एआई युग में एक तरफ तकनीक पूरी ताकत के साथ अपना विकास कर रही हैं तो दूसरी ओर उससे दोगुनी शक्ति के साथ छल-कपट, काम, क्रोध, मद, लोभ भी अपना कोरस गा रहे हैं। तरक्की की ऊंचाइयों के बीच नैतिक पिछड़ेपन की गहरी और चौड़ी होती खाई डर पैदा करती है। लोग जितना ज्यादा विकास कर रहे हैं यह खाई उतनी ही गहरी होती जा रही है। खाई के गहरी होने से अधिक डर तब लगता है जब इस खाई में गिरने से डरने वाले लोगों की ही तादाद कम होती जा रही है। लोग धड़ाधड़ इस खाई में गिरते जा रहे हैं और जो लोग नहीं गिरे हैं, वे दुखी हो रहे हैं कि अब तक खाई में क्यों नहीं गिरे। लोग इस नैतिक पिछड़ेपन को समझ ही नहीं पा रहे हैं। जब समझ नहीं पा रहे हैं तो डरेंगे कैसे? कभी-कभी यह भी लगता है कि लोग इसके खतरे को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समझना नहीं चाहते हैं।
यही एआई युग का युगधर्म है। इसी युगधर्म के हिसाब से पत्रकारिता का मिजाज तय होता है।
मुखौटा आज की सच्चाई है
आज हर चेहरे पर मुखौटा है। प्रकट रूप में एक चेहरा, गुप्त रूप से दूसरा चेहरा। पहले भी ऐसे लोग समाज में होते थे लेकिन तब इनकी संख्या कम थी। अब यह संख्या बढ़ रही है लगातार। तभी तो एक सरकारी दफ्तर का मामूली कर्मचारी करोड़ों रुपए का मालिक निकलता है। मुहल्ले का एक छोटा-सा नेता अचानक चमचमाती महंगी गाड़ियों में घूमने लगता है। ऐसे छुपे रुस्तम से समाज भरा पड़ा है। छुपे रुस्तमों के जमाने में आप विशुद्ध पत्रकारिता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। समाज ने मुखौटा चढ़ाया तो पत्रकारिता ने भी नक़ाब पहन लिया है। यह मजबूरी है।
बुराई से डर नहीं लगता
असली दिक्कत यह नहीं है। असली दिक्कत यह है कि मुखौटे के पीछे छिपे चेहरों को बेनकाब करने वाले लोग कम हो रहे हैं। कुछ दशक पहले समाज में यदि कोई बेईमान, भ्रष्टाचारी, दुराचारी आदमी होता था तो लोग उसकी बुराई करते थे, आलोचना करते थे और कभी-कभी उसकी भर्त्सना भी की जाती थी और वह भी सार्वजनिक रूप से।
लेकिन आज जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी है, समाज में उसे उतना बड़ा ओहदा मिलता है। विजय माल्या जब टीवी पर आकर कहते हैं कि मैंने जितने की चोरी की थी उससे कहीं ज्यादा धन बैंक वाले हमसे वसूली कर चुके। इसलिए मैं चोर नहीं हूं। उनकी बात पर देश सोचने लगता है कि ठीक ही तो कह रहा है बिचारा। बैंक वाले बड़े बेरहम हैं। कोई यह नहीं सोचता कि चोरी का माल लौटा देने पर चोरी के अपराध को माफ करने का कानून किसी किताब में नहीं लिखा है। देश में इस तरह से हो रहे वैचारिक पतन से पत्रकारिता कैसे अछूती रह सकती है।
किसे सम्मानित करता है समाज
आज हम हत्या, बलात्कार के आरोपियों को सार्वजनिक मंचों पर सम्मानित करते हैं। समाज में उसको बड़ा महत्व मिलता है। जो जितना बड़ा आरोपी है, वह उतना बड़ा समाजसेवी बनता है।
क्या लगता है कि पत्रकारिता पर इन घटनाओं का असर नहीं पड़ता है। मजबूरी में पत्रकारिता को इन घटनाओं को ग्लैमरस अंदाज में पेश करना पड़ता है। शायद ही कोई अखबार होगा जो ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट छापने से बच पाया हो। न छापें तो अखबारों के बहिष्कार का एलान होता है।
तो एआई की तरक्कियों के बीच वैचारिक पतन को कौन संभालेगा? नैतिक पिछड़ेपन से कौन उबारेगा? ठीक है, इसमें एआई का दोष नहीं है। एआई तो तकनीकी विकास का एक हिस्सा है लेकिन समाज को गर्त में ले जानेवाले लोगों के लिए भी एआई एक बड़ी सुविधा और औजार तो है ही। पत्रकारिता को भी इन्हीं के बीच सांस लेनी है, जिंदा रहना है, उड़ान भरनी है।
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