हैं। वैसे इसका नाम व्हाइट कॉटन सिल्क ट्री है जिसे आम बोलचाल में कॉटन सिल्क ट्री भी कहते हैं। इसकी ऊंचाई लगभग 26 मीटर (85 फीट) है और जड़ों का फैलाव भी विशाल है। इसका अंग्रेजी नाम है-Kapok tree। यह पेड़ लालबाग गार्डन का बहुत ही सम्मानित और बुजुर्ग सदस्य है क्योंकि इसकी उम्र 200-250 बर्ष बताई जाती है।
यह पेड़ दक्षिण भारत के लंबे इतिहास का गवाह होने के साथ-साथ बसंत के मौसम में खूबसूरत फूल बिखेरता है।
ऐसी जानकारी है कि यह पेड़ 1760 के दशक में लगाया गया था, जब मैसूर के शासक हैदर अली ने इस बाग की नींव रखी थी। हैदर अली ने दुनियाभर से दुर्लभ पौधे मंगवाए थे। माना जाता है कि इस सिल्क कॉटन ट्री को म्यांमार या अफ्रीका से लाया गया था, जहां यह प्रजाति आम थी। बाद में टीपू सुल्तान ने इस बाग को और विकसित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान वैज्ञानिकों ने इसे वनस्पति अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया। उस काल में यह पेड़ प्रयोग और अध्ययन का विषय बना।
क्या हैं पेड़ की खासियतें
यह पेड़ लगभग 250 साल से खड़ा है। न सिर्फ खड़ा है बल्कि मौसम के अनुसार रंगीन फूल और फल भी देता है। इसके तने का घेरा बहुत विशाल है और ऊंचाई इतनी अधिक कि इसे लालबाग के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है।
पेड़ के पास एक जानकारी पट्टिका भी लगी हुई है, जो इसके इतिहास को संक्षेप में बताती है।
पेड़ पर वसंत में बड़े नारंगी-लाल फूल होते हैं, और साल के अंत तक इसके फलों से सफेद रेशे (Kapok) निकलते हैं, जिनका उपयोग तकियों और गद्दों में होता है। यह पेड़ केवल एक वनस्पति ही नहीं बल्कि बंगलुरु के इतिहास का भी गवाह है। इसकी छाया में बैठकर कई चित्रकार, फोटोग्राफर और कवि रचनाएं भी करते रहे हैं।
हम भी कुछ देर पेड़ की घनी छाया में रुके। उसे निहारा। शांति बिखेरता यह पेड़ इतना घना है कि इसके नीचे से आप आसमान नहीं देख सकते हैं। इसकी जड़ों को नाप नहीं सकते क्योंकि पेड़ के चारों ओर लोहे का घेरा बना हुआ है। इसलिए आप छू भी नहीं सकते। सिर्फ इस बुजुर्ग को देखिए और महसूस कीजिए क्योंकि आप इतिहास के नीचे खड़े हैं।


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