Monday, 2 June 2025

अब दायित्व नहीं, प्रोफेशन बन गई है पत्रकारिता

आज से लगभग दो सौ साल पहले वर्ष 1826 में जब कोलकाता से उदन्त मार्तण्ड नाम से पहले हिंदी साप्ताहिक अखबार की शुरुआत हुई थी तब हिंदी पत्रकारिता का जन्म एक दायित्व के साथ हुआ था। इस अखबार को शुरू करने वाले पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इसकी शुरुआत हिंदी की सेवा और प्रगति के उद्देश्य के साथ की थी। उस समय उन्होंने देखा कि कोलकाता (तब देश की राजधानी) से  फारसी, बांग्ला, अंग्रेजी सभी भाषाओं में अखबार निकल रहे हैं लेकिन हिंदी भाषा में कोई अखबार नहीं निकलता है। तब उन्होंने हिंदी में भी अखबार निकालने का दायित्व उठाया और 30 मई, 1826 को उदन्त मार्तण्ड नामक से साप्ताहिक अखबार खड़ी बोली और ब्रजभाषा में शुरू किया। उदन्त मार्तण्ड का अर्थ है समाचार सूर्य। यह अखबार लगभग 19 महीने तक निकलता रहा लेकिन अर्थाभाव और मदद के अभाव के कारण बंद हो गया। भले ही लंबे समय तक इसका प्रकाशन नहीं हो पाया हो लेकिन इसने हिंदी पत्रकारिता की नींव डाल दी और आज उसी नींव पर हिंदी पत्रकारिता का परचम लहरा रहा है। 

इसका मतलब यह है कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म ही दायित्वों और जिम्मेवारियों को निभाने और चंद उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुआ है। हिंदी पत्रकारिता ने इसे साबित भी किया। आजादी की लड़ाई हो या सती प्रथा, छूआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियां के खिलाफ संघर्ष, हिंदी पत्रकारिता ने हरेक काम में हिस्सा लिया। जन जागरण का काम किया। समाज में हर तरह की कुरीतियों, संकीर्ण मानसिकता के खिलाफ जागरूकता फैलाई। आपातकाल हो या बिहार प्रेस बिल, सबका डटकर मुकाबला किया और प्रेस की आजादी को बहाल रखा। 

इस दौरान हिंदी पत्रकारिता ने अपने आप एक दायित्व की ओढ़ लिया था कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जन जागरण करेंगे और 21वीं शताब्दी की शुरुआत तक अपने इस दायित्व को पूरा भी करती रही लेकिन फिर हिंदी पत्रकारिता में दायित्व बोध कम होता चला गया। जैसे-जैसे तकनीकी विकास होता गया, मन बदलता गया। पत्रकारिता का उद्देश्य शिफ्ट होता गया। 'समाज के लिए पत्रकारिता' की भावना जगह पत्रकारिता में करियर की तलाश होने लगी। पत्रकारिता में मल्टीमीडिया की पढ़ाई शुरू हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि पत्रकारिता में एक उज्जवल भविष्य की संभावना दिखाई पड़ने लगी। समाज में पत्रकारिता की पहचान जब करियर के रूप में होने लगी तब अभिभावकों ने भी अपने बच्चों को इस तरफ भेजना शुरू कर दिया। पहले अभिभावक अपने बच्चों को पत्रकार बनाने में बिल्कुल भी रुचि नहीं लेते थे बल्कि इस क्षेत्र में जा रहे बच्चों पर लगाम लगा देते थे। कुछ हद तक यह अच्छा संकेत है। लेकिन जब समाज में पत्रकारिता करियर यानी प्रोफेशन यानी पेशा बन गई तो सब-कुछ बदल गया। दायित्व पूर्ति की भावना के साथ जिस हिंदी पत्रकारिता का आरंभ हुआ था, वह आज पेशा बन गई। इसे पेशा यानी प्रोफेशन के रूप में पहचान भी मिल गई। जैसे-जैसे यह पहचान मजबूत होती जाएगी, सामाजिक चेतना, सरोकार और सामाजिक दायित्व कम होता जाएगा। इन भावनाओं की जगह पेशा गत चालाकियां, बदमाशियां और अन्य चीजें भरती जाएंगी। कुछ नतीजे तो अभी से सामने आने लगे हैं। हिंदी पत्रकारिता में सिर्फ घटनाएं रिपोर्ट हो रही हैं, सिर्फ खबरें बन रही हैं। जनता का दर्द कहीं सहेजकर रिपोर्ट नहीं हो पा रहा है। सरकारों की चालाकियां सामने नहीं आ रही हैं। पिछड़ गए लोगों की पीड़ा सामने नहीं आ रही है। बहुत हुआ तो सड़क, बिजली, पानी पर सीरीज चला दी जाती है। पत्रकारिता का दायरा तय कर दिया गया है और उसे इस दायरे को दायित्व भी समझना पड़ रहा है।

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