गुरु पूर्णिमा के मौके पर पत्रकारिता के गुरुओं को भी याद करना चाहिए और गुरू घंटालों को भी। पत्रकारिता में वैसे तो गुरु-शिष्य परंपरा जैसी कोई चीज नहीं होती है लेकिन पढ़ाने, सिखाने और बताने की परंपरा है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि पत्रकारिता में गुरु होते हैं। गुरु की श्रेणी में पत्रकारिता संस्थान के शिक्षकों के अलावा हुनर और पेशागत पेचीदगियों को समझने में मदद करने वाले लोग भी शामिल हैं। नई नौकरी के रास्तों को आसान बनाने, हौसला बढ़ाने और असफल होने से बचाने वाले लोग हर किसी को मिलते हैं। हर किसी के प्रोफेशनल और व्यक्तिगत जीवन में कुछेक लोग ऐसे आते ही हैं जिनके सामने हम सब बच्चा बन जाते हैं और वे हमें बच्चों की तरह सिखाते हैं, पढ़ाते हैं। आप उनका गुरु के रूप में सम्मान करें या सीनियर साथी के रूप में, लेकिन उनका सम्मान करने का मन हमेशा होता है।
लेकिन इनके उल्ट हमें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो गुरुओं के भी गुरु यानी गुरू घंटाल होते हैं। जब ऐसे लोग मिलते हैं तब समझ में नहीं आता कि हम क्या करें?
हम कह सकते हैं कि सबसे ख़तरनाक होता है पत्रकारिता में गुरु से गुरू घंटाल हो जाना। आजकल पत्रकारिता में गुरु कम और गुरू घंटाल ज्यादा पैदा हो गए हैं। इससे दिक्कत यह हो रही है कि आम लोग मीडिया के केंद्र से गायब हो रहे हैं। मीडिया की मुख्य धारा से जनता के दुख-तकलीफ के मुद्दे लगभग गायब हो चुके हैं। जो मुद्दे सामने आते हैं उनमें आमजन की पीड़ा कम होती है। आम लोगों का हमदर्द होने का मुखौटा लगाए घूम रहे लोगों के पास एक ही एजेंडा होता है और वह है सत्ता की चापलूसी का एजेंडा।
पत्रकारिता की दुनिया आजकल गुरू घंटालों से भरी हुई है। हर अखबार, हर न्यूज चैनल में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो पत्रकारिता को अपने और अपने स्वामियों के स्वार्थ की पूर्ति के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। पत्रकारिता की आड़ में बड़े-बड़े इन गुरू घंटालों के कारण पत्रकारिता पर क्या असर पड़ रहा है, इसका सही आकलन करना तो मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर है कि पत्रकारिता की साख में हल्की दरार जरूर आ रही है।
आइए देखते हैं पत्रकारिता में कितने प्रकार के गुरू घंटाल पाए जाते हैं -
*️⃣ एक वे जो अखबारों या न्यूज चैनलों में सामान्य सी जिंदगी जीते हैं। उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता है कि इनके पास कोई ऐसी शक्तियां भी हैं जो आपका मुश्किल से मुश्किल काम भी चुटकी बजाकर करवा देंगे। लेकिन वे कनेक्शन के धनी होते हैं। अपने कनेक्शन के दम पर वे चुटकियों में बड़ा से बड़ा काम करा सकते हैं।
*️⃣ दूसरे टाइप के गुरू घंटाल वे हैं जो न किसी अखबार में होते हैं और न ही किसी न्यूज चैनल या पोर्टल में। वे स्वयंभू पत्रकार हैं। अखबारों और चैनलों में कुछ कनेक्शन के बल पर खुद को पत्रकार बनाए रखते हैं। ये लोग असल में लोगों का काम करते और कराते हैं।
*️⃣ गुरू घंटालों की एक श्रेणी और भी है। इस श्रेणी के गुरू घंटाल पत्रकारों को मीडिया हाउस अपने यहां पालते हैं। ये पत्रकारों वाला काम भी करते हैं यानी डेस्क कर्मी या रिपोर्टर का काम करते हैं लेकिन जब कभी मीडिया हाउस का बड़ा काम सरकारी महकमे में फंस जाता है (अमूमन यह मामला विज्ञापन से जुड़ा होता है) तब इनकी गुरू घंटाली काम आती है। तब इन्हें फंसे हुए काम को निकालने के लिए बाहर निकलना पड़ता है।
आजकल इन गुरू घंटालों की चांदी है। इनकी जरूरत हर किसी को कभी न कभी पड़ ही जाती है। असली पत्रकारिता करने वालों को इनसे बचकर रहने की जरूरत है।
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