इसलिए हम हैरान नहीं होते क्योंकि जब हम मरते हैं तो अखबारों में खबरें बनती हैं। एक-दो दिन शोर मचता है। सुकून देने वाले बयान आते हैं। हम आश्वस्त होते हैं कि अब ऐसा नहीं होगा लेकिन फिर वैसा ही हो जाता है और हम फिर मर जाते हैं। सिस्टम को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।
अब कोई क्या करे जब हम मरने पर उतारू हो जाते हैं तब कोई क्या करे। हम ट्रेन के पायदान पर लटक कर सफर करते हैं क्योंकि हमें अपने काम पर समय पर पहुंचना होता है और हर ट्रेन में एक जैसी भीड़ होती है। हम लटक जाते हैं और मर जाते हैं। कोई करे तो क्या करे। आंधी-तूफान बारिश में हम सड़क पर होते ही क्यों हैं जो पोल हमारे ऊपर गिर जाते हैं। हम भी क्या करें। नौकरी के लिए घर से निकलना जरूरी होता है, इसलिए निकलते हैं। हम पुल पर चलते-चलते भी मर जाते हैं। अब अंग्रेजों के जमाने का पुल कभी न कभी तो टूटेगा ही। समय रहते किसी ने सोचा नहीं कि यह पुराना हो गया है, टूट भी सकता है। हमने भी तो नहीं सोचा। विश्वास करते रहे कि जब सरकार ने इसे बंद नहीं किया तो मजबूत ही होगा। नहीं सोचा तो भुगत भी लिया।
लेकिन इन चीजों पर एक बात तो हम कह ही सकते हैं-
हम भारत के लोग कभी नहीं शर्माते हैं
हम भारत के लोग कहीं भी मर जाते हैं।
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