Monday, 9 June 2025

जेनरेशन चाहे जितनी मॉर्डन हो जाए, अखबार आज भी वैसे ही निकलता है

लोग कहते हैं कि अब जेन बीटा का युग आ गया है। इस युग में सब-कुछ हाई-फाई हो गया है। संवाद से लेकर मैसेजिंग का अंदाज बदल गया है। हाथों की जगह मशीनें काम करती हैं। जेन बीटा (2025-2039) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और वर्चुअल रियलिटी के साथ बड़ी होगी। एआई सबको सबकुछ सिखा-पढा रहा है और आगे भी सिखाएगा। गुरुओं की अब जरूरत नहीं होगी। 

ये सारे बातें सही हो सकती हैं। भले ही दुनिया कितनी भी बदल गई हो लेकिन अखबार में खबरें आज भी वैसे ही लिखी जाती हैं जैसे दशकों पहले लिखी जाती थीं। जेन बीटा हो या अल्फा या जेड, आज भी वही आठ कॉलम का अखबार है, वही लीड खबर है, वैसे ही शीर्षक लगते हैं, वैसा ही सब हेड भी बनता है। तकनीक भले ही कितनी भी आगे क्यों न चली गई हो लेकिन पत्रकारिता तो वही है। पत्रकारिता के मूल्य वही हैं। नैतिक जिम्मेदारी वही है। पत्रकारिता की आजादी के सवाल वही हैं। अखबारों में काम करने वाले चाहे जितने भी मॉर्डन हो गए हों लेकिन उन्हें खबरें तो वैसे ही लिखनी है जैसे पहले लिखी जाती थी। इंट्रो भी वैसा ही लिखना है। इंट्रो में आज भी फाइव डब्ल्यू और वन एच का फार्मूला अपनाया जाना है। खबरों की पुष्टि पहले भी होती थी, आज भी होती है। खबरों में स्रोत की जरूरत पहले भी थी, आज भी है। ऐसा तो नहीं है कि आप जेन बीटा के पत्रकार हो तो आप बिना पुष्टि और स्रोत के खबरें छाप दोगे। खबरों का संपादन भी वैसे ही करना है जैसा आज से दशकों पहले किया जाता था। पहले भी भाषा शुद्ध लिखना ज़रूरी था, आज भी जरूरी है। किसी भी जेनरेशन को ऐसी सुविधा नहीं मिली है कि वे भाषा अशुद्ध लिखें और अखबार में नौकरी कर लें। ध्यान रखने की जरूरत है कि यहां मैं सिर्फ अखबारों की बात कर रहा हूं।

तो फिर दोस्तो, बदला क्या है। बदला है सिर्फ काम करने का तरीका। आज जिस काम को करने में दस मिनट का समय लगता है, पहले उसी काम को करने में एक घंटा लगता था। जेनरेशन बदलने के साथ तकनीकी विकास की चमक बढ़ी है। पत्रकारों की पहली पीढ़ी धोती पहनती थी, आज के पत्रकार जींस और टी-शर्ट पहनते हैं। पहले की पीढ़ी के पास सूचनाएं हासिल करने के माध्यम कम थे। स्रोत कम थे लेकिन विश्वसनीयता पक्की थी। खबरों पर लोगों का भरोसा ज्यादा था। 
आज की पीढ़ी के पास सूचनाओं के असंख्य स्रोत हैं। हालांकि इससे फायदा हुआ है तो नुकसान भी कम नहीं हुआ है। समाज में कंफ्यूजन भी बढ़ा है। समाज का भरोसा घटा है। खबरों के असंख्य स्रोत के कारण आज पत्रकारिता पर तरह-तरह के आरोप भी लगने लगे हैं। पुरानी पीढ़ी के सामने यह दिक्कत कम थी। आज जेन बीटा को सबसे ज्यादा चुनौती झेलनी पड़ेगी।
जेन अल्फा पीढ़ी अभी-अभी पूरी हुई है। इसमें 2010 से 2024 के बीच जन्मे बच्चे शामिल थे। यह पीढ़ी तकनीकी ज्ञान और स्मार्ट डिवाइसों के साथ बड़ी हुई है। जेन अल्फा के बाद जेन बीटा पीढ़ी की अभी-अभी शुरुआत हुई है। इसमें 2025 से 2039 के बीच जन्मे बच्चे शामिल होंगे। जेन बीटा पीढ़ी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीकों के साथ बड़ी होगी।
जेन बीटा को पत्रकारिता में कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जैसे फेक न्यूज, फेक चेहरे, आधुनिकता के अंतर्विरोध, मशीनों का दखल, मूल्यों का क्षरण, नैतिक जिम्मेदारी का ह्रास आदि।
लेकिन ऐसा नहीं लगता कि जेन बीटा के जीवन काल में भी खबरों के ढांचे में कोई बुनियादी फर्क आने वाला है। हालांकि इस पीढ़ी के पास चुनौतियों का सामना करने के लिए तकनीकी ताकत ज्यादा होगी‌। फिर भी खबरें तो तब भी लिखी और पढ़ी ही जाएंगी‌।
आपका क्या सोचना है कि जेन बीटा के जीवन काल में पत्रकारिता का मूल मंत्र बदल जाएगा? क्या तकनीकी चमक-दमक के बीच पत्रकारिता के उसूल टिक पाएंगे? क्या तकनीक और उसूलों के बीच टकराव होगा? और यदि ऐसा होता है तो यकीन मानिए यह बहुत ही दिलचस्प जंग होगी। 

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