Tuesday, 27 May 2025

अखबारों में कैसे होती है एडिटर और न्यूज एडिटर की नियुक्ति

अखबारों की दुनिया में न्यूज एडिटर और एडिटर का पद बड़ा सम्मानित और जिम्मेवारी भरा होता है। इन दो पदों पर पहुंच कर पत्रकार खुद को देश का एक जिम्मेदार नागरिक भी समझता है और पत्रकारिता का सफल व्यक्ति भी। पहले के जमाने में इन दो पदों पर आसीन लोग विरले ही मिलते थे क्योंकि तब एडिटर यानी संपादक सचमुच विद्वान और दूरदर्शी हुआ करते थे। न्यूज एडिटर भी कम नहीं हुआ करते थे। माना जाता था कि इन दो पदों पर बैठे लोग न सिर्फ पत्रकारिता के मास्टर हैं बल्कि हर क्षेत्र में उस्ताद हैं। इसलिए एक अखबार में प्रायः एक ही संपादक होते थे जो पूरे अखबार पर अपनी नज़र जमाए रखते थे। उनकी देखरेख में हर काम होता था और ऐसे बहुत कम मौके आते थे कि किसी पेज पर कोई ग़लत शीर्षक छप जाए या अखबार में कोई झूठी खबर छप जाए। 


पहले क्या होता था 

चूंकि एक अखबार में एक ही संपादक हुआ करते थे तो उनकी नियुक्ति भी उतनी ही कड़ी परीक्षा और लंबी प्रक्रिया के बाद होती थी। एडिटर बनने के लिए सबसे पहले निर्विवाद होना पहली योग्यता थी। निर्विवाद का मतलब बिलकुल बेदाग। कभी किसी को आंख दिखाने का आरोप भी नहीं लगा होना चाहिए। उनकी विद्वता को चुनौती देने वाला आसपास के शहरों में कोई नहीं होना चाहिए। उनकी सज्जनता की चर्चा लोगों की जुबान पर होनी चाहिए। यदि किसी से आप उनके बारे में पूछें तो वह झट से बोले-अहा, बहुत सीधे आदमी हैं। साथ में यह भी बोले, लेकिन काम के मामले में जल्लाद हैं। यहां जल्लाद शब्द प्रशंसा की पराकाष्ठा है न कि आलोचना की बेइंतहा। 

संपादक उम्मीदवार के इन सारे गुणों का सत्यापन भी किया जाता था। इसके लिए भी बजाप्ता जासूस छोड़े जाते थे जो उम्मीदवार के गुणों का परीक्षण करते थे। लेकिन कैसे करते थे? यह बात गोपनीय ही रहती थी, किसी को नहीं पता। यह सब कौन कराता था। इस सारी प्रक्रिया के पीछे अखबार के मालिकों की भूमिका होती थी। मालिकों के साथ उनके कुछ विश्वसनीय नौकर भी हुआ करते थे। मजेदार बात यह है कि संपादक उम्मीदवार को खुद नहीं पता होता था कि उसका परीक्षण चल रहा है और कुछ दिनों बाद उसकी किस्मत खुलने वाली है। 

उस समय पहनावा कोई मायने नहीं रखता था। कई संपादक धोती पहनने वाले होते थे। अखबारों के मालिकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन जिंदगी भर धोती पहनने वाला संपादक यदि इंटरव्यू में कोर्ट-टाई पहनकर आ जाएं तो फर्क पड़ जाता था। अखबार के मालिक उन्हें इस आधार पर रिजेक्ट भी कर सकते हैं। समझा जाता था कि यह आदमी अपने उसूलों का पक्का नहीं है। 


अब क्या होता है 

आज कोई सीधा-साधा पत्रकार है तो संपादक तो छोड़िए उसे उप संपादक का पद भी मुश्किल से मिलता है। आज तेज-तर्रार होना उत्तम गुण है। इसके बिना तो काम ही चलता है। आज सबसे पहले मैनेज करने का गुण देखा जाता है। परखा जाता है कि यह व्यक्ति अपनी टीम को कितना मैनेज कर सकता है। अखबार के अंदर के कामों के साथ-साथ अखबार के बाहर कितना मैनेज कर सकता है। सरकार को कितना मैनेज कर सकता है। इसी पर नियुक्ति निर्भर करती है। खबरों की समझ, विद्वत्ता आदि की जांच परख तो होता ही नहीं है। समझा जाता है कि ये सारे गुण तो होंगे ही। हालांकि कुछ अखबारों में विद्वत्ता आदि की परख के साथ यह भी देखा जाता है कि बंदा क्राइसिस मैनेजमेंट में कितना माहिर है। अखबार के अंदर और बाहर दोनों की क्राइसिस को किस तरह हैंडल करता है। 

प्रबंधन संपादक उम्मीदवार के अंदर यह भी देखता है कि बंदा के अंदर लीडर बनने की क्षमता कितनी है। संपादकीय टीम को लीड कर सकता है या नहीं।

पहनावे को लेकर भी आज की स्थिति बिल्कुल अलग है। जिंदगी भर जिंस और टी शर्ट पहनने वाला भी जब सूट और टाई लगाकर संपादक पद के इंटरव्यू में पहुंचता है तब कितना भी नकली लगता हो, प्रबंधन को अच्छा लगता होगा। हिंदी अखबारों में संपादक के इंटरव्यू में सूट टाई पहनकर आने की परंपरा कैसे शुरू हुई, कोई नहीं जानता।

न्यूज एडिटर की नियुक्ति 

न्यूज एडिटर एक ऐसा पद है जो न एडिटर जैसा सर्वशक्तिमान होता है और न ही सब एडिटर जैसा सामान्य पद। यह पद बिना पावर के पावरफुल होता है। इसमें उतना ही पावर आता है जितना संपादक इसमें डालता है। यदि संपादक ने समाचार संपादक को जीरो पावर दिया है तो फिर वह जीरो हो जाता है। यदि संपादक ने समाचार संपादक को पावरफुल बनाया है तो वह हीरो बन जाता है। इसलिए इस पर विस्तार से चर्चा जरूरी है जो हम अगली बार करेंगे। 

तब तलक संपादक के पद का मजा उठाइए। 

धन्यवाद 

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