Saturday, 31 May 2025

पत्रकारिता में मैनेज शब्द की महिमा

मैनेज अंग्रेजी का एक छोटा सा शब्द है लेकिन इसकी महिमा अपरम्पार है और इसके कारनामे भी बड़े-बड़े हैं। इस एक शब्द में इतनी ताकत है कि यह अकेले ही पत्रकारिता की दिशा और दशा दोनों को बदल सकता है, बदल रहा है। आज की पत्रकारिता में इस शब्द का इस्तेमाल बड़े प्यार, एहतियात के साथ बारंबार किया जाता है लेकिन कब इसके इस्तेमाल की जरूरत आ जाए, यह कोई नहीं जानता। 

इसी शब्द से बना है मैनेजमेंट जिसे पढ़ाने के लिए आईआईएम जैसे महान संस्थानों के साथ-साथ ढ़ेर सारी छोटी-बड़ी दुकानें भी खुली हैं। मैनेजमेंट का कोर्स करने में लाखों रुपए खर्च होते हैं लेकिन इसे करने के बाद लाखों-करोड़ों रुपए की नौकरी भी मिल सकती है। यह छोटा-सा शब्द मैनेज जब एक वाक्य में बोला जाता है 'मैनेज कर लो' तब बहुत कुछ बदल जाता है। बड़े-बड़े कांड फुस्स हो जाते हैं, छोटे-छोटे काम विस्फोटक बन जाते हैं। पत्रकार मैनेज हो जाता है, अखबार मैनेज हो जाता है। अफसर मैनेज हो जाते हैं, सरकार मैनेज हो जाती है। भारी भीड़ मैनेज हो जाती है, विरोध मैनेज हो जाता है। न जाने क्या-क्या मैनेज हो जाता है। इस शब्द की खूबी यह है कि इसे विस्तार से बताने की जरूरत नहीं पड़ती है। सिर्फ मैनेज शब्द का उच्चारण ही काफी है। इसे बोलने और सुनने वाले को पता होता है कि क्या मैनेज करना है, कहां मैनेज करना है, कैसे मैनेज करना है। मैनेज शब्द का इस्तेमाल भी दो तरह से होता है -

*️⃣ पॉजिटिव इस्तेमाल *️⃣ निगेटिव इस्तेमाल 

पॉजिटिव इस्तेमाल 

अच्छे कामों के लिए भी मैनेज शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। सीनियर अपने जूनियर को मैनेज करने का निर्देश देता है, दोस्त अपने दोस्त को कह सकता है, पिता अपने बच्चों को कह सकता है। इसमें काम को पूरा करने का भाव छिपा होता है। यह इस शब्द का पॉजिटिव इस्तेमाल है। 


निगेटिव इस्तेमाल 

मैनेज शब्द का निगेटिव इस्तेमाल ज्यादा व्यापक है क्योंकि इसका असर दूरगामी है। यह जितना छोटा सा शब्द है, इसका अर्थ उससे कहीं ज्यादा बड़ा है। जब इस शब्द को काम पर लगाया जाता है तो उसका परिणाम भी तय कर दिया जाता है। यानी मैनेज करने वाले को पता होता है कि इस काम का क्या अंजाम होना है। इसे यों भी समझ सकते हैं कि काम का अंजाम अपने पक्ष में करने के लिए इस शब्द को काम पर लगाया जाता है। 

आपको यूपीए-2 सरकार के दौरान नीरा राडिया टेप मामला तो याद होगा। जब यह कांड उजागर हुआ था तब कई बड़े-बड़े पत्रकारों के नाम भी इसमें आए थे। सीबीआई जांच भी हुई थी, कोर्ट में मामला भी चला था। हालांकि बाद में सीबीआई ने इस मामले में क्लीन चिट दे दी थी। लेकिन इस कांड ने पत्रकारिता में मैनेज शब्द की महिमा को उजागर कर दिया था। 

वैसे सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में इस शब्द का इस्तेमाल होता है। इसलिए मैनेज शब्द महान था, है और रहेगा। इसकी महानता पर शोध हो सकता है। सरकार को चाहिए कि इस शब्द को पीएचडी वाले विषयों वाली सूची में शामिल कर ले। इसका फायदा यह होगा कि इस शब्द के और भी नायाब इस्तेमाल निकल सकते हैं। 


Thursday, 29 May 2025

दफ्तर में माहौल टॉक्सिक हो तो मास्क लगाएं

अक्सर चर्चा चलती है दफ्तर का माहौल जहरीला था, इसलिए जॉब छोड़ दी। दफ्तर का माहौल बर्दाश्त करने लायक नहीं था, इसलिए नौकरी को लात मारकर निकल गया। इन स्थितियों में टॉक्सिक माहौल को दोषी करार देकर भाग खड़े होते हैं। यह नहीं सोचते कि इस माहौल को यदि बदला नहीं जा सकता है तो कम से कम लड़ा तो जा सकता ही है। लड़ने के लिए ये दो फार्मूले अपनाए जा सकते हैं -

- माहौल के जहर से बचने के लिए मौन का मास्क लगाओ।

-जहर के असर को दूर रखने के लिए कभी-कभी नकली फुंफकार भरो। 

इतने से काम न बने तो कभी-कभी मोबाइल पर तेज आवाज में किसी से भी झगड़ लो और पूरे आफिस को थर्रा दो, गुंजायमान कर दो। 

इस फार्मूले से कम से कम दस दिनों तक जहर पास नहीं फटकेगा। दस दिन बाद फिर इसे रिपीट कर दो।

Tuesday, 27 May 2025

अखबारों में कैसे होती है एडिटर और न्यूज एडिटर की नियुक्ति

अखबारों की दुनिया में न्यूज एडिटर और एडिटर का पद बड़ा सम्मानित और जिम्मेवारी भरा होता है। इन दो पदों पर पहुंच कर पत्रकार खुद को देश का एक जिम्मेदार नागरिक भी समझता है और पत्रकारिता का सफल व्यक्ति भी। पहले के जमाने में इन दो पदों पर आसीन लोग विरले ही मिलते थे क्योंकि तब एडिटर यानी संपादक सचमुच विद्वान और दूरदर्शी हुआ करते थे। न्यूज एडिटर भी कम नहीं हुआ करते थे। माना जाता था कि इन दो पदों पर बैठे लोग न सिर्फ पत्रकारिता के मास्टर हैं बल्कि हर क्षेत्र में उस्ताद हैं। इसलिए एक अखबार में प्रायः एक ही संपादक होते थे जो पूरे अखबार पर अपनी नज़र जमाए रखते थे। उनकी देखरेख में हर काम होता था और ऐसे बहुत कम मौके आते थे कि किसी पेज पर कोई ग़लत शीर्षक छप जाए या अखबार में कोई झूठी खबर छप जाए। 


पहले क्या होता था 

चूंकि एक अखबार में एक ही संपादक हुआ करते थे तो उनकी नियुक्ति भी उतनी ही कड़ी परीक्षा और लंबी प्रक्रिया के बाद होती थी। एडिटर बनने के लिए सबसे पहले निर्विवाद होना पहली योग्यता थी। निर्विवाद का मतलब बिलकुल बेदाग। कभी किसी को आंख दिखाने का आरोप भी नहीं लगा होना चाहिए। उनकी विद्वता को चुनौती देने वाला आसपास के शहरों में कोई नहीं होना चाहिए। उनकी सज्जनता की चर्चा लोगों की जुबान पर होनी चाहिए। यदि किसी से आप उनके बारे में पूछें तो वह झट से बोले-अहा, बहुत सीधे आदमी हैं। साथ में यह भी बोले, लेकिन काम के मामले में जल्लाद हैं। यहां जल्लाद शब्द प्रशंसा की पराकाष्ठा है न कि आलोचना की बेइंतहा। 

संपादक उम्मीदवार के इन सारे गुणों का सत्यापन भी किया जाता था। इसके लिए भी बजाप्ता जासूस छोड़े जाते थे जो उम्मीदवार के गुणों का परीक्षण करते थे। लेकिन कैसे करते थे? यह बात गोपनीय ही रहती थी, किसी को नहीं पता। यह सब कौन कराता था। इस सारी प्रक्रिया के पीछे अखबार के मालिकों की भूमिका होती थी। मालिकों के साथ उनके कुछ विश्वसनीय नौकर भी हुआ करते थे। मजेदार बात यह है कि संपादक उम्मीदवार को खुद नहीं पता होता था कि उसका परीक्षण चल रहा है और कुछ दिनों बाद उसकी किस्मत खुलने वाली है। 

उस समय पहनावा कोई मायने नहीं रखता था। कई संपादक धोती पहनने वाले होते थे। अखबारों के मालिकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन जिंदगी भर धोती पहनने वाला संपादक यदि इंटरव्यू में कोर्ट-टाई पहनकर आ जाएं तो फर्क पड़ जाता था। अखबार के मालिक उन्हें इस आधार पर रिजेक्ट भी कर सकते हैं। समझा जाता था कि यह आदमी अपने उसूलों का पक्का नहीं है। 


अब क्या होता है 

आज कोई सीधा-साधा पत्रकार है तो संपादक तो छोड़िए उसे उप संपादक का पद भी मुश्किल से मिलता है। आज तेज-तर्रार होना उत्तम गुण है। इसके बिना तो काम ही चलता है। आज सबसे पहले मैनेज करने का गुण देखा जाता है। परखा जाता है कि यह व्यक्ति अपनी टीम को कितना मैनेज कर सकता है। अखबार के अंदर के कामों के साथ-साथ अखबार के बाहर कितना मैनेज कर सकता है। सरकार को कितना मैनेज कर सकता है। इसी पर नियुक्ति निर्भर करती है। खबरों की समझ, विद्वत्ता आदि की जांच परख तो होता ही नहीं है। समझा जाता है कि ये सारे गुण तो होंगे ही। हालांकि कुछ अखबारों में विद्वत्ता आदि की परख के साथ यह भी देखा जाता है कि बंदा क्राइसिस मैनेजमेंट में कितना माहिर है। अखबार के अंदर और बाहर दोनों की क्राइसिस को किस तरह हैंडल करता है। 

प्रबंधन संपादक उम्मीदवार के अंदर यह भी देखता है कि बंदा के अंदर लीडर बनने की क्षमता कितनी है। संपादकीय टीम को लीड कर सकता है या नहीं।

पहनावे को लेकर भी आज की स्थिति बिल्कुल अलग है। जिंदगी भर जिंस और टी शर्ट पहनने वाला भी जब सूट और टाई लगाकर संपादक पद के इंटरव्यू में पहुंचता है तब कितना भी नकली लगता हो, प्रबंधन को अच्छा लगता होगा। हिंदी अखबारों में संपादक के इंटरव्यू में सूट टाई पहनकर आने की परंपरा कैसे शुरू हुई, कोई नहीं जानता।

न्यूज एडिटर की नियुक्ति 

न्यूज एडिटर एक ऐसा पद है जो न एडिटर जैसा सर्वशक्तिमान होता है और न ही सब एडिटर जैसा सामान्य पद। यह पद बिना पावर के पावरफुल होता है। इसमें उतना ही पावर आता है जितना संपादक इसमें डालता है। यदि संपादक ने समाचार संपादक को जीरो पावर दिया है तो फिर वह जीरो हो जाता है। यदि संपादक ने समाचार संपादक को पावरफुल बनाया है तो वह हीरो बन जाता है। इसलिए इस पर विस्तार से चर्चा जरूरी है जो हम अगली बार करेंगे। 

तब तलक संपादक के पद का मजा उठाइए। 

धन्यवाद 

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Monday, 26 May 2025

डबल डेकर तो छोड़िए, अब तो मल्टी डेकर हो गई हैं खबरों की हेडिंग

टूट चुका है हेडलाइन का अनुशासन 

हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तब हैंड कंपोजिंग का जमाना था। खबरें हाथ से कंपोज किए जाते थे। लोहे के अक्षरों को जोड़ कर वाक्य बनते थे और फिर खबर और फिर पेज़। उस समय तय होता था कि सिंगल कॉलम की खबर की हेडिंग, 18,  20 या 24 प्वाइंट में जाएगी, डबल कॉलम की खबर की हेडिंग 30 से 48  प्वाइंट में जाएगी। पेज वन की लीड खबर 70-80 प्वाइंट में जाएगी। रूटीन खबरों की लीड है तो 70-72 प्वाइंट में जाएगी और यदि लीड में कोई बड़ी घटना या दुर्घटना हो तो 80 प्वाइंट की हेडिंग लगेगी। अंदर के पेजों की लीड खबर के लिए 65 प्वाइंट तय था।

यह भी तय था 

इसी तरह यह भी तय होता था कि डबल कॉलम खबर की हेडिंग दो लाइन में जाएगी। तीन और तीन कॉलम से ज्यादा की खबर की हेडिंग एक लाइन में जाएगी। सिर्फ हर पेज की लीड खबर अपवाद थी। लीड तीन कॉलम में हो या चार कॉलम में, हेडिंग दो लाइन में जा सकती है लेकिन पांच और उससे अधिक कॉलम की लीड की हेडिंग एक लाइन में लेना मस्ट था। इन नियमों को किसी भी हाल में तोड़ा नहीं जा सकता था। इन्हें तोड़ने वाले चीफ सब एडिटर को कमजोर माना जाता था। इतनी छूट अवश्य मिली हुई थी कि एक लाइन की हेडिंग के साथ नीचे एक लाइन में सब हेड दे सकते थे या ऊपर एक लाइन में फ्लैग दे सकते थे। लेकिन किसी खबर में फ्लैग और सब हेड दोनों को अच्छा नहीं माना जाता था। 

फायदा 

इसका सबसे बड़ा फायदा तो यह था कि पेज संतुलित रहता था। देखने में अच्छा लगता था और खबरों को उनकी हैसियत के हिसाब से डिस्प्ले मिलता था। सबसे बड़ी बात शीर्षकों का अनुशासन बना रहता था। हर पेज पर एक जैसा संतुलन बना रहता था। लेकिन इस तरह के शीर्षकों की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि इसमें समय और मेहनत बहुत लगती थी। हेडिंग में पूरी कहानी नहीं, खबर का निचोड़ होता था। 

तब अंगुलियों पर गिने जाते थे अक्षर 

पुराने समय में चीफ़ सब एडिटर या अन्य पेजों के प्रभारी अंगुलियों पर गिन कर हेडिंग बनाते थे। उसका कारण यही था कि एक कॉलम में शब्दों की संख्या प्वाइंट साइज के हिसाब से तय होती थी और हेडिंग को उसी हिसाब से बनाना पड़ता था। 

समय बदला तो बदल गई हेडलाइन 

लेकिन जब समय बदला तब अंगुलियों पर शब्द गिनने की कला ही लुप्त हो गई। आज के हिंदी अखबारों को देख लीजिए। तीन कालम तो छोड़िए अब तो आठ कालम की खबर की हेडिंग भी दो लाइन में लगती है। इसके ऊपर फ्लैग और फिर नीचे सब हेड लगा दिया जाता है। इसके बाद भी डेस्क का मन नहीं भरता है तो चार क्रासर भी लगा दिए जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि खबर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। 

कभी-कभी हास्यास्पद स्थिति तब हो जाती है जब फ्लैग, हेडिंग, सब हेड आदि की ऊंचाई खबर की ऊंचाई से ज्यादा हो जाती है। देखने में तो भद्दा लगता ही है, पाठकों को खबर पढ़ने में भी दिक्कत हो जाती है। 

मल्टी डेकर हेडिंग 

इसलिए डबल डेकर तो छोड़िए अब हेडिंग मल्टी डेकर होती हैं और कोई एतराज़ नहीं करता है क्योंकि पत्रकारिता में इस बात को जानने वाले बहुत कम लोग बचे हैं जिन्हें यह पता हो कि हेडलाइन का अनुशासन भी होता है, खबरों के वजन के हिसाब से हेडलाइन लगाई जाती हैं। नतीजा यह हुआ कि अखबार के पन्नों पर खबरों से ज्यादा हेडलाइन नजर आती हैं। इसके लिए किसी एक अखबार को दोष नहीं दे सकते हैं। आज लगभग सभी अखबारों में ऐसा ही होता है। यह मल्टीमीडिया का जमाना है तो हेडलाइन का मल्टी डेकर बन जाना अचरज पैदा नहीं करता है। बस अफसोस इस बात का होता है कि खबरों पर हेडलाइन भारी पड़ रही हैं। खबरें सिकुड़ रही हैं, हेडिंग फैल रही हैं। 

Sunday, 25 May 2025

पत्रकारिता में तीन चीजों से परहेज़ जरूरी

 गधों की रेस में घोड़ा मत बनिए 

पत्रकारिता में तीन चीजों से परहेज़ करने की जरूरत है। इसका एक बड़ा फायदा होगा। आपको कभी अफसोस नहीं होगा कि गंगा सामने बह रही थी और आप डुबकी नहीं लगा पाए।


पहली चीज 

रेस से कभी बाहर नहीं रहिए। जब घोड़ों की दौड़ हो रही हो तो घोड़ा बनकर दौड़िए। जब गधों की दौड़ हो रही हो तो गधा बनकर दौड़िए। यदि आप गधों की दौड़ में घोड़े की तरह दौड़ेंगे तो odd man out करार दिए जाएंगे। 


दूसरी चीज 

हमेशा बॉस की बुद्धिमत्ता और कुशलता के अनुसार अपने को ट्यून करके रखिए। यदि आपकी फ्रिक्वेंसी बॉस से अधिक तेज है तो उसे स्लो कीजिए क्योंकि बॉस इज ऑलवेज राइट के साथ-साथ बॉस almighty भी होता है।


तीसरी बात 

हमेशा खुशनुमा चेहरा मत बनाए रखिए। इससे लोगों को भ्रम होगा कि आप अपनी वर्तमान स्थिति से खुश हैं या इंक्रीमेंट, प्रमोशन के लिए बॉस के साथ आपकी कोई सीक्रेट डील हो गई है। इसलिए ज्यादातर समय मुंह लटकाकर रहिए, दुखी नजर आइए‌ ताकि सबको लगे आप भी उनमें से एक हैं। 


इन तीन सूत्रों को पकड़कर चलिए, भवसागर आसानी से पार हो जाएगा।

Saturday, 24 May 2025

न काहू से दोस्ती न काहू से वैर

प्रख्यात पत्रकार और स्तंभकार खुशवंत सिंह जीवन भर इस नाम से प्रसिद्ध कालम लिखते रहे। अंग्रेजी अखबारों में इसका नाम था-"विथ मालिस टुवर्ड वन एंड ऑल"। यह पत्रकार खुशवंत सिंह द्वारा भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों में प्रकाशित साप्ताहिक कॉलम श्रृंखला थी। इसमें वे नेता, नौकरशाह, बिजनेस मैन हर किसी के बारे में लिखते रहे थे। अपने दोस्तों को भी वे नहीं बख्शते थे। इसका हिंदी अनुवाद छपता था -न काहू से दोस्ती न काहू से वैर। इसका मतलब है कि पत्रकारों का न कोई दोस्त होता है और न कोई दुश्मन। यहां इसकी व्याख्या करने के बजाय एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। यह सच्ची घटना है लेकिन पात्र और जगह के नाम नहीं दिए गए हैं -

एक बार किसी राज्य सरकार के एक नेता जी को पता चला कि शहर के नामी अखबार में उनके खिलाफ कोई खबर छपने वाली है। उन्होंने उस अखबार के संपादक से मिलने का मन बनाया। संयोग से दो-चार दिनों बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हो गई। नेता जी ने संपादक को एक तरफ ले जाकर पूछ लिया कि भाई, कोई नाराज़गी है क्या। फिर उन्होंने अपनी शंका जाहिर की और खबर न छापने की विनती की। संपादक ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी कोई बात उनकी जानकारी में नहीं है। नेता जी आश्वस्त हो गए कि जब संपादक को नहीं पता है तो बात ग़लत होगी। वे चैन की नींद सो गए। दूसरे दिन उसी अखबार में पेज वन पर उनके काले कारनामों पर टाप बॉक्स खबर छपी हुई थी। खबर में पुख्ता सबूत भी थे। वे खबर का खंडन करने लायक स्थिति में भी नहीं थे। इसे कहते हैं न काहू से दोस्ती न काहू से वैर। 

पुरानी पत्रकारिता में ऐसा होता रहा है। होता तो यह भी था कि जब ऐसे लोग संपादक को फोन करते थे तब संपादक का जवाब होता था, मैं भी हैरान हूं, मुझे बिना बताए रिपोर्टर ने खबर कैसे छाप दी। अभी उसकी खबर लेता हूं। आप ऐसा करिए कि खबर का खंडन लिखकर भेज दीजिए। हम आपकी बात भी छाप देंगे। अधिकांश मामलों में खंडन नहीं आता था क्योंकि खंडन करने की गुंजाइश नहीं होती थी। खबर में सब-कुछ परफेक्ट होता था। उस समय ऐसी खबरों को ठोक-बजाकर, उसे हर एंगल से परखने के बाद ही अखबार में छापा जाता था। जब किसी ताकतवर व्यक्ति पर उंगली उठाई जाती थी तो कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती थी। और यदि कभी खंडन आ भी जाता था तो उसमें उस लायक तथ्य नहीं होते थे। यदि कोई तथ्य हुआ तो अखबार उसे जरूर छापते थे लेकिन साथ में रिपोर्टर का जवाब भी छपता था जो फिर से एक नए घोटाले को उजागर कर देता था। 

आज स्थिति उलट है। अधिकांश हिंदी अखबारों में तो ऐसी खबरें छपती ही नहीं हैं जिनका खंडन करने की जरूरत पड़े। और कभी गलती से ऐसी कोई खबर छप जाए और उसका खंडन आ जाए तो खंडन छपता है, रिपोर्टर का पक्ष नहीं।

पत्रकारिता के छात्रों को करियर शुरू करने से पहले मन बना लेना चाहिए कि उन्हें क्या करना है। वैसे भी अब वैसा माहौल कम ही अखबारों में मिलता है जैसे माहौल में पहले काम होता था। पहले का माहौल था बेखौफ और बिंदास। न किसी का डर न किसी का दबाव क्योंकि उस समय के अखबार न काहू से दोस्ती न काहू से वैर वाले सिद्धांत पर चलते थे। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। बहुत कम अखबारों में यह सिद्धांत चलता है।

आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या। लेकिन आज की पत्रकारिता में घोड़े ने घास से दोस्ती करना सीख लिया है या फिर घास से दोस्ती घोड़े की मजबूरी हो गई है। दोनों ही स्थितियों में घाटे में तो पत्रकारिता ही रही।  

सोशल मीडिया उपवास

दिमाग की शुद्धि भी है जरूरी 

धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि उपवास करने से अंत:करण शुद्ध होता है, आत्मा शुद्ध होती है। इसका असर हमारे शरीर और मन पर पड़ता है। इससे पॉजिटिव एनर्जी उत्पन्न होती है।

विज्ञान कहता है कि उपवास करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है। शरीर में मौजूद गुड बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं और फिर वे बैड बैक्टीरिया को खाने लगते हैं। इससे हमारे शरीर का सिस्टम चुस्त-दुरुस्त हो जाता है।

सच क्या है, पता नहीं। लेकिन उपवास में कुछ न कुछ बात तो जरूर है, तभी तो धर्म और विज्ञान दोनों इसकी वकालत करते हैं। 

तो क्यों न एक बार सोशल मीडिया का उपवास रखकर देखा जाए। पूरे दिन का संभव नहीं हो तो पहले चार घंटे के उपवास से शुरू किया जाए। इन चार घंटों को अपने हिसाब से चुनें। शुरू में आप चाहें तो दो-दो घंटे का अलग-अलग समय भी चुन सकते हैं। चूंकि यह आपका खुद का निर्णय है तो इसमें इमानदार रहना भी आपकी ही जिम्मेवारी है। 

इसका फायदा क्या होगा- 

-आप अपनी आत्मशक्ति को तौल सकेंगे कि आप अपने निर्णय पर कितना अडिग रहते हैं।

-आपको कुछ नया करने का समय मिलेगा। चार घंटों में आप कुछ लिख सकते हैं, कुछ सीख सकते हैं।

-परिवार को लंबा समय दे सकेंगे। एकदम ख़ालिस समय। 

-दोस्तों की खोज खबर ले सकते हैं। पास-पड़ोस को टटोल सकते हैं। 

-सोशल मीडिया से दूर रहने का मतलब यह भी है कि आप बहुत हद तक फेक खबरों से भी दूर रहेंगे तो बेवजह के तनाव से भी दूर रहेंगे।

मतलब यह कि आप जो चाहें वो कर सकते हैं। भोजन से दूर रहने से मेटाबॉलिज्म ठीक होता है तो सोशल मीडिया से दूर रहकर दिमाग का तंत्र दुरुस्त क्यों नहीं हो सकता है।  


हिंदी अखबारों में पत्रकारों के लिए कैसे होता है इंटरव्यू

हिंदी अखबारों में ट्रेनी से लेकर स्थानीय संपादक तक के पदों के लिए इंटरव्यू के लिए खुद को तैयार करना भी एक कला है। हिंदी के पत्रकारों को यह जानना चाहिए कि किस पद के लिए किस तरह का इंटरव्यू होता है। हालांकि अलग-अलग अखबार अपने-अपने अंदाज में इंटरव्यू करते हैं लेकिन हर अखबार का प्रबंधन मोटे तौर पर कैंडिडेट्स के अंदर कुछ बेसिक गुणों को परखना चाहता है। यह बात भी समझना चाहिए कि ये गुण पदों के हिसाब से बदल जाते हैं। यानी एक ट्रेनी में अलग गुणों की तलाश की जाती है तो जूनियर सब एडिटर/रिपोर्टर में कुछ अलग। यह स्वाभाविक है क्योंकि पदों के हिसाब से जिम्मेदारियां बदल जाती हैं तो गुण भी अलग-अलग होने चाहिए। 

आज हम इस बात को समझने की कोशिश करते हैं कि अखबारों का प्रबंधन किस पद के कैंडिडेट में किस तरह के गुणों की तलाश करता है। यहां एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि इंटरव्यू तभी होता है जब कैंडिडेट्स लिखित परीक्षा में पास हो चुका होता है। लिखित परीक्षा में ट्रेनी से लेकर ऊपर के पदों के लिए तीन चीजों की जांच की जाती है। ये तीन चीजें हैं -

*️⃣ शुद्ध हिन्दी लिखने की क्षमता 

*️⃣ अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की क्षमता 

*️⃣ सामान्य ज्ञान 

इन तीन टेस्ट में कैंडिडेट्स को कम से कम 60 फीसदी अंक प्राप्त होने के बाद ही उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है। लेकिन एक बात ध्यान में रखना चाहिए कि समाचार संपादक और स्थानीय संपादक के पद के लिए लिखित परीक्षा नहीं ली जाती है। इस पद के कैंडिडेट को सीधे इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है। तो चलिए शुरू करते हैं-

1️⃣ ट्रेनी जर्नलिस्ट 

यह अखबारों में पहला पायदान है। इसलिए इसके इंटरव्यू में कैंडिडेट्स का रुख, रूझान और प्रवृत्ति को समझने का प्रयास किया जाता है। यह भी परखा जाता है कि इसके अंदर सीखने और अनुशासित रहने की क्षमता कितनी है। इसके जीवन में कोई लक्ष्य है या नहीं। इसकी सोच में सकारात्मक तत्व हैं या नहीं। 

2️⃣ जूनियर सब एडिटर/रिपोर्टर 

अखबारों में जिम्मेदारी उठाने वाला यह पहला पद है। इसे काम करना होता है तो इस पद के कैंडिडेट के अंदर काम करने की ललक और उत्साह को सबसे ज्यादा परखा जाता है। यह भी देखा जाता है कि इसके अंदर टीम के साथ चलने की कितनी चाह है। इसके अंदर सकारात्मक सोच है या नहीं।

3️⃣ सब एडिटर/रिपोर्टर 

यह हिंदी अखबारों का मैच्योर पद है। इस पद के लोगों को बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी जा सकती है। इसलिए इस लेबल पर इंटरव्यू थोड़ा टफ़ हो जाता है। इसे अनेक एंगल से ठोक बजाकर देखा जाता है। यह परखा जाता है कि काम का दबाव पड़ने पर इसका व्यवहार कैसा होता है। यह क्राइसिस मैनेजमेंट कैसा कर सकता है। काम के तनाव के साथ कितना पॉजिटिव रह पाता है।

4️⃣ सीनियर सब एडिटर/रिपोर्टर 

आजकल अखबारों में यह पद बड़ी जिम्मेवारियों वाला पद है। इस पद पर आसीन लोगों को पूरी डेस्क संभालने का काम भी सौंपा जाता है। इसलिए इसमें बाकी गुणों के साथ एक विशेष गुण को भी देखा जाता है। यह गुण है नेतृत्व की क्षमता। इंटरव्यू के दौरान यह परखा जाता है कि कैंडिडेट्स में टीम का नेतृत्व करने की क्षमता है या नहीं। यदि है तो कितना प्रतिशत है। इसे मापने का कोई स्केल तो नहीं है लेकिन इंटरव्यू करने वाले के अंदर इसे भांपने के टूल्स होते हैं और वे उन्हीं टूल्स के सहारे इसे माप लेते हैं। यदि किसी व्यक्ति में नेतृत्व की क्षमता कम होती है तो यह देखा जाता है कि भविष्य में इस क्षमता को विकसित करने की संभावना है या नहीं।

5️⃣ चीफ सब एडिटर/रिपोर्टर 

किसी भी अखबार में इस पर दो-चार लोग ही होते हैं क्योंकि यह पद महंगा भी है और बड़ी जिम्मेदारियों को निभाने वाला भी है। इस पद पर नियुक्त व्यक्ति को पूरे संस्करण को निकालने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। इसलिए इसमें हर तरह के गुणों की जरूरत होती है। नेतृत्व क्षमता, समन्वय की स्किल के साथ-साथ उन्नत न्यूज सेंस को भी परखा जाता है। इसे स्वतंत्र रूप से खबरों के बारे में निर्णय लेना पड़ता है, इसलिए मजबूत और स्थिर न्यूज सेंस का होना जरूरी है। 

इसके ऊपर डिप्टी न्यूज एडिटर, न्यूज एडिटर और रेजिडेंट एडिटर होते हैं। इन पदों के लिए इंटरव्यू में अनेक तरह की स्किल और चिंतन को परखा जाता है। अगले पोस्ट में इस पर चर्चा करेंगे। 

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Wednesday, 21 May 2025

पत्रकारिता क्या है

आठ घंटे की ड्यूटी है 

संपादक की झिड़की है 

एचआर की फिरकी है 

बंद पड़ी खिड़की है।


या फिर 

सपनों की दुकान है 

किराए का मकान है 

दिन-रात की थकान है 

फिर भी यह महान है।


सभी पत्रकारों को समर्पित 



Monday, 19 May 2025

गाइडेड मिसाइल की तरह काम करती है फेक न्यूज

 कृत्रिम बनाम असली पत्रकारिता 


जमाना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम मेधा का है। चारों तरफ इसकी चर्चा चल रही है। हालांकि अब बात चर्चा से बहुत आगे निकल चुकी है। अब कृत्रिम मेधा हमारे जीवन का अंग बनती जा रही है। हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब, कहां, किस रूप में किस आर्टिफिशियल अवतार से मदद ले रहे हैं या हमसे बात कर रहा कौन सा इंसान असली इंसान नहीं है। कृत्रिम मेधा अभी तक इस स्थिति में नहीं पहुंची है कि मानव समुदाय को उससे खतरा महसूस होने लगे लेकिन कृत्रिम पत्रकारिता की बात ही अलग है। कृत्रिम पत्रकारिता हमारे जीवन में कितनी तोड़फोड़ मचा रही है, इसका आकलन अभी तक किसी एजेंसी ने संभवतः नहीं किया है। इसलिए इसका सही-सही अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है फिर भी कुछ कोशिश तो की ही जा सकती है कि इसने इंसानों का क्या छीना है, समाज और देश का क्या छीना है। यह भी खोज का विषय है कि यदि इसे रोका नहीं गया तो यह हमारे जीवन से कुछ चीजों का नामोनिशान मिटा देगी। सबसे पहले तो यह समझते हैं कि कृत्रिम पत्रकारिता है क्या और इसने हमारा क्या छीना है-

*️⃣ फेक न्यूज 

कृत्रिम पत्रकारिता की पहली श्रेणी है फेक न्यूज। इसका मतलब है कि जो न्यूज है ही नहीं फिर भी आपके सामने न्यूज की तरह पेश किया जाए। पेश करने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। कोई बोल कर तो कोई लिख कर पेश करता है। इसमें सच्चाई और यथार्थ नहीं होता है लेकिन यह जबरदस्त तरीके से आपके अंदर भरोसा जगाता है क्योंकि इसमें मिर्च-मसाला बहुत होता है। 

ऐसी खबरें आपके अंदर के विवेक को कुंद करती हैं।

*️⃣ प्रबंधित पत्रकारिता यानी मैनेज्ड न्यूज 

इस श्रेणी की खबरों को कोई अदृश्य शक्ति कहीं दूर बैठ कर मैनेज करती है। यह तय करती है कि खबर के अंदर किन तथ्यों को डालना है या नहीं डालना है। सच्चाई का कितना प्रतिशत इसमें डाला जाएगा। इस अदृश्य शक्ति के हजारों हाथ होते हैं। किसी भी रूप यह शक्ति आप पर दबाव डाल सकती है। वैसे खबरों के प्रकाशन का प्रबंधन पीआर एजेंसियां करती हैं जो खबरों का प्रकाशन सुनिश्चित करती हैं। 

ऐसी खबरें सच जानने के आपके अधिकार को सीमित करती हैं।

*️⃣ नियंत्रित पत्रकारिता यानी कंट्रोल्ड न्यूज 

कहने को तो पत्रकारिता स्वतंत्र है, वाणी की आजादी है। लेकिन यह आजादी निरंकुश नहीं है। इस पर स्व अनुशासन का नियंत्रण है। यह तो पॉजिटिव है। लेकिन इस पर एक और नियंत्रण होता है जो इसकी दशा और दिशा तय करता है। यह नियंत्रण इमानदार नहीं है क्योंकि इसकी मंशा पत्रकारिता को अपने स्वार्थ के हिसाब से अपने लाभ के लिए चलाने की होती है। यह नियंत्रण अंदर से भी हो सकता है और बाहर से भी।

ऐसी खबरें आपको गुमराह कर सकती हैं।

*️⃣ निर्देशित पत्रकारिता यानी डायरेक्टेड न्यूज 

यह एक खास तरह की पत्रकारिता है जो आज के युग का यथार्थ है। चाहकर भी हम इससे अपना दामन नहीं बचा सकते हैं क्योंकि यह निर्देश बहुत ऊंचे स्तर से आता है। यह जहां से आता है वहां हमारी सांसों की डोर बंधी होती है या फिर वहां से पूरे देश को निर्देश जाता है। एक उदाहरण देता हूं -आप अपने पसंद के टीवी चैनल पर आराम से पसंदीदा कार्यक्रम देख रहे हैं और अचानक टीवी स्क्रीन पर देश के नेता की तस्वीर उभरती है और शुरू हो जाता है भाइयो और बहनो। 

निर्देशित पत्रकारिता आपके च्वाइस के अधिकार को सीमित करती है।

*️⃣ गाइडेड पत्रकारिता यानी गाइडेड न्यूज 

आपने गाइडेड मिसाइल के बारे में सुना होगा। अभी हाल में इन मिसाइलों ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना जलवा दिखाया भी है। खबरें भी इन्हीं गाइडेड मिसाइल की तरह होती हैं। इनमें भी टारगेट फिक्स कर इसे फ्लोट कर दिया जाता है। यह आमतौर पर चैनलों और सोशल मीडिया पर होता है। किसी खास व्यक्ति, संस्थान या विचार को बदनाम करने में गाइडेड पत्रकारिता का खूब इस्तेमाल होता है। 

ऐसी पत्रकारिता आपको बरगलाने का काम करती है।


*️⃣ आंशिक पत्रकारिता यानी पार्शियल रिपोर्टिंग 

आंशिक पत्रकारिता का मतलब अधूरी जानकारी वाली खबरों से है। आप कभी-कभी अखबारों में पढ़ते होंगे कि आपके शहर में आयकर विभाग ने छापा मारकर करोड़ों की अवैध संपत्ति जब्त कर ली लेकिन जब आप खबर में उस व्यक्ति का नाम खोजते होंगे तो लिखा मिलता होगा कि एक बड़े बिजनेसमैन के घर यह छापा पड़ा था। अब आप बेचैन होकर शहर के दूसरे अखबार में उस खबर को खोजते होंगे लेकिन वहां भी नाम नहीं मिला होगा। यह है अधूरी पत्रकारिता या आंशिक पत्रकारिता। उस बिजनेसमैन ने अखबारों को या स्थानीय रिपोर्टर को मैनेज कर लिया और खबर से अपना नाम गायब करवा दिया। 

ऐसी पत्रकारिता सूचना पाने के आपके अधिकार पर डाका डालती है।

तो अब आपके सामने यह स्पष्ट हो गया है कि कृत्रिम पत्रकारिता किस कदर हमारी चीजों को हमसे छीन रही है और हम इसे समझते हुए भी इसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि जमाना अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है, रियल इंटेलिजेंस का नहीं। 

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#journalism #artificialjournalism #fecknews 


Sunday, 18 May 2025

पहलगाम हमला और ऑपरेशन सिंदूर का पत्रकारिता पर असर

पत्रकारिता समाज की सोच, भावनाओं, गतिविधियों और क्रियाकलापों के अनुसार चलती है। पत्रकारिता में वही कुछ रिकॉर्ड होता है जो समाज में चल रहा होता है। पत्रकारिता के छात्रों को इसे समझने और नोट करने की जरूरत है कि पत्रकारिता में काम करने वाले अपने मन से एक शब्द भी नहीं लिख सकते हैं। इस क्षेत्र में मन की बात नहीं चलती है। इस क्षेत्र में तथ्यों का राज है और तथ्यों की बात ही चलती है। कैसे, इसे इस प्रकार समझें -
याद करें कि 22 अप्रैल के पहले देश के अखबारों में क्या छप रहा था। आपको याद होगा कि तब मोदी सरकार के लिए गए फैसलों के इर्द-गिर्द देश की पत्रकारिता चल रही थी। मोदी सरकार ने वक्फ बोर्ड पर नया कानून लागू किया तो अखबारों में वक्फ से जुड़ी खबरों की बाढ़ आ गई। वक्फ संपत्तियों का हिसाब-किताब होने लगा। पक्ष-विपक्ष की राजनीति होने लगी श। पूरी पत्रकारिता वक्फ के रंग में रंग गई। अभी इस पर चर्चा चल ही रही थी कि मोदी सरकार ने जातियों की गणना का फैसला ले लिया। देश अब जाति गणना की राजनीति में डूब गई। पत्रकारिता में भी जाति गणना प्रमुखता से छा गई। इसके बाद अचानक 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला कर दिया और 25 पर्यटन समेत 26 लोगों की हत्या कर दी। देश और समाज की सोच में अचानक गुस्सा और ग़म का उफान उठ गया। पूरे देश में देशभक्ति का तूफान उठ गया। पत्रकारिता से फौरन सारे मुद्दे गायब हो गए और सिर्फ देशभक्ति का जज्बा हिलोरें लेने लगा। चारों तरफ पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फैल गया, बदला लेने की मांग उठने लगी। पत्रकारिता भी बदल गई और अखबारों भी हर तरफ से लोगों की भावनाओं को समेटकर आवाज बुलंद करने का काम करने लगे। 
पत्रकारिता के छात्रों को इस बदलाव को नोट करना चाहिए और हमेशा याद रखना चाहिए कि समाज ही पत्रकारिता को संचालित करता है और पत्रकारिता के एजेंडे को तय करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। लेकिन जब कोई शक्ति इस सामान्य प्रक्रिया में दखल डालता है तब इसे पीत पत्रकारिता कहा जाता है। पत्रकारिता में बाहरी शक्तियों की घुसपैठ से पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का जन्म होता है। पत्रकारिता के छात्रों को इस बात पर भी नज़र रखनी चाहिए कि कब किन शक्तियों ने ऐसी कोशिश की और उसका परिणाम क्या हुआ। आमतौर पर ऐसी बाहरी शक्तियों को पत्रकारिता खुद नकार देती है लेकिन आज स्थितियां अलग है। अनेक प्रकार के प्रलोभन और दबाव है जो पत्रकारिता को लपेटे में लेने की कोशिश करती रहती हैं। इसके परिणामस्वरूप पत्रकारिता पर इस समय समाज का स्वाभाविक प्रवाह रुक गया है। अब फिर आते हैं मूल मुद्दे पर।
इसके बाद देश और समाज की सोच में फिर एकदम से देशभक्ति का जज्बा आ गया। पाकिस्तान से आर-पार करने की बात उठने लगी। पत्रकारिता में भी यही स्वर सुनाई पड़ने लगा। फिर जो हुआ, हम सबने देखा। इन स्थितियों का वर्णन करने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि मैं समाज और पत्रकारिता के रिश्ते को स्थापित कर सकूं। यह स्वाभाविक रिश्ता है। समाज जो भी करता है, पत्रकारिता उसी के हिसाब से चलती है। लेकिन जब समाज का कोई हिस्सा पत्रकारिता को अपने हिसाब से चलने को बाध्य करता है तब यहां कृत्रिम पत्रकारिता का जन्म होता है। आज कृत्रिम पत्रकारिता का दौर भी चल रहा है। पत्रकारिता के छात्रों को इस संदर्भ में सावधान रहना होगा। उन्हें स्वाभाविक और कृत्रिम पत्रकारिता में फर्क समझना चाहिए और फिर अपनी भूमिका तय करनी चाहिए। 
#journalism #students #artificial journalism 

Sunday, 11 May 2025

पत्रकारिता का जंतर-मंतर

हमने और आपने सबने सुना है कि सांप और बिच्छू के काटे के जंतर-मंतर होते हैं या फिर वशीकरण मंत्र होता है तो फिर पत्रकारिता में जंतर-मंतर क्या होते हैं। इस ब्लॉग में हम पत्रकारिता के जंतर-मंतर पर चर्चा करेंगे। इन्हें समझने की कोशिश करने के साथ-साथ इन्हें खोज निकालने का प्रयत्न करेंगे। इसका मतलब यह है कि हम इस ब्लॉग में पत्रकारिता के हर पहलू पर विचार करते हुए इसे पत्रकारिता के छात्रों के लिए उपयोगी बनाएंगे। 

असल में यह ब्लॉग पत्रकारिता के छात्रों की मदद के लिए शुरू किया जा रहा है। यह एक प्रकार का अड्डा होगा जहां हम खबरों के लेखन से लेकर संपादन के तौर-तरीकों पर बात करेंगे। आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि जब आप पत्रकारिता का कोर्स कर रहे हैं या कर चुके हैं तो फिर इसकी क्या जरूरत है। इसके जवाब में अभी सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यहां पत्रकारिता के सिद्धांतों पर नहीं बल्कि इसके व्यावहारिक पहलुओं पर बात करेंगे। 

तो आप साथ आइए और इसमें शामिल होकर खुद को भी बेहतर बनाइए और हमें भी बेहतर बनने का मौका दीजिए।

धन्यवाद