Sunday, 20 July 2025

खूंखार जानवरों के बीच इंसानों का पिंजरा

दक्षिण भारत का शहर बंगलुरु अब उत्तर भारतीयों की जुबान पर रहता है क्योंकि यहां इंजिनियरिंग और आईटी का हब है। यहां पूरे देश से पढ़ाई और जॉब के लिए युवा आते हैं। 
यदि सर्वे किया जाए तो शायद यह निष्कर्ष निकलेगा कि बिहार और उत्तर प्रदेश के हर दस घर में से चार घर का बच्चा या बच्ची इस शहर में पढ़ रहा है या नौकरी कर रहा या रही है। इसलिए इस शहर का कलेवर बदल रहा है। 
अपनी इस बंगलुरु यात्रा के दौरान इस बार हमने जानवरों से मुलाकात की। हिरण, चीतल, सांभर, मगरमच्छ, चीता, बाघ-बाघिन, शेर-शेरनी, हाथी-हथिनी को देखा। पेड़ और चट्टान से भी मिले। 
हमने बंगलुरु के Bannerghatta Biological park में पूरा एक दिन गुजारा। इस दौरान सफारी के अलावा तितलियों के मुहल्ले में भी समय बिताया। चिड़ियाघर के जीव-जंतुओं से भी मिले। जानवरों की खासी संख्या के साथ-साथ चिड़ियाघर में पक्षियों का एक बड़ा सा इलाका भी है। लेकिन इन सबमें खास सफारी लगा जिसमें आप पिंजरे में कैद होते हैं और सभी जानवर अपने-अपने घरों में सामान्य जीवन गुजार रहे होते हैं। सर्कसों में शेर, बाघ, चीता, भालू या हाथी को देखने और जंगल सफारी में इन्हें देखने में जमीन आसमान का अंतर है। इन्हें देखकर एक चीज का अहसास बार-बार हुआ कि हमारी गाड़ियों को देखकर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। सड़क किनारे सोया हुआ भालू गाड़ी की आवाज सुनकर भी नहीं जागा। सड़क किनारे बैठे जंगल के राजा शेर की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही। मानो वह जता रहा हो कि वह यहां का राजा है, इसलिए हमारे आने-जाने से उसे फर्क नहीं पड़ता। मानो यह भी कह रहा है, इस इलाके में बचना तुम्हें है। हम तो राजा हैं, हम क्यों किसी की परवाह करें। कुछ ऐसा एटिट्यूड बाघ और बाघिन ने भी दिखाया। बाघ हमें पेड़ों के झुरमुटों में सोया हुआ मिला। हमारी गाड़ी जब तक वहां खड़ी रही, उसने सिर नहीं उठाया। मानो वह भी कह रहा हो, रे मानव, तेरे लिए हम अपनी दोपहर की नींद खराब नहीं करेंगे। मुझसे मिलना है तो बाद में आना। हम निराश होकर आगे बढ़ गए। इस बॉयोलॉजिकल पार्क का एक बड़ा आकर्षण है सफेद बाघ यानी व्हाइट टाइगर। उसने भी यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वह भी जंगल के बॉस सिंडिकेट का बोनाफाइड सदस्य है‌। वह भी हमें सोया हुआ मिला। हमारे आने-जाने से उसको भी कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, लेपर्ड हमें जरूर टहलता हुआ मिला। लेकिन फिर भालू ने एटिट्यूड दिखाई। भालू सड़क पर सोया हुआ था और सोया ही रहा। हमारी गाड़ी में सवार हर व्यक्ति ने इत्मीनान से भालू का दीदार किया। उसकी तस्वीरें खींचीं लेकिन भालू ने सिर उठाने की जहमत नहीं उठाई। हमें हाथियों के झुंड मिले, उछल-कूद मचाते सियार भी मिले। झुंड के झुंड हिरण मिले, चीतल, सांभर और नीलगाय भी समूह में मिले। मगरमच्छ भी पानी से बाहर धूप में लेटे दिखाई पड़े। 
इस तरह से सफारी का सफर जब पूरा हुआ तब तक हम यहां के सारे सदस्यों से मिल चुके थे। लेकिन किसी भी जानवर  ने हमें भाव नहीं दिया क्योंकि यह उनकी दुनिया है और हम वहां घुसपैठियों की तरह पहुंचे थे। वे सभी अपने-अपने घरों में थे, हम उनके घर घूमने गए थे। अब वे हमारा स्वागत कैसे करें, यह उनकी मर्जी। 
जंगल में रहने वालों को जब पार्क में रखा जाता है तब शायद उनके अंदर भी इंसानी आदतें पैदा होने लगती हैं। तब वे दौड़ते नहीं इंसानों की तरह पार्क में चहलकदमी करते हैं। उनके अंदर का खूंखारत्व खत्म होने लगता है। ऐसा होने में कोई खराबी भी नहीं है क्योंकि जब इंसानों के अंदर जानवरों का खूंखारत्व पैदा होने लगा है तो जानवरों में मनुष्यत्व पैदा होने में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।









No comments:

Post a Comment

AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है...