Sunday, 1 June 2025

चाटुकारिता प्रतियोगिता

एक शहर में चाटुकारिता प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ अलग और अनोखे थे। इसके नियम इस सिद्धांत पर आधारित थे कि व्यक्ति चाटुकार नहीं होता है, पेशा चाटुकार होता है। कहने का मतलब यह कि पेशे में चाटुकारिता के गुण समाहित होते हैं। इसलिए व्यक्ति को मजबूरी में पेशा गत गुणों को अपनाना पड़ता है। इसके तहत प्रतियोगिता में भाग लेने वालों ने नकाब पहन रखा था ताकि उन्हें कोई पहचान नहीं सके। उनकी ड्रेस भी एक जैसी थी। संख्या में ये चार थे। हर प्रतियोगी को मंच पर भाषण देना था और जजों को उसके भाषण से उसके पेशे की पहचान करनी थी। यदि जज उसके भाषण से उसके पेशे को पहचान नहीं कर पाते तो उसे पुरस्कृत किया जाना था। यह माना जाता कि बंदा अपने पेशे के प्रति इमानदार है और पेशे के गुणों को पूरी तरह आत्मसात कर चुका है लेकिन पेशे की इज्जत बचाना भी उसे आता है। प्रतियोगिता शुरू हुई। पहला प्रतियोगी मंच पर आया। उसने बोलना शुरू किया -

भाइयो, चाटुकारिता मेरे खून में है क्योंकि यह हमारा खानदानी पेशा है। मेरे पूर्वजों ने चाटुकारिता के दम पर बड़े-बड़े ओहदे हासिल किए हैं। लेकिन हम चाटुकारिता में भेदभाव नहीं करते। जब जैसी जरूरत होती है वैसी चापलूसी करते हैं। हमारी सबसे बेहतरीन चापलूसी हर पांच साल में आप देखते हैं। उसके इतना बोलते ही जजों ने कहा, आप नेता हो। उसने नक़ाब हटा दिया। लोगों ने उन्हें पहचाना। वे शहर के जाने-माने नेता निकले।

फिर दूसरे नकाबपोश ने माइक संभाला। वह बोला, देखिए ऐसा है कि हमारे यहां तो चाटुकारिता उच्च स्तर की भी होती है और निम्न स्तर की भी। देखना होता है कि आपका स्तर क्या है। उसी के अनुसार चाटना पड़ता है। वैसे बिना चाटुकारिता के हमारे यहां कुछ नहीं होता है क्योंकि हम लोग बिना लेन-देन के कोई काम नहीं करते। जजों ने उसे भी पहचान लिया। वे एक बड़े सरकारी अधिकारी थे।

अब तीसरे नकाबपोश की बारी थी। वह आया और बोलने लगा-हमारे पेशे की चाटुकारिता कुछ अलग किस्म की होती है। हम लोग साल भर में कितनी चाटुकारिता करनी है, उसका कोटा तय कर लेते हैं। इसका फायदा यह होता है कि हमारे सामने हमारा टारगेट फिक्स होता है। टारगेट शब्द ने उसकी पहचान बता दी। जजों ने कहा, यह कारपोरेट जगत में बड़ी हस्ती है।

अब अंतिम नकाबपोश मंच पर आता है। दुबला-पतला शरीर, हल्की झुकी हुई कमर से यह आभास हो रहा था कि वह मंझा हुआ चाटुकार है। वह बोला, हमारे प्रोफेशन में चाटुकारिता बहुत ही व्यक्तिगत चीज है। करते सभी हैं लेकिन किसी को बताते नहीं है। सार्वजनिक रूप से यह काम नहीं किया जाता है। सभी अलग-अलग समय में अलग-अलग तरीके से चाटुकारिता करते हैं। चाटुकारिता इतनी महीन होती है कि जिसकी हो रही है, उसे भी समझने में थोड़ा समय लगता है। वह बोला, हमारे प्रोफेशन में हर रोज़ चाटुकारिता के नए-नए तरीके भी खोजे जाते हैं। यह ऐसी स्किल है जिसके अनेक नाम हैं। 

नकाबपोश बोले जा रहा था और जजों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि इसका प्रोफेशन क्या है। समय बीतता जा रहा था और जजों की बेचैनी बढ़ रही थी। अंततः समय समाप्त हो गया और जज उसे पहचान नहीं पाए। फिर उसे विजेता घोषित कर दिया गया। जजों ने उसे नक़ाब हटाने को कहा। उसने नक़ाब हटाया और सबने देखा सामने शहर का चर्चित पत्रकार खड़ा है। उसे सर्वोत्तम चाटुकार का ताज पहनाते समय जज सोच रहे थे कि पत्रकारिता में कुछ लोग ही छुपे रुस्तम होते हैं या सभी।

(यह एक काल्पनिक कहानी है। वास्तविकता से इसका कोई लेना-देना नहीं है।)


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