एआई दोस्त या दुश्मन? दुनिया में अभी यह बहस जारी है। एआई को दोस्त बताने वाले इसे भविष्य का निर्माता बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मानव प्रगति की गति को तेज करने में यह अग्रणी भूमिका निभाएगा। लेकिन दूसरी ओर एआई को मानवता के लिए बड़ा खतरा बताने वाले भी कम नहीं हैं। इनका कहना है कि एआई जब बेलगाम हो जाएगा तब मानवता को कदम-कदम पर दुख देगा और तब इससे बचने का कोई रास्ता इंसानों के पास नहीं होगा। सच्चाई क्या है। पहले यह समझते हैं कि एआई के कारण पत्रकारिता में क्या-क्या बेहतर होगा यानी सकारात्मक बदलाव क्या होंगे।
सकारात्मक बदलाव
ऐसी चर्चा है कि हिंदी पत्रकारिता में एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के प्रभाव से कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आने की संभावना है। इन परिवर्तनों से क्षमता और दक्षता बढ़ने की उम्मीद की जा रही है। कुछ उम्मीदें इस प्रकार हैं -
ऑटो राइटिंग
यह कहा जा रहा है कि एआई क्रिकेट स्कोर, मौसम पूर्वानुमान, या शेयर बाजार अपडेट जैसे डेटा-आधारित छोटे समाचारों को ऑटोमैटिक रूप से लिखने में सक्षम है। यदि इन कामों की जिम्मेदारी एआई आधारित टूल्स को सौंप दिया जाता है तो पत्रकारों का समय बचेगा और वे इस समय का उपयोग ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण काम में लगा सकते हैं।
अनुवाद का काम
एआई हिंदी समाचारों को अन्य भारतीय भाषाओं में तेजी से अनुवाद कर सकता है, जिससे पाठकों का दायरा बढ़ेगा और क्षेत्रीय पहुंच में सुधार होगा।
टेक्स्ट निर्माण
एआई टूल्स साक्षात्कार या प्रेस कॉन्फ्रेंस को टेक्स्ट में बदल सकते हैं। इतना ही नहीं वे टेक्स्ट का सार भी अलग से निकाल सकते हैं। इस काम में यदि इन्हें लगाया जाता है तो पत्रकारों का काफी समय बच सकता है।
डाटा विश्लेषण
एआई बड़े डाटा सेट का विश्लेषण करके जटिल रुझानों को उजागर कर सकता है, जिससे खोजी पत्रकारिता को बल मिलेगा।
नकारात्मक प्रभाव
लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि इतने कामों को एआई को सौंप दिया जाता है तो इन कामों में लगे पत्रकार कहां जाएंगे। हिंदी पत्रकारिता में जॉब के मौके शुरू से ही कम मिलते रहे हैं। सामर्थ्यवान हिंदी अखबारों की संख्या बहुत ही सीमित है। इनमें भी यदि आधे से ज्यादा काम एआई के टूल्स करने लगेंगे तब मनुष्य क्या करेंगे क्योंकि ज्यादा बड़े और महत्वपूर्ण कामों में पहले से ही पत्रकार लगे हुए हैं। एआई टूल्स के कारण बेरोजगार होने वाले पत्रकार को नौकरियां कहां मिलेगी, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। इसलिए कम से कम हिंदी के संदर्भ में हमें बहुत सोच-समझकर एआई को प्रवेश दिलाना चाहिए। एआई के कुछ नुकसान इस प्रकार हो सकते हैं -
मैनपावर पर असर
- एआई स्वचालित टूल्स (जैसे ChatGPT आदि) के कारण पत्रकारों की भूमिका कम हो सकती है। डेटा-आधारित रिपोर्टिंग, अनुवाद और समाचार संकलन जैसे क्षेत्रों में इसका असर दिख सकता है।
- छोटे मीडिया संस्थानों में रिपोर्टरों की आवश्यकता घट सकती है क्योंकि एआई कम लागत में समाचार उत्पादन कर सकता है।
विश्वसनीयता पर खतरा
- एआई द्वारा बनाए गए फेक वीडियो या झूठे समाचार हिंदी भाषी क्षेत्रों में तेज़ी से फैल सकते हैं जिससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है।
- चुनावों या सामाजिक विवादों के दौरान एआई-जनित अफवाहें हिंसा या अशांति को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे पत्रकारिता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदना पर असर
- एआई-जनित समाचारों में मानवीय संवेदनाओं की कमी हो सकती है क्योंकि एआई टूल्स महसूस नहीं कर सकते हैं। उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं है। वे सामाजिक सरोकार से भी कोई वास्ता नहीं रखते हैं। इसलिए लोकल मुद्दों के प्रति उनका रवैया रूखा होगा। मानवीय एंगल की कहानियों का विश्लेषण भी एआई यंत्रवत ही करेगा। इनके साथ पाठकों का भावनात्मक जुड़ाव कम होगा। पाठकों को खबर पढ़ने में मजा नहीं आएगा।
असल में एआई हिंदी पत्रकारिता के लिए एक दोधारी तलवार है। हालांकि यह दक्षता और पहुंच बढ़ाता है, लेकिन इससे होने वाले दुरुपयोग, रोज़गार संकट और नैतिक दुविधाओं जैसी चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भविष्य में इन जोखिमों को कम करने के लिए अनेक तरह के कायदे-कानून बनाने होंगे ताकि एआई के दुष्प्रभावों से बचा जा सके। यदि इससे बचाव का रास्ता नहीं निकाला गया तो भविष्य में एआई क्या-क्या गुल खिलाएगा, अभी कहना मुश्किल है।
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