Saturday, 24 May 2025

न काहू से दोस्ती न काहू से वैर

प्रख्यात पत्रकार और स्तंभकार खुशवंत सिंह जीवन भर इस नाम से प्रसिद्ध कालम लिखते रहे। अंग्रेजी अखबारों में इसका नाम था-"विथ मालिस टुवर्ड वन एंड ऑल"। यह पत्रकार खुशवंत सिंह द्वारा भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम श्रृंखला थी। इसमें वे नेता, नौकरशाह, बिजनेस मैन हर किसी के बारे में लिखते रहे थे। अपने दोस्तों को भी वे नहीं बख्शते थे। इसका हिंदी अनुवाद छपता था -न काहू से दोस्ती न काहू से वैर। इसका मतलब है कि पत्रकारों का न कोई दोस्त होता है और न कोई दुश्मन। यहां इसकी व्याख्या करने के बजाय एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। यह सच्ची घटना है लेकिन पात्र और जगह के नाम नहीं दिए गए हैं -

एक बार किसी राज्य सरकार के एक नेता जी को पता चला कि शहर के नामी अखबार में उनके खिलाफ कोई खबर छपने वाली है। उन्होंने उस अखबार के संपादक से मिलने का मन बनाया। संयोग से दो-चार दिनों बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हो गई। नेता जी ने संपादक को एक तरफ ले जाकर पूछ लिया कि भाई, कोई नाराज़गी है क्या। फिर उन्होंने अपनी शंका जाहिर की और खबर न छापने की विनती की। संपादक ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी कोई बात उनकी जानकारी में नहीं है। नेता जी आश्वस्त हो गए कि जब संपादक को नहीं पता है तो बात ग़लत होगी। वे चैन की नींद सो गए। दूसरे दिन उसी अखबार में पेज वन पर उनके काले कारनामों पर टाप बॉक्स खबर छपी हुई थी। खबर में पुख्ता सबूत भी थे। वे खबर का खंडन करने लायक स्थिति में भी नहीं थे। इसे कहते हैं न काहू से दोस्ती न काहू से वैर। 

पुरानी पत्रकारिता में ऐसा होता रहा है। होता तो यह भी था कि जब ऐसे लोग संपादक को फोन करते थे तब संपादक का जवाब होता था, मैं भी हैरान हूं, मुझे बिना बताए रिपोर्टर ने खबर कैसे छाप दी। अभी उसकी खबर लेता हूं। आप ऐसा करिए कि खबर का खंडन लिखकर भेज दीजिए। हम आपकी बात भी छाप देंगे। अधिकांश मामलों में खंडन नहीं आता था क्योंकि खंडन करने की गुंजाइश नहीं होती थी। खबर में सब-कुछ परफेक्ट होता था। उस समय ऐसी खबरों को ठोक-बजाकर, उसे हर एंगल से परखने के बाद ही अखबार में छापा जाता था। जब किसी ताकतवर व्यक्ति पर उंगली उठाई जाती थी तो कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती थी। और यदि कभी खंडन आ भी जाता था तो उसमें उस लायक तथ्य नहीं होते थे। यदि कोई तथ्य हुआ तो अखबार उसे जरूर छापते थे लेकिन साथ में रिपोर्टर का जवाब भी छपता था जो फिर से एक नए घोटाले को उजागर कर देता था। 

आज स्थिति उलट है। अधिकांश हिंदी अखबारों में तो ऐसी खबरें छपती ही नहीं हैं जिनका खंडन करने की जरूरत पड़े। और कभी गलती से ऐसी कोई खबर छप जाए और उसका खंडन आ जाए तो खंडन छपता है, रिपोर्टर का पक्ष नहीं।

पत्रकारिता के छात्रों को करियर शुरू करने से पहले मन बना लेना चाहिए कि उन्हें क्या करना है। वैसे भी अब वैसा माहौल कम ही अखबारों में मिलता है जैसे माहौल में पहले काम होता था। पहले का माहौल था बेखौफ और बिंदास। न किसी का डर न किसी का दबाव क्योंकि उस समय के अखबार न काहू से दोस्ती न काहू से वैर वाले सिद्धांत पर चलते थे। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। बहुत कम अखबारों में यह सिद्धांत चलता है।

आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या। लेकिन आज की पत्रकारिता में घोड़े ने घास से दोस्ती करना सीख लिया है या फिर घास से दोस्ती घोड़े की मजबूरी हो गई है। दोनों ही स्थितियों में घाटे में तो पत्रकारिता ही रही।  

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