Tuesday, 9 September 2025

क्यों गायब हो गए निर्भीक और स्वतंत्र शब्द

पुराने जमाने के अखबारों के पहले पन्ने पर सबसे ऊपर एक वाक्य लिखा होता था -निर्भीक और निष्पक्ष दैनिक। किसी अन्य अखबार में लिखा होता था -स्वतंत्र राष्ट्रिय हिंदी दैनिक (उदाहरण के लिए पटना से तब प्रकाशित हिंदी दैनिक आर्यावर्त। इस पर लिखा होता था -स्वतंत्र राष्ट्रिय हिंदी दैनिक। इसी के साथ अंग्रेजी में निकलता था-द इंडियन नेशन। उस पर लिखा होता था -An independent daily)। यह वाक्य एक तरह से अखबारों की उद्घोषणा मानी जाती थी। माना जाता था कि अखबार इसी नीति पर चलता है। हर दबाव से मुक्त रहकर पूरी तरह स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष होकर पत्रकारिता करता है। कम से कम यह वाक्य पाठकों को आश्वस्त तो करता ही था कि यह अखबार आजाद है, निडर है और किसी के दबाव में नहीं आता है। यह बात भी नोट करने लायक है कि अखबार यह वाक्य सिर्फ लिखते ही नहीं थे, व्यवहार में इसे साबित करने की कोशिश भी करते थे‌। अखबार बहुत हद तक निष्पक्ष और निर्भीक दिखाई भी पड़ते थे।

आज के अखबारों के पहले पन्ने पर लिखा होता है -देश में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार। सर्वाधिक प्रसार वाला अखबार। सबसे विश्वसनीय अखबार। नंबर एक अखबार। भरोसे वाला अखबार। आज हिंदी अखबारों में जो वाक्य लिखे होते हैं वे यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि हिंदी पाठकों का सबसे बड़ा चहेता अखबार वह ही हो। माना जाता है कि इस तरह के वाक्य इंडियन रीडरशिप सर्वे के आंकड़ों के आधार पर लिखे जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद आज की पीढ़ी को यह पता तो होना चाहिए कि पहले के अखबारों को निष्पक्ष और निर्भीक शब्द पसंद थे। फिर यह सवाल तो उठता है कि स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष शब्द गायब क्यों हो गए? क्या इन शब्दों से किसी को कोई खतरा है?



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