह ग्रे लिस्ट होती क्या है और भारत क्यों पाकिस्तान को इस लिस्ट में डालने पर जोर दे रहा है। तो चलिए पहले समझते हैं 


ग्रे लिस्ट क्या है -

दरअसल ग्रे लिस्ट FATF यानी फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की एक सूची है जिसमें उन देशों को रखा जाता है जिन देशों को FATF द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्त-पोषण के खिलाफ कुछ उपाय करने के लिए कहा जाता है। लेकिन अभी उन देशों ने पर्याप्त उपाय नहीं किए हैं और उनमें अभी भी सुधार की आवश्यकता है। ऐसे देशों को ग्रे लिस्ट में रखा जाता है और उन पर कुछ पाबंदियां भी लगाई जाती है। ग्रे लिस्ट उन देशों या संस्थाओं की सूची है जो टैक्स हैवन या वित्तीय अपराधों में शामिल होने के संदेह के कारण अंतरराष्ट्रीय निगरानी में हैं। 


क्या है FATF

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) एक अंतर-सरकारी स्वतंत्र निकाय है जो मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद को आर्थिक सहायता और अन्य संबंधित खतरों का मुकाबला करने के लिए काम करता है। इसकी स्थापना 1989 में हुई थी और इसका मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में है। FATF की सदस्यता 39 देशों और दो क्षेत्रीय संगठनों (यूरोपीय आयोग और खाड़ी सहयोग परिषद) से मिलकर बनती है। भारत FATF का सदस्य है और सक्रिय रूप से इसके कार्यों में भाग लेता है।

आपको यह भी बता दें कि FATF एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो मनी लॉन्ड्रिंग, टेरर फाइनेंसिंग और हथियारों के प्रसार से जुड़ी फंडिंग पर निगरानी रखती है। जो देश इन गतिविधियों के खिलाफ जरूरी कदम उठाने में नाकाम रहते हैं, उन्हें FATF की "ग्रे लिस्ट" में डाल दिया जाता है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय कर्ज लेने की क्षमता पर पड़ता है। ग्रे लिस्ट में शामिल देश के सामने आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कई सख्त शर्तें रखी जाती हैं और अगर उन शर्तों को पूरा करने में वो देश नाकाम रहता है, तो फिर उसके ब्लैक लिस्ट होने का भी खतरा रहता है।

FATF के तीन मुख्य उद्देश्य हैं:

*️⃣ मनी लॉन्ड्रिंग का मुकाबला- FATF देशों को मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ प्रभावी कानून और नियम बनाने में मदद करता है।

*️⃣ आतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला- FATF आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए देशों को मदद करता है।

*️⃣ वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा- FATF वित्तीय प्रणाली को सुरक्षित बनाने और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए काम करता है।


क्या है भारत का पक्ष

भारत पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में शामिल करने की मांग कर रहा है क्योंकि उसका मानना है कि पाकिस्तान आतंकवाद को रोकने में नाकाम रहा है और वैश्विक संस्थाओं से मिले धन का इस्तेमाल आतंकवादियों को हथियार और धन मुहैया कराने में करता है। हाल ही में पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कूटनीतिक मोर्चा खोल रखा है और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ग्रे लिस्ट में पाकिस्तान को फिर से भेजने के लिए गंभीर कोशिशें शुरू कर दी हैं।

भारत सरकार ने पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान का हाथ होने को लेकर मजबूत सबूत तैयार करने शुरू कर दिए हैं। इसके अलावा भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मारे गये आतंकवादियों के जनाजे में जिस तरह से पाकिस्तान सेना के दर्जनों सीनियर अधिकारी शामिल हुए थे, भारत उसे भी बतौर सबूत पेश कर सकता है। भारत FATF के सदस्य देशों को इस बात के लिए राजी करने की कोशिश करेगा कि पाकिस्तान की सेना और आतंकवादी किस तरह से आपस में मिले हुए हैं। इसके अलावा भारत ये भी दलील दे सकता कि असल में वो पाकिस्तान की सेना ही है, जो आतंकवाद फैलाने का काम करती है। लिहाजा पाकिस्तान को FATF की ग्रे-लिस्ट में डालना अत्यंत जरूरी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत का साफ और स्पष्ट शब्दों में आरोप है कि पाकिस्तान ने अपने क्षेत्र से चलने वाले आतंकी संगठनों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। इसके उलट उसने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, खासकर IMF और विश्व बैंक से मिले फंड का इस्तेमाल हथियार और गोला-बारूद खरीदने में कर रहा है।

भारत की मांग के पीछे के तीन कारण

1️⃣ आतंकवाद का समर्थन- भारत का आरोप है कि पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों को समर्थन देता है और उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता है।

2️⃣ वैश्विक संस्थाओं का दुरुपयोग- भारत का मानना है कि पाकिस्तान वैश्विक संस्थाओं से मिले धन का इस्तेमाल आतंकवादियों को हथियार और धन मुहैया कराने में करता है।

3️⃣ आर्थिक दबाव- ग्रे लिस्ट में शामिल होने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ेगा और उसे अंतरराष्ट्रीय कर्ज लेने में मुश्किलें आएंगी।

FATF की बैठक इसी जून महीने में होने वाली है, जहां भारत पाकिस्तान के खिलाफ अपना मामला उठाएगा और उसे ग्रे लिस्ट में शामिल करने की मांग करेगा। भारत ने इस दिशा में अपनी कूटनीतिक कोशिशें भी तेज कर दी हैं। इसके लिए भारत ने अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ बातचीत शुरू की है‌। 

वैसे पाकिस्तान को इस लिस्ट में रहने का अनुभव है। पहले भी वह इस लिस्ट में रह चुका है। 



चाटुकारिता प्रतियोगिता

एक शहर में चाटुकारिता प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ अलग और अनोखे थे। इसके नियम इस सिद्धांत पर आधारित थे कि व्यक्ति चाटुकार नहीं होता है, पेशा चाटुकार होता है। कहने का मतलब यह कि पेशे में चाटुकारिता के गुण समाहित होते हैं। इसलिए व्यक्ति को मजबूरी में पेशा गत गुणों को अपनाना पड़ता है। इसके तहत प्रतियोगिता में भाग लेने वालों ने नकाब पहन रखा था ताकि उन्हें कोई पहचान नहीं सके। उनकी ड्रेस भी एक जैसी थी। संख्या में ये चार थे। हर प्रतियोगी को मंच पर भाषण देना था और जजों को उसके भाषण से उसके पेशे की पहचान करनी थी। यदि जज उसके भाषण से उसके पेशे को पहचान नहीं कर पाते तो उसे पुरस्कृत किया जाना था। यह माना जाता कि बंदा अपने पेशे के प्रति इमानदार है और पेशे के गुणों को पूरी तरह आत्मसात कर चुका है लेकिन पेशे की इज्जत बचाना भी उसे आता है। प्रतियोगिता शुरू हुई। पहला प्रतियोगी मंच पर आया। उसने बोलना शुरू किया -

भाइयो, चाटुकारिता मेरे खून में है क्योंकि यह हमारा खानदानी पेशा है। मेरे पूर्वजों ने चाटुकारिता के दम पर बड़े-बड़े ओहदे हासिल किए हैं। लेकिन हम चाटुकारिता में भेदभाव नहीं करते। जब जैसी जरूरत होती है वैसी चापलूसी करते हैं। हमारी सबसे बेहतरीन चापलूसी हर पांच साल में आप देखते हैं। उसके इतना बोलते ही जजों ने कहा, आप नेता हो। उसने नक़ाब हटा दिया। लोगों ने उन्हें पहचाना। वे शहर के जाने-माने नेता निकले।

फिर दूसरे नकाबपोश ने माइक संभाला। वह बोला, देखिए ऐसा है कि हमारे यहां तो चाटुकारिता उच्च स्तर की भी होती है और निम्न स्तर की भी। देखना होता है कि आपका स्तर क्या है। उसी के अनुसार चाटना पड़ता है। वैसे बिना चाटुकारिता के हमारे यहां कुछ नहीं होता है क्योंकि हम लोग बिना लेन-देन के कोई काम नहीं करते। जजों ने उसे भी पहचान लिया। वे एक बड़े सरकारी अधिकारी थे।

अब तीसरे नकाबपोश की बारी थी। वह आया और बोलने लगा-हमारे पेशे की चाटुकारिता कुछ अलग किस्म की होती है। हम लोग साल भर में कितनी चाटुकारिता करनी है, उसका कोटा तय कर लेते हैं। इसका फायदा यह होता है कि हमारे सामने हमारा टारगेट फिक्स होता है। टारगेट शब्द ने उसकी पहचान बता दी। जजों ने कहा, यह कारपोरेट जगत में बड़ी हस्ती है।

अब अंतिम नकाबपोश मंच पर आता है। दुबला-पतला शरीर, हल्की झुकी हुई कमर से यह आभास हो रहा था कि वह मंझा हुआ चाटुकार है। वह बोला, हमारे प्रोफेशन में चाटुकारिता बहुत ही व्यक्तिगत चीज है। करते सभी हैं लेकिन किसी को बताते नहीं है। सार्वजनिक रूप से यह काम नहीं किया जाता है। सभी अलग-अलग समय में अलग-अलग तरीके से चाटुकारिता करते हैं। चाटुकारिता इतनी महीन होती है कि जिसकी हो रही है, उसे भी समझने में थोड़ा समय लगता है। वह बोला, हमारे प्रोफेशन में हर रोज़ चाटुकारिता के नए-नए तरीके भी खोजे जाते हैं। यह ऐसी स्किल है जिसके अनेक नाम हैं। 

नकाबपोश बोले जा रहा था और जजों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि इसका प्रोफेशन क्या है। समय बीतता जा रहा था और जजों की बेचैनी बढ़ रही थी। अंततः समय समाप्त हो गया और जज उसे पहचान नहीं पाए। फिर उसे विजेता घोषित कर दिया गया। जजों ने उसे नक़ाब हटाने को कहा। उसने नक़ाब हटाया और सबने देखा सामने शहर का चर्चित पत्रकार खड़ा है। उसे सर्वोत्तम चाटुकार का ताज पहनाते समय जज सोच रहे थे कि पत्रकारिता में कुछ लोग ही छुपे रुस्तम होते हैं या सभी।

(यह एक काल्पनिक कहानी है। वास्तविकता से इसका कोई लेना-देना नहीं है।)