Friday, 21 November 2025

AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है—जो लोग सीखेंगे, वही टिकेंगे। जो रुकेंगे, वही पीछे छूटेंगे। लेकिन सवाल अब भी वही है: सबसे पहले कौन बह जाएगा?

1. वे नौकरियां जो AI सबसे पहले निगलेगा

AI का पहला हमला उन कामों पर होता है जहां इंसान मशीन की तरह काम करता है, जैसे 

(A) Repetitive / Routine Jobs

डाटा एंट्री

KYC वेरिफिकेशन

कॉल सेंटर के शुरुआती स्तर

फॉर्म भरना

बेसिक अकाउंटिंग

इन कामों में इंसान सिर्फ़ नियम का पालन करता है और नियम-पालन मशीनें इंसानों से तेज़, सस्ता और बिना थके कर लेती हैं।


(B) Media & Content Jobs

यह सेक्टर सबसे तेज़ बदला है।

थंबनेल बनाने वाले

लो-स्किल ग्राफिक्स डिज़ाइनर

बेसिक वीडियो एडिटर

स्क्रिप्ट री-राइटर

छोटी न्यूज़ रिपोर्ट बनाने वाले

AI इनके काम का पहला ड्राफ़्ट सेकंडों में बना देता है, और कई जगह पर तो पूरा काम ही।


(C) IT Sector के Entry-Level Roles

Gen Z का भीड़ वाला सपना — “कोडिंग सीखकर नौकरी मिल जाएगी।”

लेकिन एंट्री-लेवल पर AI तेज़ी से कब्ज़ा कर रहा है।

बेसिक QA टेस्टिंग

कोड डीबगिंग

जूनियर डेवलपर लेवल टास्क

डाक्यूमेंटेशन

AI अब 60–70% कोड खुद लिख देता है। इंसान सिर्फ़ गाइड करता है।

(D) Journalism में Routine Reporting

पत्रकारिता में मनुष्य की ज़रूरत खत्म नहीं होगी — लेकिन बेसिक रिपोर्टिंग ख़त्म होगी।

मौसम

शेयर बाज़ार

खेलों के स्कोर

प्रेस रिलीज़ आधारित खबरें

री-राइटिंग

AI इन सबको बिना थके, बिना गलती, लगातार तैयार करता रहेगा।


2. वह नौकरियां जो AI से सुरक्षित हैं (कम से कम अगले 20 साल)

AI डेटा समझ सकता है, लेकिन मानव भावनाएं, इंसानी निर्णय, और ज़मीन पर चलकर काम करना अभी भी उसकी पहुंच से बहुत दूर है।

(A) Human-Touch Professions

डॉक्टर

नर्स

मनोचिकित्सक

शिक्षक

थेरेपिस्ट

इन पेशों में “मानव संपर्क” खुद एक कौशल है और AI यह नहीं सीख सकता।

(B) Physical Skill Jobs

यह उल्टा है, लेकिन सच है:

ब्लू-कॉलर नौकरियां AI से ज़्यादा सुरक्षित हैं।

प्लंबर

इलेक्ट्रिशियन

कारपेंटर

मेकैनिक

ड्राइवर (भारत में पूरी तरह स्वचालन अभी बहुत दूर है)

इन कामों के लिए AI को वास्तविक दुनिया में चलना, पकड़ना, झुकना, उठाना सीखना पड़ेगा जो बहुत कठिन है।

(C) Creators & Thinkers

इन्वेस्टिगेटिव पत्रकार

लेखक (जो मौलिक सोचते हैं)

फिल्म निर्देशक

रणनीतिकार

नेता

उद्यमी

यह काम “अनुमान + intuition + कहानी कहना” मांगते हैं। मशीनें यहां इंसानी दिमाग के सामने कमजोर पड़ती हैं।


3. AI से नई नौकरियां भी पैदा हो रही हैं

तूफ़ान सिर्फ़ नष्ट नहीं करता—नई ज़मीन भी छोड़ जाता है।

AI की वजह से बन रही नई नौकरियां

Prompt Engineering

AI Supervisor / Quality Checker

AI Ethicist

Cybersecurity Roles

AI-Assisted Design

Data Strategist

No-Code App Builders

AI इंसान को नहीं हटाता, AI इंसान को अपग्रेड करता है।

4. सबसे बड़ा सच: “जिसकी सोच नहीं बदली, उसकी नौकरी सबसे पहले जाएगी।”

AI उन लोगों की नौकरी लेता है, जो सीखना बंद कर देते हैं।

जो काम सिर्फ़ कॉपी-पेस्ट था - जाएगा।

जो कौशल उधार लिए गए थे - जाएगा।

जो इंसान अपनी सोच का इस्तेमाल नहीं करते — जाएंगे। लेकिन जो सीखते हैं, समझते हैं, फैसले लेते हैं। जो AI को अपने सहायक की तरह इस्तेमाल करेंगे, और आगे निकल जाएंगे। AI + Creativity सीखेंगे, वे जीतेंगे। जो सिर्फ़ “नौकरी” पर टिके रहेंगे, वे सिस्टम से बाहर हो जाएंगे।

Thursday, 16 October 2025

छौ नृत्य में क्यों पहना जाता है मुखौटा

छौ नृत्य (Chhau Dance) भारत का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य और नाट्य-शैली है, जो मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में किया जाता है। यह नृत्य युद्ध, शौर्य, पौराणिक कथाओं और लोककथाओं पर आधारित होता है। विदेशों में भी इसकी मांग है।

छौ नृत्य के मुख्य राज्य-झारखंड (सारायकेला), ओडिशा (मयूरभंज), पश्चिम बंगाल (पुरुलिया)

शैली- लोकनृत्य, मुखौटा नृत्य (Mask Dance)

भाषा- नृत्य में संवाद नहीं होते — भाव, संगीत और नृत्य के माध्यम से कथा कही जाती है।

छौ नृत्य की तीन प्रमुख शैलियां हैं -

1. सारायकेला छौ- सरायकेला झारखंड का एक जिला है। इस इलाके में छौ नृत्य की शैली सबसे परिष्कृत यानी जाती है। इसमें नाट्यप्रधान रूप में प्रस्तुति दी जाती है। कलाकार सुंदर मुखौटे पहनते हैं। भावनाओं को मुखौटे और शरीर की भंगिमाओं से व्यक्त किया जाता है।

2. मयूरभंज छौ- यह शैली ओडिशा के मयूरभंज जिले में पाई जाती है। मुख्य बात यह है कि इसमें मुखौटे का उपयोग नहीं किया जाता। यह सबसे अभिनय प्रधान और मार्शल शैली है।इसमें शारीरिक चपलता और नृत्य कौशल पर जोर होता है।

3. पुरुलिया छौ- यह शैली पश्चिम बंगाल के पुरुलिया इलाके से संबंध रखती है। इसमें भव्य मुखौटे और रंगीन पोशाकें होती हैं। कथा अधिक लोक और पौराणिक होती है, जैसे – रामायण, महाभारत, देवी-देवताओं की कथाएं। नृत्य में नाटकीयता और शक्ति प्रदर्शन प्रमुख है।

छौ नृत्य की विषय-वस्तु-

छौ नृत्य के विषय अक्सर भारतीय महाकाव्यों और पुराणों से लिए जाते हैं जैसे, भगवान शिव और पार्वती की कथा, राम-रावण युद्ध, अर्जुन का धनुर्विद्या प्रदर्शन, देवी दुर्गा और महिषासुर का युद्ध।

संगीत और वाद्ययंत्र- छौ नृत्य के मुख्य वाद्ययंत्र हैं ढोल, धुमसा, शहनाई, नगाड़ा, महुरी, और झांझ। इनकी ध्वनि युद्ध, उल्लास या नाटकीय माहौल उत्पन्न करती है।

मुखौटे और पोशाक- मुखौटे स्थानीय कारीगर मिट्टी, पेपर-माशी, और कपड़े से बनाते हैं। हर देवता या राक्षस का मुखौटा अलग शैली में होता है। पोशाकें रंगीन और भारी होती हैं।

यूनेस्को मान्यता-

2010 में यूनेस्को ने "छौ नृत्य" को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage of Humanity)  के रूप में मान्यता दी है।

महत्व- 

छौ नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की पहचान, ग्रामीण समाज का सामूहिक उत्सव और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है।



Friday, 10 October 2025

चार तरह की होती है चाय

चाय चार प्रकार की होती है

। सुबह की चाय, प्यार की चाय, शाम की चाय और इत्मीनान की चाय। इन चारों में क्या फर्क है। 
पहली है सुबह की चाय -सुबह छह बजे उठकर जब आप पानी गर्म करते हैं फिर चाय बनाकर अपनी बीवी को एहतियात के साथ जगाते हैं और फिर साथ में बैठकर पीते हैं तो यह सुबह की चाय कहलाती है। इसमें कोई खास बात नहीं है। हर घर में ऐसा होता है। कहीं शौहर चाय बनाता है तो कहीं बीवी चाय बनाती है।
दूसरी है प्यार की चाय -जब आप मार्निंग वॉक के बाद लौटते हैं तो कभी-कभी बीवी चाय बनाकर पिलाती है। ऐसा रोज़ नहीं होता है। कभी-कभी होता है। यह चाय तभी मिलती है जब आप रात में बीवी की अच्छे से सेवा करते हैं और आपकी सेवा से वह खुश हो जाती है तो सुबह में चाय देती है। जिस दिन चाय नहीं मिले तो समझिए कि आपने अच्छी सेवा नहीं की। आपने ठीक से मेहनत नहीं की।
तीसरी है शाम की चाय -जब आप दफ्तर में साथियों के साथ शाम में हंसी-मजाक के बीच चाय पीते हैं तो ये शाम की चाय हुई। इसमें भी कुछ खास नहीं है।
चौथी है इत्मीनान की चाय -जब आप दफ्तर से लौटते हैं तब बीवी आपके सामने चाय का प्याला रखती है और आप उसे इत्मीनान के साथ पीते हैं क्योंकि आप दिन भर मेहनत करके लौटते हैं और आपको यह इत्मीनान होता है कि आज की दिहाड़ी आपने पूरी कर ली है।
प्यार की चाय और इत्मीनान की चाय आपसे में सगी बहनें हैं क्योंकि दोनों मेहनत के बाद मिलती है। एक दिन में मेहनत करने के बाद और दूसरी रात में मेहनत करने के बाद। 
इसलिए कहा जाता है कि पुरुष दिन-रात मेहनत करता है तब उसकी जिंदगी चलती है।

Thursday, 9 October 2025

हंगरी के साहित्यकार को मिला साहित्य का नोबल पुरस्कार, अपने पीएम के हैं मुखर आलोचक

अपने देश के प्रधानमंत्री की मुखर आलोचना करने वाले   हंगरी के लेखक लास्जलो क्रास्नाहोरकाई को इस साल का नोबल पुरस्कार मिला है। स्वीडिश एकेडमी ने गुरुवार को इसका ऐलान किया। लास्जलो हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान के कट्टर आलोचक माने जाते हैं। भारत और विदेशों में यही फर्क है कि यहां प्रधानमंत्री के आलोचकों को जेल मिलती है और वहां नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है।

स्वीडिश एकेडमी ने कहा कि लास्जलो की रचनाएं बहुत प्रभावशाली और दूरदर्शी हैं। वे दुनिया में आतंक और डर के बीच भी कला की ताकत को दिखाती हैं। लास्जलो को 11 मिलियन स्वीडिश क्रोना (10.3 करोड़ रुपए), सोने का मेडल और सर्टिफिकेट मिलेगा। पुरस्कार 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में दिए जाएंगे।

लास्जलो को 2015 में मैन बुकर इंटरनेशनल प्राइज और 2019 में नेशनल बुक अवॉर्ड फॉर ट्रांसलेटेड लिटरेचर मिल चुका है। उनकी मशहूर किताब सतांटैंगो पर 7 घंटे लंबी फिल्म बन चुकी है।

लास्जलो यहूदी धर्म के हैं लेकिन यह बात उन्हें 11 साल की उम्र का होने पर पता चली थी।

लास्जलो की किताब पर 7 घंटे लंबी फिल्म बनी

लास्जलो हंगरी के सबसे प्रतिष्ठित समकालीन लेखकों में से एक हैं। उनकी किताबें अक्सर दर्शनात्मक होती हैं, जिनमें मानवता, अराजकता और आधुनिक समाज के संकटों का जिक्र होता है।

लास्जलो क्रास्नाहोरकाई डीप थिंकिंग वाली उदास कहानियां लिखते हैं। साल 1985 में आई 'सतांटैंगो' उनकी सबसे मशहूर किताब है। 1994 में इस किताब पर सतांटैंगो नाम से ही 7 घंटे लंबी फिल्म भी बनाई गई थी। इसे अब तक की सर्वश्रेष्ठ आर्टहाउस फिल्मों में से एक माना जाता है।

इसकी कहानी एक छोटे से गांव और वहां के लोगों की मुश्किल जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें अराजकता, धोखा और मानव स्वभाव की कमजोरियों को दिखाया गया है। यह किताब धोखे की कहानी है, जिसमें एक पुराने खंडहर फार्महाउस में कुछ गरीब लोग रहते हैं। वे सोचते हैं कि अब ज्यादा पैसा मिलने वाला है, लेकिन सब कुछ उल्टा हो जाता है।

इसके अलावा उनकी किताब 'द मेलांकली ऑफ रेसिस्टेंस' पर भी फिल्म बन चुकी है।



Wednesday, 8 October 2025

कौन है समुद्र का सबसे बुद्धिमान जीव

जिसने भी संसार की रचना की है, उसके दिमाग या उसकी फैक्ट्री में करोड़ों प्रकार के सॉफ्टवेयर लगे होंगे तभी तो इस पृथ्वी पर तरह-तरह के प्राणी नजर आते हैं। एक तरफ तो समुद्री घोड़े हैं जिनमें नर गर्भवती होते हैं तो दूसरी ओर ऑक्टोपस है जिसमें बच्चों को जन्म देने के बाद मादा की मौत हो जाती है। बच्चों के लिए किसी भी प्राणी द्वारा किया जाने वाला यह सर्वोच्च बलिदान है।

ऑक्टोपस के बारे में कहा जाता है कि वह समुद्र का सबसे रहस्यमय और बुद्धिमान जीव है। इसे “समुद्र का एलियन” भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी बनावट, चाल-ढाल और बुद्धि — सब कुछ पृथ्वी के अन्य जीवों से अलग है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं -

वैज्ञानिक नाम- Octopus vulgaris (सामान्य ऑक्टोपस)

जाति - Cephalopoda (सिर-पांव वाले जीव)। परिवार Octopodidae।

निवास स्थान- समुद्र की गहराइयों में, चट्टानों और मूंगों के बीच

आयु सामान्यतः 1–2 वर्ष

ऑक्टोपस की लगभग 300 प्रजातियां पाई जाती है।

विशेषताएं 

1. असाधारण बुद्धिमत्ता

ऑक्टोपस को सबसे बुद्धिमान अकशेरुकी जीव माना जाता है। वह पहेलियां सुलझा सकता है, जार खोल सकता है, और ट्रेनिंग याद रख सकता है। वैज्ञानिक प्रयोगों में उसने मानव की तरह सीखने की क्षमता दिखाई है।

2. तीन दिल और नीला खून

ऑक्टोपस के तीन दिल होते हैं। दो गलफड़ों को खून भेजते हैं, एक शरीर के बाकी हिस्सों में। इसका खून नीला होता है, क्योंकि इसमें ऑक्सीजन ले जाने वाला तत्व हीमोस्यानिन होता है, जिसमें तांबा पाया जाता है —जबकि मनुष्यों में लोहा होता है, जो खून को लाल बनाता है।

3. इसको आठ भुजाएं होती हैं। मजेदार बात यह है कि हर भुजा में “दिमाग” होता है। दूसरी बात, इसकी हर भुजा में 2000 तक सक्शन कप (चिपकने वाले बिंदु) होते हैं। प्रत्येक भुजा स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती है — यानी हर हाथ का अपना छोटा “मस्तिष्क” होता है। पूरे शरीर में करीब 500 मिलियन न्यूरॉन्स होते हैं। ऑक्टोपस में बिल्ली जितनी बुद्धिमत्ता होती है।

4. रंग और आकार बदलने की क्षमता

ऑक्टोपस कुछ ही सेकंड में अपना रंग, पैटर्न और आकार बदल सकता है। इसके शरीर में विशेष कोशिकाएं होती हैं जिन्हें क्रोमैटोफोर्स कहा जाता है। यह क्षमता उसे शिकार से बचने और शिकार पकड़ने में मदद करती है।

5. रक्षा की अद्भुत रणनीतियां

इसके पास अपने को बचाने के अद्भुत तरीके होते हैं।खतरा महसूस होने पर वह स्याही (ink) छोड़ता है जिससे शिकार करने वाला भ्रमित हो जाता है।

जरूरत पड़ने पर वह अपनी एक भुजा काटकर भाग सकता है, जो बाद में फिर से उग जाती है। वह नरम शरीर होने के कारण किसी भी छोटे छेद या दरार में घुस सकता है।

6. प्रजनन और जीवन-चक्र

नर ऑक्टोपस की एक विशेष भुजा होती है जिससे वह मादा में शुक्राणु स्थानांतरित करता है। अंडे देने के बाद मादा उनकी महीनों तक रखवाली करती है, इस दौरान वह कुछ खाती नहीं और अंततः मर जाती है। यह “मातृत्व में आत्म-बलिदान” का उदाहरण है।

7. विशिष्ट प्रजातियां

1. ब्लू-रिंग्ड ऑक्टोपस – छोटा लेकिन बहुत ज़हरीला, इंसान को भी मार सकता है।

2. जाएंट पैसिफिक ऑक्टोपस – सबसे बड़ा, लंबाई लगभग 5 मीटर तक।

3. डम्बो ऑक्टोपस – गहराई में रहने वाला प्यारा जीव, जिसके कान जैसे फिन होते हैं।

8. रोचक तथ्य

ऑक्टोपस सपने देखता है, और नींद के दौरान उसका रंग बदलता है। यह उपकरणों का इस्तेमाल करने वाला पहला समुद्री जीव माना जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह जीव पृथ्वी पर जीवन की बुद्धिमत्ता का अगला चरण दिखाता है।

Tuesday, 7 October 2025

कौन अपने पार्टनर से करता है सबसे अधिक प्यार

यह जानना दिलचस्प होगा कि पृथ्वी पर कौन ऐसा जीव है जो अपनी फीमेल साथी से सबसे ज़्यादा प्यार करता है? इसका उत्तर सीधा नहीं है, क्योंकि प्रकृति में प्यार अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है- सुरक्षा, बलिदान, निष्ठा, संगति, या जीवनभर साथ रहना।

*️⃣ मनुष्य

मनुष्य में भावनात्मक लगाव सबसे गहरा होता है।

मनुष्यों में प्रेम केवल प्रजनन तक सीमित नहीं है। इसमें आत्मीयता, संवेदना, सामाजिक रिश्ते और बलिदान भी शामिल हैं।

मनुष्य अक्सर अपनी साथी के लिए त्याग करता है, बीमारी-संकट में साथ देता है, और भावनाओं को भाषा व कला के माध्यम से व्यक्त करता है।

*️⃣ पेंगुइन 

इनकी कई प्रजातियां (जैसे एम्परर पेंगुइन) जीवनभर एक ही साथी के साथ रहती हैं।

नर पेंगुइन महीनों तक अंडे की रक्षा करता है, जबकि मादा भोजन जुटाती है। यह साझेदारी गहरे प्रेम और भरोसे जैसी लगती है।

*️⃣ हंस 

हंसों का प्यार भी प्रतीक माना जाता है। ये अक्सर monogamous होते हैं यानी जीवनभर एक ही साथी के साथ रहते हैं। साथी की मौत होने पर कई बार दूसरा हंस अकेले जीवन बिताता है।

*️⃣ भेड़िये 

भेड़ियों के झुंड में नर और मादा (alpha pair) का गहरा बंधन होता है। नर भेड़िया अपनी मादा और बच्चों की सुरक्षा के लिए जान तक लड़ा देता है।

*️⃣ समुद्री घोड़े जैसा कोई नहीं 

धरती पर इनके जैसा कोई नहीं है। यह अपनी महिला साथी को इतना प्यार करता है कि इनमें नर "गर्भवती" होता है और अंडों को अपने शरीर में पालता है। यह प्रकृति का अद्भुत उदाहरण है जहां नर मादा के बोझ को साझा करता है।

*️⃣ गिबन बंदर 

ये प्राइमेट्स हैं और अक्सर जीवन भर जोड़े में रहते हैं। साथ मिलकर बच्चों की परवरिश करते हैं और बहुत स्नेही होते हैं।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अगर भावनात्मक गहराई और बलिदान की बात करें तो मनुष्य अपनी साथी से सबसे ज़्यादा प्यार करता है, क्योंकि यह प्रेम केवल जैविक प्रवृत्ति तक सीमित नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी जुड़ा होता है।

लेकिन अगर प्राकृतिक निष्ठा और जीवनभर के साथ की बात करें, तो हंस और पेंगुइन मनुष्य के बाद सबसे बड़े "प्रेमी" माने जा सकते हैं। लेकिन समुद्री घोड़े (एक तरह की मछली) का प्यार सबसे अलग है। यह अपनी मादा साथी का बोझ गर्भ धारण कर हल्का करता है। धरती पर ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।

Saturday, 27 September 2025

अब भी सीखने का नायाब मंच है अखबार

हर साल गर्मियों की छुट्टी में हमारे संस्थान में 15-20 बच्चे इंटर्नशिप करने आते हैं। कुछ साल पहले तक सिर्फ दिल्ली और यूपी के बच्चे आते थे अब जयपुर, भोपाल आदि दूर के शहरों से भी आने लगे हैं। कभी-कभी तो दक्षिण भारत के राज्यों के भी एक-दो बच्चे आ जाते हैं। इनमें हर लेबल के बच्चे होते हैं यानी फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर और फाइनल ईयर के होते हैं। डिग्री की पढ़ाई करने वाले और डिप्लोमा कोर्स कर रहे बच्चे दोनों होते हैं।

इनसे जब पूछा जाता है कि आगे क्या करना है तो दस में से आठ बच्चों का जवाब होता है-
चैनल में एंकर बनना है।
जब पूछा जाता है कि एंकर ही क्यों बनना है तो ज्यादातर बच्चे इसका स्पष्ट जवाब नहीं दे पाते हैं।
फिर उनसे पूछा जाता है कि चैनल में जाना है तो अखबार में क्यों आए?
उनके पास इसका स्पष्ट जवाब होता है।
वे कहते हैं - कुछ समय अखबार में काम करके सीखना है, काम को समझना है ताकि चैनल में कोई दिक्कत नहीं हो।
यानी अब पत्रकारिता के अधिकतर छात्रों का सपना अखबार में नौकरी करना नहीं है, चैनल में जाना है।  बच्चे अखबार को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। छात्रों को पता है कि चैनलों में उन्हें सीखने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए एक-दो साल अखबारों में काम करके पत्रकारिता की बारीकियों को समझ लेना जरूरी है। अखबारों में काम के दौरान उन्हें सीखने का भरपूर अवसर भी मिलेगा और सिखाने वाले भी मिल जाएंगे।

निष्कर्ष
पत्रकारिता में चाहे जैसी भी एआई तकनीक या रोबोट रिपोर्टर आ जाए, सीखने-सिखाने का गुरुकुल तो अखबार ही बना रहेगा।
#journlism #newspaper #AI
#Robot

AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है...