Saturday, 27 September 2025

अब भी सीखने का नायाब मंच है अखबार

हर साल गर्मियों की छुट्टी में हमारे संस्थान में 15-20 बच्चे इंटर्नशिप करने आते हैं। कुछ साल पहले तक सिर्फ दिल्ली और यूपी के बच्चे आते थे अब जयपुर, भोपाल आदि दूर के शहरों से भी आने लगे हैं। कभी-कभी तो दक्षिण भारत के राज्यों के भी एक-दो बच्चे आ जाते हैं। इनमें हर लेबल के बच्चे होते हैं यानी फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर और फाइनल ईयर के होते हैं। डिग्री की पढ़ाई करने वाले और डिप्लोमा कोर्स कर रहे बच्चे दोनों होते हैं।

इनसे जब पूछा जाता है कि आगे क्या करना है तो दस में से आठ बच्चों का जवाब होता है-
चैनल में एंकर बनना है।
जब पूछा जाता है कि एंकर ही क्यों बनना है तो ज्यादातर बच्चे इसका स्पष्ट जवाब नहीं दे पाते हैं।
फिर उनसे पूछा जाता है कि चैनल में जाना है तो अखबार में क्यों आए?
उनके पास इसका स्पष्ट जवाब होता है।
वे कहते हैं - कुछ समय अखबार में काम करके सीखना है, काम को समझना है ताकि चैनल में कोई दिक्कत नहीं हो।
यानी अब पत्रकारिता के अधिकतर छात्रों का सपना अखबार में नौकरी करना नहीं है, चैनल में जाना है।  बच्चे अखबार को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। छात्रों को पता है कि चैनलों में उन्हें सीखने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए एक-दो साल अखबारों में काम करके पत्रकारिता की बारीकियों को समझ लेना जरूरी है। अखबारों में काम के दौरान उन्हें सीखने का भरपूर अवसर भी मिलेगा और सिखाने वाले भी मिल जाएंगे।

निष्कर्ष
पत्रकारिता में चाहे जैसी भी एआई तकनीक या रोबोट रिपोर्टर आ जाए, सीखने-सिखाने का गुरुकुल तो अखबार ही बना रहेगा।
#journlism #newspaper #AI
#Robot

Wednesday, 24 September 2025

हिंदी के नए और पुराने पत्रकारों में क्या है अंतर

आइए हम हिंदी के नए पत्रकारों और पुराने दौर के पत्रकारों (प्रिंट और पारंपरिक टीवी पत्रकारिता) की तुलना करने की कोशिश करते हैं और समझते हैं कि दोनों की पत्रकारिता में क्या फर्क है।

सबसे पहले हम इन दोनों के खबरों के माध्यम और खबरों तक इनकी पहुंच के बीच के फर्क को देखते हैं-

1. माध्यम और पहुंच
पुराने पत्रकार –इनके लिए खबरों के मुख्य माध्यम न्यूज एजेंसी, अख़बार, पत्रिकाएं और टीवी न्यूज़ चैनल होते हैं। पुराने पत्रकार आज भी खबरें इन्हीं माध्यमों से हासिल करते हैं।
नए पत्रकार –इनके लिए खबरों के माध्यम डिजिटल, यूट्यूब, इंस्टा-रील्स, ट्विटर (X), पॉडकास्ट तक फैले हुए हैं। खबरें 24x7 और वैश्विक स्तर पर पहुंचती हैं।

2. भाषा और शैली
पुराने पत्रकार – गंभीर, औपचारिक और साहित्यिक शैली का इस्तेमाल करते हैं। शुद्ध हिंदी का ज़ोर पर हमेशा से इनका जोर रहा है और आज भी है। अखबारों में अशुद्ध भाषा लिखने वालों को प्रवेश नहीं मिलता है। अंग्रेजी शब्दों का कम से कम इस्तेमाल करते हैं।
नए पत्रकार –अपनी भाषा में धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। इनका कोई भी वाक्य अंग्रेजी शब्दों के बिना पूरा नहीं होता है। हिंग्लिश का प्रयोग खूब करते हैं। इसका असर हिंदी भाषा पर नकारात्मक भी होता है।

3. कौशल (Skills)
पुराने पत्रकार – मुख्यतः लेखन या रिपोर्टिंग पर ध्यान देते हैं। फोटोग्राफर और एडिटर अलग होते हैं।
नए पत्रकार – मल्टी-स्किल्ड हैं। लिखते हैं, शूट करते हैं, एडिट करते हैं, थंबनेल बनाते हैं, लाइव भी करते हैं।

4. संवाद (Interaction)
पुराने पत्रकार – एकतरफ़ा संवाद। पाठक/दर्शक को सिर्फ खबर मिलती है, प्रतिक्रिया बहुत सीमित होती है (चिट्ठी या बाद में फोन/ईमेल)।
नए पत्रकार – दोतरफ़ा संवाद। कमेंट बॉक्स, पोल, लाइव चैट और सोशल मीडिया इंटरैक्शन।

5. स्वतंत्रता बनाम संस्थागत बंधन
पुराने पत्रकार – अख़बार या टीवी संस्थान पर निर्भर। संपादक की लाइन ही अंतिम मानी जाती है।
नए पत्रकार – स्वतंत्र यूट्यूब चैनल, ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म चलाते हैं। अपनी आवाज़ और विचार सीधे जनता तक पहुंचा सकते हैं।

6. गति और सटीकता
पुराने पत्रकार – अख़बार दिन में एक बार निकलता था, टीवी पर भी दिन में बुलेटिन चलता है। खबर आने में समय लगता है लेकिन अधिकतर खबरें तथ्यात्मक और ठोस होती हैं। इनका खंडन मुश्किल होता है।
नए पत्रकार – तुरंत रिपोर्टिंग। ब्रेकिंग पर जोर। स्पीड के चक्कर में कई बार सत्यापन चुनौती बन जाता है।

7. विषय-वस्तु (Content)
पुराने पत्रकार – राजनीति, अर्थव्यवस्था, अपराध, साहित्य और संस्कृति पर अधिक ध्यान।
नए पत्रकार – राजनीति और अपराध के साथ-साथ जेंडर, स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी, पर्यावरण, मनोरंजन, लोकल मुद्दे और सोशल मीडिया ट्रेंड्स तक कवर करते हैं।

8. छवि और ब्रांडिंग
पुराने पत्रकार – पत्रकार का नाम प्रिंट में आता था, लेकिन ब्रांड अख़बार या चैनल होता था।
नए पत्रकार – पत्रकार खुद ही "ब्रांड" बन जाता है।

हम यह कह सकते हैं कि पुरानी पत्रकारिता में गहराई, धैर्य और संस्थागत ताक़त है जबकि नई पत्रकारिता में स्पीड और स्वतंत्रता है।
आज की चुनौती है कि दोनों का संतुलन बने – यानी पुराने दौर की गंभीरता और सटीकता + नए दौर की स्पीड और पहुंच एक साथ मिल जाए तो पत्रकारिता का नया युग शुरू हो सकता है।
#new journalism #old journalism

Thursday, 18 September 2025

जेन जी के समय कैसी है हिंदी पत्रकारिता

इस जेनरेशन के दौरान हिंदी पत्रकारिता डिजिटल क्रांति, सोशल मीडिया के उभार और पारंपरिक मीडिया के रूपांतरण का गवाह बनी। इस युग में न सिर्फ पत्रकारिता बदली बल्कि पूरी दुनिया में बड़े-बड़े बदलाव हुए। यहां तक कि इंसानी प्रवृत्तियों में भी भारी बदलाव आने शुरू हो गए। 

इस युग की पत्रकारिता की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-

डिजिटल मीडिया का विस्फोट और ऑनलाइन पत्रकारिता

- जेनरेशन जी या जेनरेशन जेड के समय में इंटरनेट और स्मार्टफोन के प्रसार ने हिंदी पत्रकारिता को पूरी तरह बदल दिया। लगभग सभी दैनिक अखबारों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। 

- वायरल ख़बरों और क्लिकबेट हेडलाइंस का चलन बढ़ा, जिससे पत्रकारिता में सनसनीखे खबरों और उनके त्वरित प्रसार पर जोर बढ़ा।  

सोशल मीडिया का प्रभाव और नागरिक पत्रकारिता

- फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स), और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के प्रसार को लोकतांत्रिक बनाया। आम लोगों ने भी घटनाओं की रिपोर्टिंग शुरू की, जिसे सिटिजन जर्नलिज्म कहा गया। लेकिन इनके कारण पत्रकारिता के मूल्यों का क्षरण भी शुरू हुआ। इन प्लेटफॉर्म पर बिना पुष्टि और स्रोत की खबरों का चलन भी बढ़ा जिससे अनेक तरह की दिक्कतें पेश आने लगीं। लोगों के मन में पत्रकारिता को लेकर संशय पैदा होने लगा। सदियों से चला आ रहा विश्वास डगमगाने लगा। हालांकि लाइव ब्लॉगिंग और रीयल-टाइम अपडेट्स ने खबरों की गति बढ़ाई, लेकिन इससे उत्पन्न फेक न्यूज़ की समस्या के कारण पत्रकारिता का बड़ा नुक़सान भी होने लगा। 

विषयगत विविधता और युवा-केंद्रित कंटेंट

- जेन जेड की रुचियों को ध्यान में रखते हुए फैशन, टेक्नोलॉजी, मानसिक स्वास्थ्य, और पर्यावरण जैसे विषयों को प्रमुखता मिली। पत्रकारिता में अनेक नवीन क्षेत्रों का विकास होने लगा। लाइफस्टाइल और स्वास्थ्य से जुड़ी सामग्रियों के लिए नया पाठक वर्ग भी पैदा हुआ और नए लेखक भी। 

- इन्फ्लुएंसर्स और यूट्यूबर्स ने पारंपरिक पत्रकारों की भूमिका को चुनौती दी लेकिन पत्रकारिता में अराजकता भी पैदा हुई। जैसे-जैसे इनका प्रभाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे पत्रकारिता पर सवाल भी बढ़ रहे हैं।  

इंटरएक्टिव और मल्टीमीडिया पत्रकारिता

- वीडियो न्यूज, पॉडकास्ट्स, और इंफोग्राफिक्स का उपयोग बढ़ा, जिससे समाचारों को समझना आसान हुआ।  

- मीम्स और हास्य वीडियोज के जरिए भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को उठाया जाने लगा यानी अभिव्यक्ति के नए-नए तरीके बने। 

निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि जेन जी यानी जेनरेशन जेड के दौर में हिंदी पत्रकारिता ने गति और पहुंच के मामले में अभूतपूर्व प्रगति की, लेकिन यह प्रगति इसने खबरों  की विश्वसनीयता और गहन विश्लेषण की कीमत पर भी की। यह युग डिजिटल मीडिया के स्वर्णिम अवसरों और उसकी जटिल चुनौतियों का प्रतीक है। लेकिन क्लिकबेट जर्नलिज्म, फेक न्यूज़ और पेड न्यूज के कारण पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल उठे।  एल्गोरिदमिक पूर्वाग्रह (Algorithmic Bias) के चलते समाचारों का चयन पाठकों की पसंद के अनुसार होने लगा। इसका सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ कि खबरों में संतुलित दृष्टिकोण कमजोर होने लगा। शक्तिशाली लोगों, संस्थाओं की पसंद और नापसंद के हिसाब से खबरें मैनिपुलेट होने लगीं और उदंत मार्तण्ड के काल से विकसित हो रही पत्रकारिता की नैतिकता और चरित्र नष्ट होने लगा।

Wednesday, 17 September 2025

केबीसी में हुई सुल्तानगंज की चर्चा

बिहार में मिली थी 'सुल्तानगंज बुद्ध' प्रतिमा 

हाल ही में टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति में सुल्तानगंज की चर्चा हुई। जी हां, वही भागलपुर वाले सुल्तानगंज की चर्चा। दरअसल केबीसी में 'सुल्तानगंज बुद्ध' के बारे में सवाल पूछा गया था। यह जब सवाल पूछा गया तब बहुत सारे लोगों को पता चला कि बिहार में भागलपुर के पास सुल्तानगंज नामक छोटे से शहर में बुद्ध की यह महान प्रतिमा सुल्तानगंज बुद्ध की प्रतिमा जमीन के नीचे से से निकली थी जिसे अंग्रेज उठाकर अपने देश ले गए थे।

सुल्तानगंज बुद्ध प्राचीन भारत की एक प्रमुख धातु प्रतिमा है, जो बौद्ध कला का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। यह गुप्त-पाल काल की संक्रमण अवधि (लगभग 500-700 ईस्वी) की मानी जाती है। यह दुनिया की सबसे बड़ी लगभग पूर्ण तांबे की बुद्ध प्रतिमाओं में से एक है। 

प्रतिमा की ऊंचाई लगभग 2.3 मीटर (7.5 फुट) है, चौड़ाई 1 मीटर और वजन 500 किलोग्राम से अधिक। यह शुद्ध तांबे (कॉपर) से बनी है, जिसे "सीर पेरड्यू" (Cire Perdue) तकनीक से ढाला गया था। प्रतिमा में बुद्ध खड़े मुद्रा में हैं, दाहिना हाथ अभय मुद्रा (भयमुक्ति का प्रतीक) में ऊपर उठा हुआ है, जबकि बायां हाथ नीचे की ओर खुला है। वस्त्र बहुत पतले और चिपके हुए दिखाए गए हैं, जो सारनाथ शैली की विशेषता है।

यह सारनाथ की पत्थर की बुद्ध प्रतिमाओं से प्रेरित है, जिसमें शरीर और अंगों की सुगठित गोलाई और पतली वस्त्र रेखाएं प्रमुख हैं। प्रतिमा में मरम्मत के निशान भी हैं, जो दर्शाते हैं कि इसे बनाने में तकनीकी चुनौतियां आईं।

यह प्रतिमा बिहार के भागलपुर के पास सुल्तानगंज नामक छोटे से शहर से मिली थी। यह शहर गंगा नदी के किनारे स्थित है। इसकी खोज 1861 में ईस्ट इंडियन रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान हुई। इंजीनियर ई. बी. हैरिस ने प्राचीन अवशेषों की खुदाई के दौरान इसकी खोज की। उन्होंने पहले बुद्ध का दाहिना पैर 10 फुट गहराई में पाया, जो संभवतः किसी मठ के मलबे में छिपाकर रखा गया था।

सुल्तानगंज प्राचीन बौद्ध केंद्र था, जहां कई मठ थे। खुदाई में अन्य छोटी प्रतिमाएं भी मिलीं, जैसे दो पत्थर की बुद्ध प्रतिमाएं (एक ब्रिटिश म्यूजियम में, दूसरी सैन फ्रांसिस्को के एशियन आर्ट म्यूजियम में) और एक बुद्ध का सिर (विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम, लंदन में)।

वर्तमान स्थिति

प्रतिमा को खोजने के बाद बर्मिंघम (ब्रिटेन) ले जाया गया, जहां इसे पिघलाने की योजना बनी लेकिन विरोध के कारण ऐसा नहीं हो सका। आज यह बर्मिंघम म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी का प्रमुख आकर्षण है। भारत में इसे वापस लाने की मांगें उठती रही हैं, क्योंकि यह भारतीय विरासत का प्रतीक है।

यह भारतीय धातु कला का सर्वोत्तम उदाहरण है और गुप्त काल की बौद्ध मूर्तिकला को दर्शाता है। यह बौद्ध धर्म के प्रसार और कला कौशल की गवाही देता है। 

यह प्रतिमा न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जो प्राचीन भारत की समृद्धि को उजागर करती है। 

अंग्रेजों के कब्जे से यह मूर्ति कब मुक्त होगी और भारत लौटेगी, इसका पता नहीं। 

जब बंद हो जाए सोशल मीडिया

अगर सोशल मीडिया अचानक बंद हो जाए तो पूरी दुनिया और जेनरेशन जेड पर क्या असर पड़ेगा? अभी इस काल्पनिक सवाल को सिर्फ जेनरेशन जेड यानी जेन जी पर पड़ने वाले असर तक सीमित रखते हैं और देखते हैं क्या-क्या असर पड़ सकता है जेन जी के जीवन पर।

अभी जैसी स्थिति है, इस हिसाब से हम कह सकते हैं कि सोशल मीडिया के बंद होने का जेन जी के जीवन पर गहरा असर पड़ेगा क्योंकि उनकी जीवनशैली, रिश्ते, पढ़ाई, काम और पहचान — सब कुछ कहीं न कहीं सोशल मीडिया से जुड़ा है। इसमें कुछ सकारात्मक असर भी पड़ सकता है और नकारात्मक असर भी। पहले सकारात्मक असर को विस्तार से समझते हैं-

*️⃣ सकारात्मक असर

मानसिक स्वास्थ्य में सुधार – लगातार लाइक, फॉलोअर और व्यूज़ की चाह और तुलना खत्म होगी। मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं।

वास्तविक बातचीत – परिवार और दोस्तों से आमने-सामने की बातचीत बढ़ सकती है, रिश्तों में सच्चाई और प्रगाढ़ता लौट सकती है।

ध्यान और एकाग्रता – अध्ययन और स्वाध्याय पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं क्योंकि डिस्ट्रैक्शन कम होगा। स्क्रीन टाइम घटने से अन्य कामों के लिए ज्यादा समय मिलेगा।

रचनात्मकता के नए रास्ते – लोग ऑफलाइन शौक (पढ़ना, खेल, कला, संगीत) की ओर लौट सकते हैं। नए करियर की तलाश कर सकते हैं। खेलकूद के लिए भी समय रहेगा। 

सबसे बड़ी बात - जीविकोपार्जन के नए स्रोत की तलाश करनी होगी क्योंकि ऑनलाइन आमदनी बंद हो चुकी होगी। किसी रोजगार या नौकरी की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में देश और समाज को सृजनात्मक दिमाग की सेवा मिलेगी। 

*️⃣ नकारात्मक असर

पहचान और अभिव्यक्ति का संकट – बहुत से युवाओं की ऑनलाइन पहचान ही असली पहचान बन चुकी है। सोशल मीडिया बंद होते ही उन्हें अकेलापन और असुरक्षा महसूस होगी।

करियर पर चोट – इंफ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स, डिजिटल क्रिकेटर्स जैसे नए करियर पूरी तरह सोशल मीडिया पर टिके हैं। लाखों युवाओं की कमाई का जरिया खत्म हो जाएगा। हजारों लोग बेरोजगारी की चपेट में आ सकते हैं। इससे समाज में नई तरह की समस्या पैदा हो सकती है।

सूचना का अभाव – जेन जेड न्यूज़पेपर या टीवी से कम और इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स (ट्विटर) से ज्यादा खबरें लेते हैं। ऐसे में जानकारी तक पहुंच मुश्किल हो जाएगी। ज्ञान की कमी से अंदर की ताकत में कमजोरी महसूस करेंगे।

समुदाय से कटाव – ऑनलाइन ग्रुप, फैन कम्युनिटी, या डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर बने रिश्ते टूट जाएंगे। बात करने को कोई नहीं मिलेगा तो मन पर बोझ सा अनुभव करेंगे। 

विरोध और एक्टिविज़्म कमजोर – सोशल मीडिया ने जेन जेड को आंदोलन और सामाजिक बदलाव की ताकत दी है। इस प्लेटफार्म पर विरोध करने की इन्हें आदत सी हो गई है। इसके बंद होने से उनकी आवाज़ कमजोर हो सकती है। इससे घुटन महसूस करेंगे। 

*️⃣ मनोवैज्ञानिक असर

शुरुआती दौर में विथड्रावल सिंड्रोम जैसा असर होगा (जैसे नशा छोड़ने पर होता है)। इससे बेचैनी बढ़ेगी और चिड़चिड़ापन महसूस होगा। जीवन में खालीपन भर जाएगा। किसी काम में मन नहीं लगेगा। दिन और रात काटना मुश्किल हो जाएगा। कुछ समय तक गहरे सदमे जैसी हालत में रहेंगे। 

धीरे-धीरे कुछ लोग नई ऑफलाइन आदतें विकसित करेंगे, जबकि कुछ को गहरे अवसाद का सामना करना पड़ सकता है।

निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि सोशल मीडिया बंद होने का असर जेन जेड पर दोधार वाली तलवार की तरह होगा—

एक ओर यह स्थिति उन्हें ज्यादा स्वस्थ और संतुलित बना सकती है। 

दूसरी ओर यह स्थिति उनकी अभिव्यक्ति, करियर, आमदनी और सामाजिक कनेक्शन को गहरा झटका दे सकती है।

Saturday, 13 September 2025

कौन हैं जेन जी, मनुष्यों की कितनी पीढ़ियां आ चुकी हैं धरती पर

मनुष्यों की पीढ़ियों (जेनरेशन) का बंटवारा मुख्य रूप से जन्म के वर्ष, सामाजिक-ऐतिहासिक घटनाओं, सांस्कृतिक प्रभावों और तकनीकी विकास के आधार पर किया गया है। यह वर्गीकरण समाजशास्त्र, मार्केटिंग और मीडिया में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। नीचे प्रमुख पीढ़ियों और उनके विभाजन के आधार का विवरण दिया गया है:

*️⃣ ग्रेटेस्ट जेनरेशन (1901-1927)

यह पीढ़ी प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) और द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान वयस्क हुई। इन्हें "ग्रेटेस्ट" इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन्होंने युद्धों और महामंदी (1929) जैसी चुनौतियों का सामना किया और समाज के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विशेषताएं - यह बहुत ही मेहनती पीढ़ी साबित हुई। इसके  साथ ही इनके अंदर अनुशासन कूट-कूटकर भरी हुई थी। इतना ही नहीं इस पीढ़ी के लोग राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे। यह दौर आजादी के अलग-अलग मोर्चों पर चल रही निर्णायक लड़ाई का दौर था। इसलिए इस पीढ़ी के लोग भी पक्के देशभक्त थे। स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। जेल भी जाते थे और भारत माता के लिए हंसते-हंसते जान देने का जज्बा भी रखते थे। 

*️⃣ साइलेंट जेनरेशन (1928-1945)

यह पीढ़ी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और कोरियाई युद्ध (1950-1953) के दौरान वयस्क हुई। इन्हें साइलेंट इसलिए कहा गया क्योंकि ये पीढ़ी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कम बोलती थी और मौन रहकर काम करने में विश्वास रखती थी।

- विशेषताएं - परंपरावादी, वफादार और संयमित जीवनशैली।

*️⃣ बेबी बूमर्स (1946-1964)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जनसंख्या में अचानक वृद्धि ("बेबी बूम") के कारण इस पीढ़ी का नामकरण हुआ। ये लोग वियतनाम युद्ध (1955-1975) और नागरिक अधिकार आंदोलनों के दौरान युवा थे।

- विशेषताएं - आशावादी, प्रतिस्पर्धी और सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय।

*️⃣ जेनरेशन एक्स (1965-1980)

यह पीढ़ी शीत युद्ध (1947-1991) के अंत और इंटरनेट के आगमन के बीच पली-बढ़ी। इन्हें "एक्स" इसलिए कहा गया क्योंकि ये पहली पीढ़ी थी जिसे भविष्य की अनिश्चितता का सामना करना पड़ा।

विशेषताएं - स्वतंत्र, व्यावहारिक और प्रौद्योगिकी के प्रति अनुकूलनशील।

*️⃣ मिलेनियल्स या जेनरेशन वाई (1981-1996)

यह पीढ़ी नए सहस्राब्दी (मिलेनियम) के आसपास वयस्क हुई और डिजिटल क्रांति (इंटरनेट, सोशल मीडिया) का हिस्सा बनी।

- विशेषताएं - तकनीक-प्रेमी, सहयोगी और सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक।

*️⃣ जेनरेशन जेड या जेन जी (1997-2012)

यह पीढ़ी स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के युग में पली-बढ़ी। इन्हें "डिजिटल नेटिव्स" भी कहा जाता है।

-विशेषताएं - उद्यमी, विविधतापसंद और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील।

जेनरेशन अल्फा (2013-2024)

यह पहली पीढ़ी है जो पूरी तरह से 21वीं सदी में जन्मी और एआई, वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीकों के साथ बड़ी हो रही है।

- विशेषताएं- तकनीकी रूप से समृद्ध, रचनात्मक और वैश्विक सोच वाली।

पीढ़ियों का यह वर्गीकरण उनके जन्मकालीन ऐतिहासिक संदर्भों, तकनीकी प्रगति और सांस्कृतिक बदलावों पर आधारित है। हालांकि, यह सीमाएं लचीली हैं और विभिन्न स्रोतों में थोड़े भिन्न हो सकती हैं। इसका उद्देश्य समाज के विभिन्न समूहों की विशेषताओं और चुनौतियों को समझना है।


Tuesday, 9 September 2025

क्यों गायब हो गए निर्भीक और स्वतंत्र शब्द

पुराने जमाने के अखबारों के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर एक वाक्य लिखा होता था -निर्भीक और निष्पक्ष दैनिक। किसी अन्य अखबार में लिखा होता था -स्वतंत्र राष्ट्रिय हिंदी दैनिक (उदाहरण के लिए पटना से तब प्रकाशित हिंदी दैनिक आर्यावर्त। इस पर लिखा होता था -स्वतंत्र राष्ट्रिय हिंदी दैनिक। इसी के साथ अंग्रेजी में निकलता था-द इंडियन नेशन। उस पर लिखा होता था -An independent daily)। यह वाक्य एक तरह से अखबारों की उद्घोषणा मानी जाती थी। माना जाता था कि अखबार इसी नीति पर चलता है। हर दबाव से मुक्त रहकर पूरी तरह स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष होकर पत्रकारिता करता है। कम से कम यह वाक्य पाठकों को आश्वस्त तो करता ही था कि यह अखबार आजाद है, निडर है और किसी के दबाव में नहीं आता है। यह बात भी नोट करने लायक है कि अखबार यह वाक्य सिर्फ लिखते ही नहीं थे, व्यवहार में इसे साबित करने की कोशिश भी करते थे‌। अखबार बहुत हद तक निष्पक्ष और निर्भीक दिखाई भी पड़ते थे।

आज के अखबारों के पहले पन्ने पर लिखा होता है -देश में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार। सर्वाधिक प्रसार वाला अखबार। सबसे विश्वसनीय अखबार। नंबर एक अखबार। भरोसे वाला अखबार। आज हिंदी अखबारों में जो वाक्य लिखे होते हैं वे यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि हिंदी पाठकों का सबसे बड़ा चहेता अखबार वह ही हो। माना जाता है कि इस तरह के वाक्य इंडियन रीडरशिप सर्वे के आंकड़ों के आधार पर लिखे जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद आज की पीढ़ी को यह पता तो होना चाहिए कि पहले के अखबारों को निष्पक्ष और निर्भीक शब्द पसंद थे। फिर यह सवाल तो उठता है कि स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष शब्द गायब क्यों हो गए? क्या इन शब्दों से किसी को कोई खतरा है?



Tuesday, 2 September 2025

सपने बड़े, सोच छोटी

हर इंसान अपने जीवन में कुछ हासिल करना चाहता है। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई लेखक, कोई व्यापारी, तो कोई नेता। हर किसी के सपने अलग-अलग होते हैं, लेकिन उनमें एक समानता है—सपने सभी बड़े होते हैं। परंतु विडंबना यह है कि अक्सर इंसान की सोच उन सपनों जितनी बड़ी नहीं होती। यही कारण है कि बहुत-से सपने अधूरे रह जाते हैं।

बड़े सपने क्यों ज़रूरी हैं?

बिना सपनों के जीवन अधूरा है। सपने ही इंसान को सुबह उठकर संघर्ष करने की ताकत देते हैं।

अगर महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत का सपना न देखा होता, तो हम आज़ादी तक पहुंच ही नहीं पाते।

अगर राइट ब्रदर्स ने उड़ान का सपना न देखा होता, तो आज हवाई जहाज़ हमारी ज़िंदगी का हिस्सा न बनते।

अगर धीरूभाई अंबानी ने "गांव का लड़का" होने के बावजूद बड़े उद्योगपति बनने का सपना न देखा होता, तो रिलायंस जैसा साम्राज्य खड़ा न होता।

ये उदाहरण बताते हैं कि बड़े सपने इंसान को असंभव को संभव करने की शक्ति देते हैं।

छोटी सोच की सबसे बड़ी भूल

छोटी सोच का मतलब केवल पैसे या साधनों की कमी नहीं है। यह एक मानसिक सीमा है, जो हमें आगे बढ़ने से रोकती है। उदाहरण के लिए—

कोई छात्र बड़ा अधिकारी बनना चाहता है, लेकिन मेहनत और पढ़ाई से बचता है।

कोई युवा करोड़पति बनने का सपना देखता है, लेकिन नौकरी करते हुए नई स्किल सीखने की हिम्मत नहीं करता।

कोई लेखक बेस्टसेलर किताब लिखना चाहता है, लेकिन लगातार लिखने की आदत नहीं डालता।

ऐसे लोग अपने सपनों को केवल कल्पनाओं तक सीमित कर देते हैं।

सोच को बड़ा कैसे बनाएं?

1. असफलता को स्वीकारें – थॉमस एडीसन ने बल्ब बनाने में हज़ारों बार असफलता झेली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

2. सकारात्मक दृष्टिकोण रखें – नकारात्मक सोच हमें वहीं रोक देती है, जहां हम खड़े हैं। सकारात्मकता नए रास्ते दिखाती है।

3. ज्ञान और अनुभव बढ़ाएं – नई स्किल सीखना, पढ़ना और अनुभव इकट्ठा करना बड़ी सोच की निशानी है।

4. सीमाओं को तोड़ें – "मैं यह नहीं कर सकता" जैसी सोच छोड़कर "कैसे कर सकता हूं" पर ध्यान देना होगा।

निष्कर्ष

“सपने बड़े, सोच छोटी” एक वाक्य है, लेकिन यह दरअसल जीवन की सच्चाई को दर्शाता है। बड़े सपनों को पूरा करने के लिए सोच का विस्तार ज़रूरी है। हमें अपने डर, संदेह और आलस्य को पीछे छोड़कर साहस, विश्वास और परिश्रम को अपनाना होगा।

याद रखिए—

सपने तभी पूरे होते हैं, जब इंसान की सोच उन सपनों से भी बड़ी हो। 


हम पत्रकार बनते क्यों हैं

एक ज्वलंत सवाल। इसका जवाब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग हो सकता है। लेकिन हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत (उदंत मार्तंड) से लेकर आज तक पत्रकार बनने के पीछे कुछ सर्वमान्य कारण इस प्रकार हैं -

*️⃣ सच को सामने लाने की इच्छा

पत्रकारिता का मूल काम है लोगों तक सच्चाई पहुंचाना। कई लोग पत्रकार इसलिए बनते हैं ताकि झूठ, अफवाह या सत्ता के पर्दे के पीछे छुपी बातों को उजागर कर सकें। (यह अलग बहस का मुद्दा है कि इसके लिए मंच कहां है)

*️⃣ समाज में बदलाव की चाह

पत्रकार खुद को समाज का चौथा स्तंभ मानते हैं। बहुतों के लिए पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं बल्कि मिशन होती है—अन्याय, भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का रास्ता।

*️⃣ लोगों की आवाज बनने का जुनून

जो वर्ग अपनी बात खुद नहीं कह पाता, पत्रकार उनकी आवाज बनते हैं। चाहे किसान हों, मजदूर हों, या हाशिये पर खड़े लोग—पत्रकार उनके मुद्दों को मंच देते हैं।

*️⃣ ज्ञान और जिज्ञासा

पत्रकारिता का मूल है सवाल पूछना और उसका जवाब खोजना। जिन लोगों में लगातार जानने-समझने की प्यास होती है, वे पत्रकारिता की ओर आकर्षित हो जाते हैं। ज्ञान बटोरते हैं और उसे फैलाते हैं।

*️⃣ रोमांच और विविधता

हर दिन नई घटनाएं, नए लोग, नए अनुभव—यह पेशा जीवन को एकरसता के जाल से बाहर निकालता है। बहुत से लोग इस रोमांच के कारण इसे चुनते हैं।

*️⃣ प्रभाव और पहचान

पत्रकारिता से समाज में एक पहचान और प्रभाव बनता है। लोग आपकी लिखी/बोली हुई बातों को गंभीरता से लेते हैं, उससे प्रभावित होते हैं। कई लोग इसी पहचान और प्रभाव के कारण इसे चुनते हैं।

संक्षेप में कहें तो हम पत्रकार इसलिए बनते हैं क्योंकि हमें सच जानने और उसे लोगों तक पहुंचाने का जुनून होता है। कुछ लोग इसे मिशन समझकर करते हैं, कुछ पेशा बनाकर, और कुछ दोनों के बीच संतुलन बनाकर।

या फिर जेन जी के जमाने में पत्रकार इसलिए बनते हैं ताकि

-सत्ता की गोद में खेल सकें 

-दूसरों के एजेंडे को समाज में फैला सकें 

-अफवाह और क्लिकबेट की ताकत पर अपना/अपने आकाओं का स्वार्थ सिद्ध कर सकें 

-समाज को मूल मुद्दों से भटकाने की मुहिम चला सकें 

-समाज में गलत विचारों की पैठ बना सकें। 

आज देश में हर तरह की पत्रकारिता के लिए ऑप्शन खुले हुए हैं। आप के सामने सुख और मौज-मस्ती वाली पत्रकारिता में जाने का अवसर भी है और सत्य के पक्ष में खड़े होने का अवसर भी है। चयन आपको करना है कि आप कौन सा पत्रकार बनने का फैसला करते हैं। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना चाहिए कि जब कोई जनहित की पत्रकारिता का चयन करता है तब उसे इसमें छिपे जोखिम, दिक्कतों और परेशानियों को झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है...