घर और दफ्तर दो ऐसी जगहें हैं जहां हम अपना सबसे ज्यादा टाइम बिताते हैं। इसलिए इन दो जगहों की हरेक चीज का हम पर असर होता है, हर छोटी-बड़ी घटना हमें परेशान कर सकती है। घर तो घर है, यहां होने वाली हर घटना हमारी निजी थाती है लेकिन दफ्तर सार्वजनिक स्थल है जहां घटने वाली हर घटना का असर व्यापक होता है और यदि आपके दफ्तर में किचकिच, खिचखिच ज्यादा है और उसे आप घर तक ला रहे हैं या घर तक लाना आपकी मजबूरी है तो क्या होगा। तीन बातें हो सकती हैं-
- घर में व्याप्त शांति में व्यवधान आ सकता है।
- आप दफ्तर की किचकिच निपटाओगे और उधर घर पर नई किचकिच पैदा होती चली जाएगी।
- फिर आप दोहरी किचकिच में उलझ जाओगे और जिंदगी झंड हो जाएगी।
इससे बचने का एकमात्र और सच्चा रास्ता यह है कि दफ्तर की किचकिच दफ्तर में ही निपटाओ। दफ्तर से वापस अकेले घर आओ।
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