अंग्रेजी प्रेम या अंग्रेजी में नहीं बोलने पर पिछड़ जाने के अज्ञात डर के कारण हिंदी बोलने में सक्षम लोग भी अपने संवादों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल कर लेते हैं। ऐसा करके वे न हिंदी के होते हैं और न ही अंग्रेजी के। वे बीच में झूलते रह जाते हैं। हालांकि ऐसा करना इन दिनों जरूरी आम प्रचलन में है। युवा पीढ़ी के संवाद में अंग्रेजी शब्दों की भरमार होती है। उनके हर वाक्य में कोई न कोई अंग्रेजी का शब्द होता ही है।
यह बात अलग है कि जो अंग्रेजी शब्द हिंदी में स्वीकृत हो चुके हैं यानी जिन अंग्रेजी शब्दों को हिंदी में अपना लिया गया है, उनके इस्तेमाल से कोई परहेज़ नहीं करना चाहिए लेकिन जो शब्द शुद्ध अंग्रेजी के हैं, उनका इस्तेमाल हिंदी भाषा की शुद्धता को नष्ट करता है। इसलिए इससे बचने की जरूरत है।
पत्रकारिता में यह समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है जब पत्रकारों की नई पीढ़ी मीडिया में प्रवेश कर रही है। इनके बोलचाल में अंग्रेजी शब्दों का भरपूर इस्तेमाल होता है। इस पीढ़ी के पत्रकार जब हिंदी में खबर लिखने बैठते हैं तो उनके लेखन में अपने आप अंग्रेजी के शब्द आ जाते हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि खबरों की भाषा खिचड़ी बनती जा रही है। ऐसी खबरें उन पाठकों को बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है जो शुद्ध हिंदी में खबरें या लेख या विश्लेषण पढ़ना चाहते हैं या जिनकी आदत शुद्ध हिंदी में पढ़ने की है। यदि हालात ऐसे ही बने रहें या इससे भी ज्यादा खराब हो गए जाएं तो हिंदी का स्वरूप ही बदल जाएगा। यदि हालात ऐसे ही बने रहें तो नई जेनरेशन यानी जेन बीटा या उसके बाद की पीढ़ी जब बड़ी होकर पत्रकारिता की कमान संभालेगी तब उनके लिए खिचड़ी हिंदी ही मानक भाषा बन चुकी होगी और शुद्ध हिन्दी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
अभी इस खतरे से उबरने का समय है क्योंकि इस समय पत्रकारिता में वे लोग भी सक्रिय हैं जो शुद्ध हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। ये लोग नई पीढ़ियों को शुद्ध हिंदी लिखना सिखा सकते हैं। इन लोगों के पास शुद्ध हिंदी में लिखने का हुनर भी है ज्ञान भी। जरूरत किसी ऐसे तरीके को विकसित करने की है जिसकी सहायता से पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ियों के पत्रकारों को शुद्ध हिंदी का प्रशिक्षण दे सकें, उन्हें शुद्ध हिंदी लिखने की अहमियत और जरूरत के बारे में बता सकें।
कुछ अखबारों में अब भी ऐसा पुरजोर प्रयास किया जाता है कि हिंदी की खबरों में अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाए। इसके लिए इन अखबारों में बजाप्ता अभियान चलाया जा रहा है। लोगों को प्रक्षिशित किया जा रहा है। लेकिन कुछ अखबारों में धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल होता है।
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