Wednesday, 30 July 2025

नकली को सलाम, असली को गुडबाय

चंदूलाल को अपने असली जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले याद आया कि उन्होंने अपना असली वाला जन्मदिन तो आज तक मनाया ही नहीं है। वैसे उन्होंने अपना नकली यानी सर्टिफिकेट वाला जन्मदिन भी कभी नहीं मनाया है लेकिन कागजी जन्मदिन पर कम से कम फेसबुक और दफ्तर के इंट्रा नेट पर उन्हें जन्मदिन मुबारक और शुभकामनाओं वाले ढेरों संदेश तो मिल जाते हैं और उन्हें जन्मदिन मनाने जैसा मज़ा आ जाता है। लेकिन असली वाला जन्मदिन तो बिल्कुल ही अछूत सा कोने में पड़ा रह गया। इसलिए चंदूलाल ने अपने मन में संकल्प लिया कि इस बार असली वाला जन्मदिन मनाया जाए। अपने संकल्प की सूचना उन्होंने पत्नी को दी। पत्नी थोड़ा कुनमुनाई। बुढौती में यह कौन-सा शौक चर्राया है। लेकिन कुछ नहीं बोली। 
चंदूलाल के घर में अब दो ही प्राणी रहते हैं। बेटी और बेटा नौकरी के लिए अलग-अलग शहरों में चले गए थे। बेटी की हाल ही में शादी भी हुई है। इसलिए चंदूलाल मन ही मन योजना बनाने लगे कि असली वाला जन्मदिन कैसे सेलिब्रेट किया जाए। उनके बेटे और बेटी को उनके इस जन्मदिन के बारे में पता है, ऐसा चंदूलाल सोचते थे क्योंकि जब दोनों बच्चे साथ में रहते थे तो चंदूलाल हर साल पांच जून को घर में घोषणा ज़रूर करते थे कि आज मेरा असली वाला जन्मदिन है। पत्नी हैप्पी बर्थडे बोलतीं और बच्चे भी उनका अनुसरण करते। बस, मन जाता था जन्मदिन। लेकिन इस बार की बात को अलग बनाना चाहते थे चंदूलाल। सो, उन्होंने सोचा, क्यों न ड्राइवर को बुलाकर एक दिन के लिए कहीं चला जाए। उनके पास गाड़ी है जो हमेशा खड़ी रहती है। उन्हें ड्राइव करना नहीं आता है। जब बेटा यहां था तब गाड़ी चलती थी। अब वह बाहर रहता है तो गाड़ी कौन चलाए। चंदूलाल कभी-कभी ड्राइवर बुलाकर पत्नी के साथ कनॉट प्लेस घूम आते थे। यही सोचते-साचते चंदूलाल दफ्तर पहुंचे। एक-दो घंटे बाद उन्होंने ड्राइवर से बात भी कर ली। अब उन्होंने सोचा कि मथुरा में बांके बिहारी का दर्शन किया जाए‌। लेकिन दफ्तर में कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें मथुरा जाने का कार्यक्रम बनाने का मौका ही नहीं मिला। फिर मन ही मन मथुरा जाने का प्रोग्राम कैंसल कर दिया। फिर मन में सोचा कि कहीं और चले जाएंगे लेकिन जाएंगे जरूर। जन्मदिन मनाना है तो मनाना है। 
शाम में देर से घर पहुंचे। पत्नी को बताया कि कल ड्राइवर को बुलाया है तो वह उखड़ गईं। कहां जाना है, क्यों जाना है, कितनी बार कहा बिना पूछे कुछ नहीं किया करो लेकिन तुम्हें को अपने मन की पड़ी रहती है। चंदूलाल समझ गए, पत्नी उनका जन्मदिन भूल चुकी हैं और यह भी भूल चुकी है कि इस बार जन्मदिन मनाना भी है। चंदूलाल शांत रहे और फिर उन्होंने फोन करके ड्राइवर को मना कर दिया। इसके बाद चंदूलाल खा पीकर सो गए। 
दूसरे दिन जब उठे तब पांच जून आ गया था। चंदूलाल ने पांच बजे बिस्तर छोड़ दिया। हाथ-मुंह धोकर घर के मंदिर में ईश्वर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। ईश्वर को उन्होंने सब-कुछ के लिए धन्यवाद दिया और फिर अपने रूटीन में लग गए। सुबह में उनका रूटीन था, पानी गर्म करना, दो कप चाय बनाना और डस्टबिन का कचरा घर के बाहर रखना जहां से सफाई वाला रोज उसे ले जाता था। चंदूलाल ने अपने असली वाले जन्मदिन के मौके पर भी यही किया। गर्म पानी पत्नी के लिए थर्मस में रखा। अपने हिस्से का पानी पिया और चाय पी, पत्नी के लिए चाय का कप ढंककर रखा, पत्नी को जगाया। उन्हें उम्मीद थी कि पत्नी उठने के साथ हैप्पी बर्थडे बोलेंगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता देख वे चुपचाप मॉर्निंग वॉक के लिए निकल पड़े। कुछ देर बाद पत्नी भी मॉर्निंग वॉक पर पहुंच गई। वे दोनों एक ही मैदान में एक-दूसरे के ऑपोजिट डायरेक्शन में घूमते हैं। विपरीत डायरेक्शन का फायदा यह है कि पत्नी की नजर उन पर अधिक देर तक नहीं रहती है। चंदूलाल को उम्मीद थी कि शायद वॉक के दौरान पत्नी को उनका जन्मदिन याद आ जाए लेकिन ऐसा भी हो न सका।
मॉर्निंग वॉक के बाद चंदूलाल कुछ सामान लेने सोसाइटी से बाहर निकल गए। लौट कर जब वे अपने फ्लैट में जाने के लिए लिफ्ट में सवार हुए तब उनका फोन बजा। उन्होंने फोन देखा तो पत्नी का कॉल था। उनके हलो कहते ही पत्नी की आवाज आई, हैप्पी बर्थडे। चंदूलाल धन्य हो गए। शुक्रिया बोलकर फोन काट दिया। 
अब चंदूलाल सोचने लगे असली से तो नकली वाला जन्मदिन ही ज्यादा अच्छा है। कम से कम रात बारह बजे से फेसबुक पर हैप्पी बर्थ-डे वाली शुभकामनाओं की बारिश तो शुरू हो जाती है। एकाध दोस्त का भी फोन आ जाता है जबकि उन्हें पता होता है कि यह नकली वाला है फिर भी वे फोन करना नहीं भूलते। असली वाले को तो पत्नी तक भी याद नहीं रख पाईं तो दुनिया क्या ख़ाक याद रखेगी। चंदूलाल ने उसी वक्त फैसला किया कि वे अब असली के चक्कर में कभी नहीं पड़ेंगे, हमेशा नकली को ही सेलिब्रेट करेंगे। दुनिया में सब लोग नकली को ही सेलिब्रेट करते हैं। नकली दोस्ती, नकली चेहरे, नकली रिश्ते, नकली नेता, नकली माल हर जगह नकली ही तो चल रहा है। उन्होंने तय किया कि जैसा चल रहा है, वैसा चलता रहे तो ठीक है। असली के चक्कर में नकली पर भी आफत न आ जाए। इसके बाद चंदूलाल का मन-मिजाज अचानक हल्का हो गया और वे एक गाना गुनगुनाने लगे जिसके बोल थे- मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।




Saturday, 26 July 2025

पत्रकार क्या है

इमानदार बदहवास है

अपने मन का दास है 

इनके लिए जज़्बात है 

उनके लिए बकवास है। 


कलम का दमदार है 

हिम्मत का सरदार है

झूठों की इस बस्ती में 

सच का तलबगार है।


कलम उठाई, सच की ख़ातिर

हर जख़्म को आवाज़ दी

जो दब गया भीड़ के नीचे

उस पीड़ा को पहचान दी।


दिन न देखा, रात न देखी

बस आंखों में अलख जली

कभी सड़क, कभी अदालत

हर मोर्चे पर क़लम चली।


मत पूछो अब इस मौसम में 

कितना सच वह कह पाता है 

पहरे, पर्दे, रोक-टोक को

कितना सह अब पाता है 

इधर न झांको, उधर न ताको

कितना टिक अब पाता है 

सच कहने की जुर्रत करके

कितना साबुत रह पाता है।

-श्रीचंद्र

२७.०७.२०२५

जीवन क्या है

दिन-रात का रगड़ा है 

मियां-बीवी का झगड़ा है 

चौराहे का लफड़ा है 

कष्ट बड़ा ही तगड़ा है 

      xxx

मुखिया का दलान है 

दिक्कतों की दुकान है 

सुबह-शाम की ढलान है 

हंसने-रोने की शान है 

      xxx

बात-बे-बात का ताना है 

सबकुछ यहां बेगाना है 

जी लिया तो एक गाना है 

जी न सका तो बहाना है।

Thursday, 24 July 2025

पत्रकारिता के सात टोटके से कभी न भटकें

टोटका शब्द से हम सभी परिचित हैं। परिवार में दादी-नानी या मां ने कभी न कभी कोई न कोई टोटका हम सबों के साथ किया ही होगा। नज़र न लगने, नजर उतारने, यात्रा शुभ होने के टोटके आम हैं। इसी तरह पत्रकारिता में भी कुछ टोटके हो सकते हैं जिन्हें हम करके यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारी पत्रकारिता को किसी की नजर न लगे यानी हम जो खबर लिखें, वह परफेक्ट हो और अपने उद्देश्य को पूरा करती हो। 
हिंदी पत्रकारिता में टोटके का तात्पर्य उन छोटे-छोटे उपायों, तकनीकों या रणनीतियों से हो सकता है, जो पत्रकार अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने, खबरों को प्रभावी बनाने, या पाठकों/दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनाते हैं। ये टोटके पत्रकारिता के क्षेत्र में अनुभव, रचनात्मकता और संवेदनशीलता से विकसित होते हैं। नीचे कुछ सामान्य और प्रभावी टोटके दिए गए हैं, जो हिंदी पत्रकारिता में उपयोगी हो सकते हैं-
1️⃣ आकर्षक शीर्षक और प्रस्तुति
टोटका यह है कि हर खबर का शीर्षक छोटा, रोचक और उत्सुकता जगाने वाला हो। भावनात्मक या स्थानीय शब्दों का उपयोग करना अच्छा होता है, जैसे नया खुलासा या आपके शहर की अनसुनी कहानी।
उदाहरण- क्या आप जानते हैं आपके शहर का यह राज? इससे पाठकों  में जिज्ञासा बढ़ेगी।
इसका लाभ यह है कि यह पाठकों को तुरंत आकर्षित करता है और खबर पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
2️⃣ स्थानीयता पर जोर
टोटका है कि खबर को स्थानीय संदर्भ से जोड़ें। स्थानीय मुद्दों, संस्कृति और बोली का उपयोग पाठकों से गहरा जुड़ाव बनाता है।
उदाहरण- किसी राष्ट्रीय नीति की खबर को स्थानीय स्तर पर प्रभाव से जोड़कर लिखने से पाठकों का जुड़ाव बढ़ता है, जैसे नई शिक्षा नीति- आपके बच्चे के स्कूल पर क्या असर?
इसका फायदा यह होगा कि पाठक खबर को अपने जीवन से जोड़कर देखेंगे। 
3️⃣ सहज भाषा का उपयोग
टोटका यह है कि जटिल शब्दों की बजाय सरल, बोलचाल के शब्दों का उपयोग करें। स्थानीय कहावतें, मुहावरे या लोकप्रिय संदर्भ भी जोड़ सकते हैं।
उदाहरण- यह योजना गांव के लिए गेम-चेंजर साबित होगी या जैसे पानी में पत्थर फेंकने से लहरें उठती हैं, वैसे ही इस खबर ने हलचल मचा दी।
इससे सामान्य पाठक को खबर समझने में आसानी होगी।
4️⃣ विश्वसनीय स्रोतों का उपयोग
टोटका यह है कि खबर की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए स्थानीय लोगों, विशेषज्ञों या अधिकारियों के बयान शामिल करें। बिना स्रोत के कोई खबर नहीं लिखें। यदि सरकारी विज्ञप्ति से खबर बना रहे हैं तो उसका भी उल्लेख करना चाहिए। फलां अधिकारी का कहना है" जैसे वाक्य विश्वास जगाते हैं लेकिन ऐसा कहा जाता है जैसे वाक्य विश्वास घटाते हैं।
उदाहरण- जिलाधिकारी ने बताया कि बाजार में यह बदलाव व्यापारियों के लिए फायदेमंद है।
लाभ यह होगा कि इससे पाठक खबर पर भरोसा करेंगे। साथ ही अखबार और पत्रकार की विश्वसनीयता बढ़ती है।
5️⃣ पत्रकारिता में समय प्रबंधन
टोटका यह है कि अखबार को समय पर छोड़ने के लिए समय पर खबर फाइल करना जरूरी होता है। इसके लिए दिन की शुरुआत में प्राथमिकता तय करें। महत्वपूर्ण खबरों के लिए पहले स्थानीय स्रोतों से संपर्क करें। 
उदाहरण-दिन के फर्स्ट हाफ में खबरों को बटोरने का काम करें ताकि दोपहर बाद खबरें तैयार हो जाएं।
इसका लाभ यह होगा कि समय पर अखबार छपेगा और समय पर पाठकों के हाथ में पहुंचेगा। इससे अखबार की विश्वसनीयता और प्रभाव बढ़ता है।
6️⃣ नैतिकता और संवेदनशीलता
टोटका यह है कि संवेदनशील मुद्दों पर खबर लिखते समय सावधान रहना चाहिए। स्थानीय और राष्ट्रीय भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए और तथ्यों को सावधानी से प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशील मुद्दों को लेकर लापरवाह रवैया कभी नहीं अपनाना चाहिए। 
उदाहरण-किसी दुर्घटना की खबर में पीड़ितों के परिवार की निजता का सम्मान करें।
इसका लाभ यह होगा कि इससे पत्रकार और संस्थान दोनों की साख को बनी रहेगी।
7️⃣ पाठक की रुचि का ध्यान
टोटका यह है कि घटनात्मक खबरों के अलावा ऐसी खबरें चुननी चाहिए जो हिंदी भाषी पाठकों के लिए प्रासंगिक हों, जैसे शिक्षा, रोजगार, कृषि, या त्योहार।
उदाहरण-'दिवाली से पहले बाजार में नकली मिठाइयों का खतरा' जैसी खबरें पाठकों को आकर्षित करती हैं। हालांकि ऐसी खबरें हर साल छपती हैं लेकिन हर साल लोग इसे पढ़ते भी हैं। साथ ही पत्रकारों का फर्ज है कि अपने पाठकों को ऐसे खतरों से आगाह करे। 
इससे पाठकों का जुड़ाव और अखबार/चैनल की लोकप्रियता बढ़ती है।
सावधानी 
पत्रकारिता में टोटके रचनात्मक तकनीकें हैं, लेकिन इन्हें अंधविश्वास या गलत सूचनाओं से जोड़ने से बचें। साथ ही हमेशा पत्रकारिता के नैतिक मानदंडों का पालन करें।




Wednesday, 23 July 2025

दुनिया की सबसे पुरानी चट्टान


इसके पहले कि इस चट्टान के बारे में भूगर्भशास्त्रियों के हिसाब से इसका शुष्क इतिहास शुरू करूं, कुछ बातें आम आदमी के अहसास के हिसाब से कहना चाहता हूं। पहली बात तो यह है कि छोटी सी पहाड़ी की तरह की दिखने वाली इस चट्टान की ऊंचाई कम होने के कारण आप आसानी से इस पर चढ़ जाएंगे। जब ऊपर पहुंचेंगे तो बंगलुरु शहर बहुत ही खूबसूरत दिखाई देगा। चारों ओर हरियाली ही हरियाली दिखेगी। आंखों को सुकून मिलेगा। लेकिन असली बात है कि चट्टान पर बैठकर मूंगफली (चिनियाबदाम) खाने का मजा ही कुछ और है। कोई साथ हो तो और भी अच्छा लगेगा। चट्टान पर कई लोग पास-पास बैठकर मूंगफली खाते दिखाई भी पड़े। चट्टान के नीचे आपको मूंगफली बेचने वाले मिल जाएंगे। असल में टाइम पास करने की यह अनोखी जगह है। बंगलुरु की सुखद धूप का आनंद उठाते हुए आप क्वालिटी टाइम गुजार सकते हैं। तो यदि आपने अभी तक इसे नहीं देखा है तो अगली बार जरूर जाएं और अपनी पत्नी के साथ बैठकर मूंगफली का मजा उठाएं। आप दोस्तों के साथ इस पर चढ़ने की रेस भी लगा सकते हैं यदि आप रेस लगाने लायक बचे हैं तो। 

क्या है इसका इतिहास 

बंगलुरु के लालबाग़ उद्यान में एक विशाल चट्टान (hillock) दिखाई पड़ती है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह दुनिया की सबसे पुरानी चट्टान है। यह भी कहा जाता है कि यह पैनीनसुलर गनीस नामक अत्यंत प्राचीन चट्टानी संरचना का हिस्सा है।

पैनीनसुलर गनीस क्या है 

यह चट्टान का एक प्रकार है। एक प्रकार का उच्च-ग्रेड रूपांतरित चट्टान जिसमें ग्रेनाइट और माइका जैसे खनिज शामिल हैं। कहा जाता है कि यह लगभग 2.5 से 3.4 अरब वर्ष पुरानी चट्टान है। यह चट्टान मानसून और मानव इतिहास से बहुत पहले बनी थी, इसलिए इसे राष्ट्रीय भू–वैज्ञानिक स्मारक घोषित किया गया, जिसे भारत सरकार की जीएसआई का संरक्षण प्राप्त है। यह एक प्राचीन मेटामॉर्फिक चट्टान है, जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत के क्रेटॉन (प्राचीन भूखंड) जैसे धारवाड़ क्रेटॉन, बस्तर क्रेटॉन और सिंहभूम क्रेटॉन में पाई जाती है। यह चट्टान ग्रेनाइट और अन्य आग्नेय चट्टानों के मेटामॉर्फिज्म (रूपांतरण) से बनती है और इसमें बैंडेड संरचना होती है। यह भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है‌। यह विशेष रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों में पाई जाती है। खास तौर पर बंगलुरु और मैसूर के आसपास के क्षेत्रों में यह मिलती है।

चट्टान की विशेषताएं 

यह चट्टान बंगलुरु के लालबाग़ के ग्रीष्म और वसंत के प्रवेश द्वारों के पास स्थित एक उभरी हुई टेकरी पर है, जहां पर बंगलुरु के संस्थापक केंपगौड़ा द्वितीय ने 16वीं सदी में एक वॉचटावर बनवाया था  ।

चट्टान की चोटी पर यह टॉवर साफ़ तौर पर दिखता है, और इसके नीचे ही एक GSI द्वारा स्थापित बोर्ड लगा है जिसमें इसे राष्ट्रीय भू–वैज्ञानिक स्मारक बताया गया है।

क्यों खास है?

-यह चट्टान हमें पृथ्वी की आरंभिक अवस्था (Archean Eon) की जानकारी देती है, जब हमारी भूरचना विकसित हो रही थी। 

-भूविज्ञानी और शोधकर्ता इसे धरती की संरचना एवं भूवैज्ञानिक इतिहास का अध्ययन करने के लिए उपयोग करते हैं। 

-सुबह के वॉक के दौरान लोग इस चट्टान पर चढ़कर बैठना पसंद करते हैं और यह पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण है।

-कठोरता और टिकाऊपन के कारण, पेनिनसुलर गनीस का उपयोग भवन निर्माण, सड़क निर्माण, और पुलों के लिए पत्थरों के रूप में किया जाता है। टाइल्स, स्लैब, और सजावटी पत्थरों के रूप में भी इसका उपयोग किया जाता है, खासकर दक्षिण भारत में।

Sunday, 20 July 2025

खूंखार जानवरों के बीच इंसानों का पिंजरा

दक्षिण भारत का शहर बंगलुरु अब उत्तर भारतीयों की जुबान पर रहता है क्योंकि यहां इंजिनियरिंग और आईटी का हब है। यहां पूरे देश से पढ़ाई और जॉब के लिए युवा आते हैं। 
यदि सर्वे किया जाए तो शायद यह निष्कर्ष निकलेगा कि बिहार और उत्तर प्रदेश के हर दस घर में से चार घर का बच्चा या बच्ची इस शहर में पढ़ रहा है या नौकरी कर रहा या रही है। इसलिए इस शहर का कलेवर बदल रहा है। 
अपनी इस बंगलुरु यात्रा के दौरान इस बार हमने जानवरों से मुलाकात की। हिरण, चीतल, सांभर, मगरमच्छ, चीता, बाघ-बाघिन, शेर-शेरनी, हाथी-हथिनी को देखा। पेड़ और चट्टान से भी मिले। 
हमने बंगलुरु के Bannerghatta Biological park में पूरा एक दिन गुजारा। इस दौरान सफारी के अलावा तितलियों के मुहल्ले में भी समय बिताया। चिड़ियाघर के जीव-जंतुओं से भी मिले। जानवरों की खासी संख्या के साथ-साथ चिड़ियाघर में पक्षियों का एक बड़ा सा इलाका भी है। लेकिन इन सबमें खास सफारी लगा जिसमें आप पिंजरे में कैद होते हैं और सभी जानवर अपने-अपने घरों में सामान्य जीवन गुजार रहे होते हैं। सर्कसों में शेर, बाघ, चीता, भालू या हाथी को देखने और जंगल सफारी में इन्हें देखने में जमीन आसमान का अंतर है। इन्हें देखकर एक चीज का अहसास बार-बार हुआ कि हमारी गाड़ियों को देखकर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। सड़क किनारे सोया हुआ भालू गाड़ी की आवाज सुनकर भी नहीं जागा। सड़क किनारे बैठे जंगल के राजा शेर की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही। मानो वह जता रहा हो कि वह यहां का राजा है, इसलिए हमारे आने-जाने से उसे फर्क नहीं पड़ता। मानो यह भी कह रहा है, इस इलाके में बचना तुम्हें है। हम तो राजा हैं, हम क्यों किसी की परवाह करें। कुछ ऐसा एटिट्यूड बाघ और बाघिन ने भी दिखाया। बाघ हमें पेड़ों के झुरमुटों में सोया हुआ मिला। हमारी गाड़ी जब तक वहां खड़ी रही, उसने सिर नहीं उठाया। मानो वह भी कह रहा हो, रे मानव, तेरे लिए हम अपनी दोपहर की नींद खराब नहीं करेंगे। मुझसे मिलना है तो बाद में आना। हम निराश होकर आगे बढ़ गए। इस बॉयोलॉजिकल पार्क का एक बड़ा आकर्षण है सफेद बाघ यानी व्हाइट टाइगर। उसने भी यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वह भी जंगल के बॉस सिंडिकेट का बोनाफाइड सदस्य है‌। वह भी हमें सोया हुआ मिला। हमारे आने-जाने से उसको भी कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, लेपर्ड हमें जरूर टहलता हुआ मिला। लेकिन फिर भालू ने एटिट्यूड दिखाई। भालू सड़क पर सोया हुआ था और सोया ही रहा। हमारी गाड़ी में सवार हर व्यक्ति ने इत्मीनान से भालू का दीदार किया। उसकी तस्वीरें खींचीं लेकिन भालू ने सिर उठाने की जहमत नहीं उठाई। हमें हाथियों के झुंड मिले, उछल-कूद मचाते सियार भी मिले। झुंड के झुंड हिरण मिले, चीतल, सांभर और नीलगाय भी समूह में मिले। मगरमच्छ भी पानी से बाहर धूप में लेटे दिखाई पड़े। 
इस तरह से सफारी का सफर जब पूरा हुआ तब तक हम यहां के सारे सदस्यों से मिल चुके थे। लेकिन किसी भी जानवर  ने हमें भाव नहीं दिया क्योंकि यह उनकी दुनिया है और हम वहां घुसपैठियों की तरह पहुंचे थे। वे सभी अपने-अपने घरों में थे, हम उनके घर घूमने गए थे। अब वे हमारा स्वागत कैसे करें, यह उनकी मर्जी। 
जंगल में रहने वालों को जब पार्क में रखा जाता है तब शायद उनके अंदर भी इंसानी आदतें पैदा होने लगती हैं। तब वे दौड़ते नहीं इंसानों की तरह पार्क में चहलकदमी करते हैं। उनके अंदर का खूंखारत्व खत्म होने लगता है। ऐसा होने में कोई खराबी भी नहीं है क्योंकि जब इंसानों के अंदर जानवरों का खूंखारत्व पैदा होने लगा है तो जानवरों में मनुष्यत्व पैदा होने में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।









Tuesday, 15 July 2025

काम-क्रोध-मद-लोभ के कोरस के बीच बेबस पत्रकारिता का ता-ता थैया

एआई युग में एक तरफ तकनीक पूरी ताकत के साथ अपना विकास कर रही हैं तो दूसरी ओर उससे दोगुनी शक्ति के साथ छल-कपट, काम, क्रोध, मद, लोभ भी अपना कोरस गा रहे हैं। तरक्की की ऊंचाइयों के बीच नैतिक पिछड़ेपन की गहरी और चौड़ी होती खाई डर पैदा करती है। लोग जितना ज्यादा विकास कर रहे हैं यह खाई उतनी ही गहरी होती जा रही है। खाई के गहरी होने से अधिक डर तब लगता है जब इस खाई में गिरने से डरने वाले लोगों की ही तादाद कम होती जा रही है। लोग धड़ाधड़ इस खाई में गिरते जा रहे हैं और जो लोग नहीं गिरे हैं, वे दुखी हो रहे हैं कि अब तक खाई में क्यों नहीं गिरे। लोग इस नैतिक पिछड़ेपन को समझ ही नहीं पा रहे हैं। जब समझ नहीं पा रहे हैं तो डरेंगे कैसे? कभी-कभी यह भी लगता है कि लोग इसके खतरे को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समझना नहीं चाहते हैं।

यही एआई युग का युगधर्म है। इसी युगधर्म के हिसाब से पत्रकारिता का मिजाज तय होता है। 

मुखौटा आज की सच्चाई है

आज हर चेहरे पर मुखौटा है। प्रकट रूप में एक चेहरा, गुप्त रूप से दूसरा चेहरा। पहले भी ऐसे लोग समाज में होते थे लेकिन तब इनकी संख्या कम थी। अब यह संख्या बढ़ रही है लगातार। तभी तो एक सरकारी दफ्तर का मामूली कर्मचारी करोड़ों रुपए का मालिक निकलता है। मुहल्ले का एक छोटा-सा नेता अचानक चमचमाती महंगी गाड़ियों में घूमने लगता है। ऐसे छुपे रुस्तम से समाज भरा पड़ा है। छुपे रुस्तमों के जमाने में आप विशुद्ध पत्रकारिता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। समाज ने मुखौटा चढ़ाया तो पत्रकारिता ने भी नक़ाब पहन लिया है। यह मजबूरी है।

बुराई से डर नहीं लगता 

असली दिक्कत यह नहीं है। असली दिक्कत यह है कि मुखौटे के पीछे छिपे चेहरों को बेनकाब करने वाले लोग कम हो रहे हैं। कुछ दशक पहले समाज में यदि कोई बेईमान, भ्रष्टाचारी, दुराचारी आदमी होता था तो लोग उसकी बुराई करते थे, आलोचना करते थे और कभी-कभी उसकी भर्त्सना भी की जाती थी और वह भी सार्वजनिक रूप से। 

लेकिन आज जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी है, समाज में उसे उतना बड़ा ओहदा मिलता है। विजय माल्या जब टीवी पर आकर कहते हैं कि मैंने जितने की चोरी की थी उससे कहीं ज्यादा धन बैंक वाले हमसे वसूली कर चुके। इसलिए मैं चोर नहीं हूं। उनकी बात पर देश सोचने लगता है कि ठीक ही तो कह रहा है बिचारा। बैंक वाले बड़े बेरहम हैं। कोई यह नहीं सोचता कि चोरी का माल लौटा देने पर चोरी के अपराध को माफ करने का कानून किसी किताब में नहीं लिखा है। देश में इस तरह से हो रहे वैचारिक पतन से पत्रकारिता कैसे अछूती रह सकती है। 

किसे सम्मानित करता है समाज 

आज हम हत्या, बलात्कार के आरोपियों को सार्वजनिक मंचों पर सम्मानित करते हैं। समाज में उसको बड़ा महत्व मिलता है। जो जितना बड़ा आरोपी है, वह उतना बड़ा समाजसेवी बनता है। 


क्या लगता है कि पत्रकारिता पर इन घटनाओं का असर नहीं पड़ता है। मजबूरी में पत्रकारिता को इन घटनाओं को ग्लैमरस अंदाज में पेश करना पड़ता है। शायद ही कोई अखबार होगा जो ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट छापने से बच पाया हो। न छापें तो अखबारों के बहिष्कार का एलान होता है। 

तो एआई की तरक्कियों के बीच वैचारिक पतन को कौन संभालेगा? नैतिक पिछड़ेपन से कौन उबारेगा? ठीक है, इसमें एआई का दोष नहीं है। एआई तो तकनीकी विकास का एक हिस्सा है लेकिन समाज को गर्त में ले जानेवाले लोगों के लिए एआई एक बड़ी सुविधा और औजार भी तो है। पत्रकारिता को भी इन्हीं खतरों के बीच सांस लेना है, जिंदा रहना है, उड़ान भरना है।

Saturday, 12 July 2025

कंटेंट के 'मॉल' क्यों बन गए आज के अखबार

अखबार और मीडिया अब सिर्फ़ खबरें नहीं, बल्कि योग, खाना पकाना, फिटनेस टिप्स, सुंदर और स्मार्ट दिखने के तरीके, बीमारी को दूर रखने के उपाय, बच्चे पालने की कला, बच्चों को पढ़ाने का हुनर और यहां तक कि जीवन के हर तरह के काम सिखाने लगे हैं। अखबारों में जनरल नॉलेज की क्लास भी लगती और अंग्रेजी सिखाने की भी। कुछ अखबारों में यह काम सीरीज में किया जाता है ताकि जिस पाठक ने आज पढ़ा है, वह कल भी पढ़े। कुछ अखबारों में बजाप्ता क्लास लगाई जाती है जिससे पाठकों को जोड़े रखने की कोशिश की जाती है। अखबारों में पहेलियां भी दी जाती है और उसका रिजल्ट अगले दिन के संस्करण में दिया जाता है। कुछ अंग्रेजी अखबार अंग्रेजी शब्दों का ज्ञान दिया जाता है। कुछ अखबारों में विज्ञान पढ़ाया जाता है। अखबारों में चुटकुले भी होते हैं और व्यंग्य सामग्री भी। राजनीतिक कटाक्ष भी होते हैं और सामाजिक चिंतन भी। धर्म-कर्म अखबारों का बहुत पसंदीदा विषय है। इस विषय पर पुराने समय से अखबारों में सामग्री दी जाती रही है लेकिन आज के समय में इसे और भी बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है। धार्मिक यात्राओं पर पूरा पैकेज दिया जाता है। ऐसा लगता है कि अखबार या चैनल अंगुली पकड़कर अपने पाठकों को धर्मस्थलों का दर्शन करा रहे हों। अखबार वाले महिलाओं और बच्चों को भी टारगेट बनाते हैं। महिलाओं के लिए खास कंटेंट तैयार किया जाता है जिसमें सुंदर दिखने से लेकर स्वस्थ रहने तक का पैकेज होता है। बच्चों के लिए होमवर्क से लेकर करियर तक का गाइडलाइंस दिया जाता है। 

सुडोकू और क्रॉसवर्ड अखबारों का पुराना माल है। अब इसे और भी रोचक तरीके से और अलग-अलग फार्मेट में प्रस्तुत किया जाता है। कार्टून स्ट्रिप पहले अंग्रेजी के अखबारों में होते थे लेकिन अब हिंदी के अखबारों में भी इसका चलन शुरू हो गया है। फिल्म समीक्षा तो बहुत पहले से अखबारों में दी जाती रही है। अब अखबारों में यह भी बताया जाता है कि कौन सी फिल्म देखने लायक है और कौन सी देखने लायक नहीं है। इस तरह से अखबार अब फिल्मों का भविष्य भी बनाते हैं। एक तरह से कहा जा सकता है कि अखबार या न्यूज चैनल कंटेंट के 'मॉल' बन गए हैं, जहां हर तरह का कंटेंट परोसा जाता है। हर आयु वर्ग के लिए कंटेंट दिया जाता है।

कंटेंट की विविधता 

अखबारों की कोशिश होती है कि वे हर तरह का माल परोसें ताकि हर तरह की रुचि वाले पाठकों का वर्ग जुड़ सके। हर अखबार अपने-अपने पाठक वर्ग के हिसाब से फीचर कंटेंट तैयार करते हैं। इसके लिए थोड़ा रिसर्च भी किया जाता है। अखबार अपने-अपने प्रिंट एरिया में रहने वाले पाठक वर्ग के हिसाब से कंटेंट भी तैयार कराते हैं। इस कवायद के पीछे पाठक समूह को आकर्षित करने और उन्हें लंबे समय तक जोड़े रखने का लक्ष्य होता है। अखबारों की बढ़ती संख्या के कारण कंटेंट की जंग जबरदस्त होती जा रही है। 

पाठकों को जोड़े रखने का लक्ष्य 

इसका मतलब यह है कि अब पाठकों को लुभाने में सिर्फ खबरों की ही भूमिका नहीं होती है। तो क्या खबरों की ताकत कम हो रही है। खबरों की ताकत कम नहीं हो रही है बल्कि खबरें सर्व सुलभ हो गई हैं। खबरों के लिए लोग अब किसी एक माध्यम पर निर्भर नहीं हैं। खबरों के असंख्य माध्यम हैं। इसलिए पाठकों को जोड़ने रखने के लिए अखबारों या चैनलों को तरह-तरह के पैकेज देना होता है। पाठकों को जोड़े रखने में लाइफस्टाइल के इन पैकेजों की बड़ी भूमिका होती जा रही है। योग, रोग, भोग आदि के ये कंटेंट पैकेज पाठकों की संख्या बढ़ाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

कंटेंट का बढ़ता दायरा 

दिनों-दिन कंटेंट का दायरा बढ़ता जाता है। अब पर्यावरण भी एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। अखबारों में पर्यावरण से संबंधित सामग्री भी दिखाई देने लगी है। कुछ जगहों पर इसे लेकर स्थायी कॉलम से लेकर पूरे पेज की सामग्री भी दी जाने लगी है। एआई के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर अखबारों में भी सामग्रियों को परोसा जा रहा है। 

इन सबके पीछे असली जंग रीडरशिप या व्यूअरशिप बढ़ाने की होती है। टीआरपी की जंग में कोई चैनल पीछे नहीं रहना चाहता है। इसी तरह आईआरएस के सर्वे में हर अखबार अपने को नंबर वन साबित करना चाहता है। इस जंग में पत्रकारिता के असली मूल्यों के खो जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। जैसे-जैसे जंग तेज होती जा रही है, वैसे-वैसे पत्रकारिता के मूल्यों के गौण हो जाने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। इससे बचने का रास्ता निकालने की जरूरत है वरना पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों के खो जाने का डर है। 

#journalism #values #content 


Thursday, 10 July 2025

पत्रकारिता में गुरू घंटाल परंपरा

गुरु पूर्णिमा के मौके पर पत्रकारिता के गुरुओं को भी याद करना चाहिए और गुरू घंटालों को भी। पत्रकारिता में वैसे तो गुरु-शिष्य परंपरा जैसी कोई चीज नहीं होती है लेकिन पढ़ाने, सिखाने और बताने की परंपरा है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि पत्रकारिता में गुरु होते हैं। गुरु की श्रेणी में पत्रकारिता संस्थान के शिक्षकों के अलावा हुनर और पेशागत पेचीदगियों को समझने में मदद करने वाले लोग भी शामिल हैं। नई नौकरी के रास्तों को आसान बनाने, हौसला बढ़ाने और असफल होने से बचाने वाले लोग हर किसी को मिलते हैं। हर किसी के प्रोफेशनल और व्यक्तिगत जीवन में कुछेक लोग ऐसे आते ही हैं जिनके सामने हम सब बच्चा बन जाते हैं और वे हमें बच्चों की तरह सिखाते हैं, पढ़ाते हैं। आप उनका गुरु के रूप में सम्मान करें या सीनियर साथी के रूप में, लेकिन उनका सम्मान करने का मन हमेशा होता है। 

लेकिन इनके उल्ट हमें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो गुरुओं के भी गुरु यानी गुरू घंटाल होते हैं। जब ऐसे लोग मिलते हैं तब समझ में नहीं आता कि हम क्या करें? 

हम कह सकते हैं कि सबसे ख़तरनाक होता है पत्रकारिता में गुरु से गुरू घंटाल हो जाना। आजकल पत्रकारिता में गुरु कम और गुरू घंटाल ज्यादा पैदा हो गए  हैं। इससे दिक्कत यह हो रही है कि आम लोग मीडिया के केंद्र से गायब हो रहे हैं। मीडिया की मुख्य धारा से जनता के दुख-तकलीफ के मुद्दे लगभग गायब हो चुके हैं। जो मुद्दे सामने आते हैं उनमें आमजन की पीड़ा कम होती है। आम लोगों का हमदर्द होने का मुखौटा लगाए घूम रहे लोगों के पास एक ही एजेंडा होता है और वह है सत्ता की चापलूसी का एजेंडा। 

पत्रकारिता की दुनिया आजकल गुरू घंटालों से भरी हुई है। हर अखबार, हर न्यूज चैनल में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो पत्रकारिता को अपने और अपने स्वामियों के स्वार्थ की पूर्ति के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। पत्रकारिता की आड़ में बड़े-बड़े इन गुरू घंटालों के कारण पत्रकारिता पर क्या असर पड़ रहा है, इसका सही आकलन करना तो मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर है कि पत्रकारिता की साख में हल्की दरार जरूर आ रही है।

आइए देखते हैं पत्रकारिता में कितने प्रकार के गुरू घंटाल पाए जाते हैं -

*️⃣ एक वे जो अखबारों या न्यूज चैनलों में सामान्य सी जिंदगी जीते हैं। उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता है कि इनके पास कोई ऐसी शक्तियां भी हैं जो आपका मुश्किल से मुश्किल काम भी चुटकी बजाकर करवा देंगे। लेकिन वे कनेक्शन के धनी होते हैं। अपने कनेक्शन के दम पर वे चुटकियों में बड़ा से बड़ा काम करा सकते हैं। 

*️⃣ दूसरे टाइप के गुरू घंटाल वे हैं जो न किसी अखबार में होते हैं और न ही किसी न्यूज चैनल या पोर्टल में। वे स्वयंभू पत्रकार हैं। अखबारों और चैनलों में कुछ कनेक्शन के बल पर खुद को पत्रकार बनाए रखते हैं। ये लोग असल में लोगों का काम करते और कराते हैं। 

*️⃣ गुरू घंटालों की एक श्रेणी और भी है। इस श्रेणी के गुरू घंटाल पत्रकारों को मीडिया हाउस अपने यहां पालते हैं। ये पत्रकारों वाला काम भी करते हैं यानी डेस्क कर्मी या रिपोर्टर का काम करते हैं लेकिन जब कभी मीडिया हाउस का बड़ा काम सरकारी महकमे में फंस जाता है (अमूमन यह मामला विज्ञापन से जुड़ा होता है) तब इनकी गुरू घंटाली काम आती है। तब इन्हें फंसे हुए काम को निकालने के लिए बाहर निकलना पड़ता है। 

आजकल इन गुरू घंटालों की चांदी है। इनकी जरूरत हर किसी को कभी न कभी पड़ ही जाती है। असली पत्रकारिता करने वालों को इनसे बचकर रहने की जरूरत है।

Tuesday, 8 July 2025

हिंदी खबरों में अंग्रेजी शब्दों का कंकड़

अंग्रेजी प्रेम या अंग्रेजी में नहीं बोलने पर पिछड़ जाने के अज्ञात डर के कारण हिंदी बोलने में सक्षम लोग भी अपने संवादों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल कर लेते हैं। ऐसा करके वे न हिंदी के होते हैं और न ही अंग्रेजी के। वे बीच में झूलते रह जाते हैं। हालांकि ऐसा करना इन दिनों जरूरी आम प्रचलन में है। युवा पीढ़ी के संवाद में अंग्रेजी शब्दों की भरमार होती है। उनके हर वाक्य में कोई न कोई अंग्रेजी का शब्द होता ही है।

यह बात अलग है कि जो अंग्रेजी शब्द हिंदी में स्वीकृत हो चुके हैं यानी जिन अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में अपना लिया गया है, उनके इस्तेमाल से कोई परहेज़ नहीं करना चाहिए लेकिन जो शब्द शुद्ध अंग्रेजी के हैं, उनका इस्तेमाल हिंदी भाषा की शुद्धता को नष्ट करता है। इसलिए इससे बचने की जरूरत है। 

पत्रकारिता में यह समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है जब पत्रकारों की नई पीढ़ी मीडिया में प्रवेश कर रही है। इनके बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का भरपूर इस्तेमाल होता है। इस पीढ़ी के पत्रकार जब हिंदी में खबर लिखने बैठते हैं तो उनके लेखन में अपने आप अंग्रेजी के शब्द आ जाते हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि खबरों की भाषा खिचड़ी बनती जा रही है। ऐसी खबरें उन पाठकों को बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है जो शुद्ध हिंदी में खबरें या लेख या विश्लेषण पढ़ना चाहते हैं या जिनकी आदत शुद्ध हिंदी में पढ़ने की है। यदि हालात ऐसे ही बने रहें या इससे भी ज्यादा खराब हो गए जाएं तो हिंदी का स्वरूप ही बदल जाएगा। यदि हालात ऐसे ही बने रहें तो नई जेनरेशन यानी जेन बीटा या उसके बाद की पीढ़ी जब बड़ी होकर पत्रकारिता की कमान संभालेगी तब उनके लिए खिचड़ी हिंदी ही मानक भाषा बन चुकी होगी और शुद्ध हिन्दी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। 

अभी इस खतरे से उबरने का समय है क्योंकि इस समय पत्रकारिता में वे लोग भी सक्रिय हैं जो शुद्ध हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। ये लोग नई पीढ़ियों को शुद्ध हिंदी लिखना सिखा सकते हैं। इन लोगों के पास शुद्ध हिंदी में लिखने का हुनर भी है ज्ञान भी। जरूरत किसी ऐसे तरीके को विकसित करने की है जिसकी सहायता से पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ियों के पत्रकारों को शुद्ध हिंदी का प्रशिक्षण दे सकें, उन्हें शुद्ध हिंदी लिखने की अहमियत और जरूरत के बारे में बता सकें। 

कुछ अखबारों में अब भी ऐसा पुरजोर प्रयास किया जाता है कि हिंदी की खबरों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाए‌। इसके लिए इन अखबारों में बजाप्ता अभियान चलाया जा रहा है। लोगों को प्रक्षिशित किया जा रहा है। लेकिन कुछ अखबारों में धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल होता है।

Monday, 7 July 2025

जेनरेशन गैप का हिंदी पत्रकारिता पर असर

भारतीय समाज में जेनरेशन गैप हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। जब भी दो पीढ़ियों के बीच विचार या व्यवहार का टकराव होता है तब दोष जेनरेशन गैप को ही दिया जाता है। पिछली पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को यही समझाती है कि यह जेनरेशन गैप का दोष है। आखिर यह जेनरेशन गैप होता क्या है ?

जेनरेशन गैप एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो समय के साथ बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश के कारण उत्पन्न होती है। प्रत्येक पीढ़ी का जन्म अलग-अलग समय में होता है, जिसमें विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाएं (जैसे युद्ध, आर्थिक मंदी, स्वतंत्रता आंदोलन) उनके दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं। पुरानी पीढ़ी (जैसे बेबी बूमर्स) प्रिंट और रेडियो युग में पली-बढ़ी, जबकि युवा पीढ़ी (जैसे जेन Z या जेन अल्फा) डिजिटल और सोशल मीडिया युग में। यह तकनीकी अंतर उनके संचार और सोचने के तरीके को प्रभावित करता है। प्रत्येक पीढ़ी के सामाजिक मूल्य अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, पुरानी पीढ़ी परंपराओं और सामूहिकता को महत्व देती है, जबकि युवा पीढ़ी व्यक्तिवाद और स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती है। आर्थिक स्थिरता या तकनीकी नवाचारों से प्रभावित नौकरी के अवसर पीढ़ियों के बीच अंतर पैदा करते हैं।

भारत में जेनरेशन गैप विशेष रूप से स्पष्ट है क्योंकि यहां परंपराएं और आधुनिकता का मिश्रण है। पुरानी पीढ़ी धार्मिक रीति-रिवाजों और संयुक्त परिवार को महत्व देती है, जबकि युवा पीढ़ी वैश्विक संस्कृति (जैसे वेस्टर्न फैशन, सोशल मीडिया) की ओर आकर्षित है।

पत्रकारिता पर भी इन सभी अंतरों का असर पड़ता है। ये सभी अंतर साफ तौर पर उन लोगों को महसूस होते हैं जो दो-तीन पीढ़ियों को अपने सामने पलते और बढ़ते देख रहे हैं। 

जेनरेशन गैप का असर

जेनरेशन गैप का असली असर तब दिखाई देता है जब किसी अखबार में दो या तीन जेनरेशन के लोग एक साथ काम करते दिखाई देते हैं। अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों की कार्यशैली, वैचारिक मूल्य और तकनीकी दक्षता अलग-अलग होती है। पुरानी पीढ़ी के पत्रकार जहां मूल्यों और सामाजिक सरोकार से जुड़ी जनपक्षीय लेखन की वकालत करती है तो नई पीढ़ी के पत्रकारों के दिमाग में इन चीजों के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि इनका विकास अलग माहौल में हुआ है और इन्हें जनपक्षीय विचारों से लैस ही नहीं किया गया है। 

पुराने पत्रकार पारंपरिक खोजी पत्रकारिता और संपादकीय लेखन पर जोर देते हैं, जबकि युवा पत्रकार डिजिटल व्यूज, लाइक्स को प्राथमिकता देते हैं, जिससे कार्यशैली में मतभेद पैदा होते हैं। डिजिटल युग में विज्ञापन और दर्शक संख्या बढ़ाने का दबाव युवा पत्रकारों को सनसनीखेज और वाणिज्यिक कंटेंट की ओर ले जाता है, जो पत्रकारिता के मूलभूत उद्देश्य (जन सरोकार) से भटका सकता है।

भारत में हिंदी पत्रकारिता का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधारों से जुड़ा है (जैसे उदन्त मार्तण्ड का ब्रिटिश विरोधी रुख)। युवा पीढ़ी के पत्रकार वैश्विक संस्कृति, मनोरंजन, और लाइफस्टाइल पर अधिक ध्यान देते हैं, जिससे परंपरागत मूल्यों का प्रभाव कम हो रहा है।

हिंदी पत्रकारिता में भारतेन्दु युग में सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना पर जोर था। आज युवा पीढ़ी की पत्रकारिता में मनोरंजन और वाणिज्यिक कंटेंट पर अधिक ध्यान ने देती है। इससे मूल्यों महत्व घट रहा है। समाचारों प्रतिस्पर्धा में गहन विश्लेषण और सामाजिक मुद्दों की गहराई कम हो सकती है, जो पुरानी पीढ़ी की पत्रकारिता की विशेषता थी।

निष्कर्ष यह है कि पुरानी पीढ़ी के पास सामाजिक सरोकार का बल था तो आज की पीढ़ी के पास तकनीकी ताकत है।

Saturday, 5 July 2025

मन को वहां न बांधिए जहां न मिलती प्रीत

अगर इस पंक्ति को पत्रकारिता में फिट करें तो इसका अर्थ यह होगा कि जिस संस्थान में मान-सम्मान, स्नेह, प्रेम नहीं मिलता है, उस संस्थान में अपना मन मत खोलिए यानी कतई काम मत कीजिए। ऐसे संस्थान को फौरन छोड़ दीजिए। पत्रकारिता में आप मान-सम्मान के लिए ही आएं हैं और यदि वही नहीं मिल रहा है तो फिर क्या फायदा। 

लेकिन क्या ऐसा करना आप अफोर्ड कर पाएंगे क्योंकि अखबारों में वैसे भी नौकरियां मुश्किल से मिलती हैं। ऐसे में लगी-लगाई नौकरी कौन छोड़ेगा। इसका जवाब यह है कि आप बिल्कुल ऐसा करना अफोर्ड कर पाएंगे यदि आपके अंदर हुनर और काबिलियत है तो। आपके अंदर कौन से हुनर होने चाहिए। इस पर भी एक नज़र मार लेते हैं। 

👉 खबरों की समझ- पत्रकारिता के लिए यह सबसे बड़ा हुनर है। खबरों को समझना और महत्व के हिसाब से उसे लिखना या पेज पर उसे डिस्प्ले करना सबसे बड़ा हुनर है। जिस भी पत्रकार के पास यह हुनर होता है, अखबार उसे हर हाल में अपने दफ्तर में रखना चाहेगा। 

👉 खोजने की ललक - यदि आपके अंदर खोजने की ललक है। हर रोज नए-नए तथ्यों को तलाशने का जुनून है और इन्हें नए-नए अंदाज में परोसने का हुनर है तो फिर आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। ऐसे पत्रकारों को अपनी कद्र खुद करनी चाहिए क्योंकि पत्रकारिता में ऐसे लोगों की कमी होती जा रही है। इसलिए कोई भी संस्थान आप जैसे पत्रकार को अपने पास हमेशा के लिए रखना चाहेगा।

👉 सवाल उठाने की कला - यह गुण हर पत्रकार में नहीं होता है। हर पत्रकार भरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में खड़ा होकर सवाल पूछने का साहस नहीं कर सकता है। लेकिन जो भी ऐसा साहस दिखाता है, उसे ही नई चीज मिल पाती है और उसका ही नाम लिया जाता है। यदि आपके पास यह गुण है तो आपको चिंता नहीं करनी चाहिए। 

👉 भाषा की ताकत - अच्छी और मजबूत भाषा हर पत्रकार की बड़ी ताकत होती है। भाषा के बल पर ही पत्रकार अपनी धाक जमा सकता है। जिस भी पत्रकार के पास शुद्ध और प्रभावशाली भाषा है, उसे पत्रकारिता में हमेशा इज़्ज़त मिलती है। इसलिए यदि आपके पास भी ऐसी भाषा है तो आप निश्चिंत होकर अपना फैसला लीजिए। आप कभी भी बेरोजगार नहीं रहेंगे।

👉 तकनीक से ताल्लुक - यह जमाना तकनीक का है। अब हर काम तकनीकी हुनर से होता है। इसलिए हर पत्रकार को खुद को हमेशा नई-नई तकनीक से लैस करते रहना चाहिए। यदि आपने खुद को तकनीक के क्षेत्र में माहिर बना लिया है तो आप बेफिक्र होकर अपने मान-सम्मान की रक्षा कर सकते हैं और यदि मान-सम्मान नहीं मिल रहा हो बेझिझक होकर उस जगह को छोड़ सकते हैं। कोई भी दूसरा संस्थान आपको नौकरी देने से पीछे नहीं हटेगा।

तो आपके अंदर उपरोक्त काबिलियत हैं तो आपको अपने मान-सम्मान की रक्षा करनी चाहिए और यदि ये काबिलियत आपके अंदर नहीं हैं तो इन्हें हासिल करने की शुरुआत आज से ही कर दीजिए। पत्रकारिता खासकर हिंदी पत्रकारिता में हुनरमंद लोगों की कमी होती जा रही है। संस्थान को जरूरत होती है दस योग्य पत्रकारों की तो मिलते हैं दो योग्य लोग। इसलिए पत्रकारिता में अपनी धमक बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज है खुद को काबिल बनाना। जिस दिन आप हर तरह से काबिल हो जाएंगे, यकीन मानिए उस दिन अखबार वाले आपको बुलाकर नौकरी देंगे। फिर तब आपको टॉक्सिक माहौल वाले संस्थान में रहने की जरूरत ही नहीं होगी। 


Friday, 4 July 2025

हिंदी के लिए हम दो क्यों दबाएं

मैं जब भी किसी कंपनी के कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव या बैंक के एक्जीक्यूटिव से बात करता हूं तो उधर अंग्रेजी में बोले गए वेलकम वाक्य का जवाब हिंदी में देता हूं। हिंदी सुनते ही उधर की आवाज एकदम तनाव रहित हो जाती है। आवाज में एक अनौपचारिक मिठास आ जाती है और पूरा माहौल अपना सा लगने लगता है। ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी में बोले गए वाक्य का जवाब अंग्रेजी में देने में मुझे कोई परेशानी है। 

फिर मैं ऐसा क्यों करता हूं। 

मैं ऐसा इसलिए करता हूं ताकि व्यावसायिक बातचीत बिल्कुल रूखा न रहे। इसमें देशज मीठापन घुल जाए, थोड़ा अपनापन उभर आए। यकीन मानिए ऐसा ही होता है। मेरे हिंदी में बोलते ही सामने वाला अनायास सहज हो जाता है। उसकी आवाज की सहजता को आसानी से महसूस किया जा सकता है। विडंबना यह है कि जिस भाषा में बात करने से सुकून मिलता हो, उसके लिए कंपनियों ने दो का बटन निर्धारित कर रखा है। 

इसलिए मैं चाहता हूं कि इस तरह की हर बातचीत हिंदी में की जाए ताकि कंपनियां की ओर से जो ऑटोमैटिक आवाज आती है - हिंदी के लिए दो दबाएं, इसे बदलकर हिंदी के लिए एक दबाएं कर दिया जाए। 

भारत में हिंदी को अपनाने से मना करने वाले बहुत लोग हैं। पूरा का पूरा प्रांत हिंदी के विरोध में कमर कसकर तैयार बैठा रहता है। इसके वाबजूद देश में हिंदी बोलने और समझने वाले हर जगह हैं। जहां हिंदी विरोधी नारे लगते हैं, वहां भी हिंदी बोलने और समझने वाले मिल जाएंगे। फिर भी हर कंपनी और कारपोरेट में हिंदी के लिए दो दबाने को ही कहा जाता है। आपने इस मुद्दे पर कभी विचार किया है। नहीं किया है तो करिए और सोचिए कि हम हिंदी बोलने वाले हिंदी के लिए दो क्यों दबाएं।

Wednesday, 2 July 2025

दफ्तर में चुगली, बाउंसर या गुगली

यह बहुत ही रसीला विषय है। इसमें सबका मन लगता है और क्यों न लगे। इसमें बतरस है और बातें करने का मन किसका नहीं लगता है। लेकिन इसे हमेशा नकारात्मक माना जाता है। इस काम को करने वालों को चुगलखोर कहते हैं। यह शब्द सुनना किसी को भी अच्छा नहीं लगता है। इससे सामाजिक प्रतिष्ठा की क्षति होती है। लेकिन इस काम के कुछ सकारात्मक पहलू भी है। आइए इसे समझते हैं। 

👉 हल्की-फुल्की बातचीत और हानिरहित चुगली लोगों को एक-दूसरे के करीब ला सकती है। यह सहयोगियों के समूह में एकजुटता की भावना पैदा कर सकती है। दफ्तर के काम के तनाव के बीच दोस्तों के बीच हल्की-फुल्की गपशप से हंसी-मजाक का माहौल बनता है जिससे सकारात्मक भावनाएं बढ़ सकती हैं।

👉 चुगली से लोग सामाजिक नियमों, दफ्तर के तौर-तरीकों और दूसरों के व्यवहार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे लोगों के अंदर व्यवहारिकता और सामाजिक सहभागिता का सेंस बढ़ सकता है। कार्यस्थल में चुगली से यह पता चल सकता है कि कौन से सहकर्मी भरोसेमंद हैं या किनसे सावधान रहना चाहिए। कौन बॉस का खास है या बॉस किस तरह का आदमी है। 

👉 कुछ मामलों में चुगली करना तनाव को कम करने का एक तरीका हो सकता है क्योंकि यह लोगों को अपनी भावनाओं या कुंठाओं को व्यक्त करने का मौका देता है। किसी सहकर्मी की शिकायत करने से किसी को अपनी नाराजगी निकालने में मदद मिल सकती है। चुगली से लोग समूह में अपनी या दूसरों की स्थिति को समझ सकते हैं। यह सामाजिक संरचना को समझने और उसमें अपनी जगह बनाने में मदद कर सकता है।

हालांकि चुगली को हमेशा से अच्छा नहीं माना जाता रहा है। समझा जाता है कि इससे रिश्ते खराब होते हैं और आपस में तनाव बढ़ता है। इसलिए कार्यस्थल पर इसे पसंद नहीं किया जाता है। चुगली करने वालों की भी छवि अच्छी नहीं बनती है। इसके नकारात्मक प्रभाव कुछ इस प्रकार हो सकते हैं-

👉चुगली से लोगों के बीच विश्वास टूट सकता है। इससे दोस्तो या सहकर्मियों के बीच संबंध खराब हो सकते हैं। अफवाहें या अधूरी जानकारी फैलने से गलत धारणाएं बनती हैं जो विवाद का कारण बन सकती हैं।

सबसे बड़ी बात, जिसके बारे में चुगली की जाती है, उसे शर्मिंदगी, चिंता या तनाव हो सकता है। उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है। चुगली से किसी की सामाजिक छवि खराब हो सकती है, खासकर अगर बातें झूठी हों।

👉 दफ्तर में चुगली से सहकर्मियों के बीच तनाव फैलने से उत्पादकता में कमी और माहौल खराब हो सकता है। कार्य पर असर पड़ने पर प्रबंधन हस्तक्षेप कर सकता है। चुगली करने वालों पर कार्रवाई भी हो सकती है। 

इसलिए इससे दूरी बनाकर रखना चाहिए और हमेशा दोस्तों के बीच में हंसी-मजाक में चुगली की घुसपैठ को रोकना चाहिए। 

Tuesday, 1 July 2025

अफवाह और खबर में फर्क करना जरूरी

अफवाह और खबर में बड़ा फर्क है। सबसे पहली बात तो यह है कि अफवाह कभी खबर नहीं होती है। यह हमेशा फैलाई जाती है जबकि खबर प्रसारित की जाती है, बताई जाती है। अफवाह के पीछे हमेशा भड़काने का उद्देश्य होता है। खबर का उद्देश्य सूचना देना होता है। कुछ और अंतर इस प्रकार हैं -

स्रोत और विश्वसनीयता

अफवाह- अफवाह का कोई ठोस स्रोत या प्रमाण नहीं होता। यह आपसी बातचीत की शक्ल में अनौपचारिक रूप से लोगों के बीच फैलती है। अफवाह अक्सर गलत या अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकती है।

खबर- खबर का स्रोत विश्वसनीय होता है, जैसे समाचार पत्र, टीवी चैनल, या सरकार या सरकारी मशीनरी का आधिकारिक बयान। यह तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित होती है। खबर का प्रमाण मिल सकता है लेकिन अफवाह का नहीं।

अफवाह- अफवाह की सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकती। यह अनिश्चित और अनियंत्रित होती है।

खबर- खबर की सत्यता की जांच पत्रकार या समाचार एजेंसी द्वारा की जाती है, जिससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है।

प्रसार का तरीका

अफवाह- यह मौखिक रूप से, सोशल मीडिया, या अनौपचारिक बातचीत के जरिए फैलती है। पारिवारिक और सामाजिक ग्रुप से भी इसे फैलाई जाती है।

खबर- यह औपचारिक माध्यमों जैसे समाचार पत्र, टीवी, वेबसाइट, या प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए प्रसारित होती है।

उद्देश्य

अफवाह- अक्सर सनसनी फैलाने, भ्रम पैदा करने, या किसी विशेष एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए फैलाई जाती है। आजकल राजनीतिक एजेंडे के लिए अक्सर अफवाह फैलती रहती है और लोग इसके झांसे में फंस भी जाते हैं। 

खबर- इसका उद्देश्य लोगों को सूचित करना, जागरूक करना, या किसी घटना की सटीक जानकारी देना होता है।

प्रभाव

अफवाह- यह भ्रामक हो सकती है और समाज में भय, अविश्वास, या गलतफहमी पैदा कर सकती है।खबर- यह तथ्यपरक जानकारी प्रदान करती है, जो लोगों को सही निर्णय लेने में मदद करती है।

उदाहरण

अफवाह- सुना है कि शहर में कल भूकंप आएगा। अभी तक विज्ञान ने ऐसा तरीका नहीं खोजा है जिससे भूकंप की भविष्यवाणी की जा सकती है। खबर- मौसम विभाग ने बताया कि अगले 24 घंटों में भारी बारिश की संभावना है। ऐसी भविष्यवाणी  संभव है। विज्ञान के पास ऐसे टूल्स हैं।

AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है...