याद करें कि 22 अप्रैल के पहले देश के अखबारों में क्या छप रहा था। आपको याद होगा कि तब मोदी सरकार के लिए गए फैसलों के इर्द-गिर्द देश की पत्रकारिता चल रही थी। मोदी सरकार ने वक्फ बोर्ड पर नया कानून लागू किया तो अखबारों में वक्फ से जुड़ी खबरों की बाढ़ आ गई। वक्फ संपत्तियों का हिसाब-किताब होने लगा। पक्ष-विपक्ष की राजनीति होने लगी श। पूरी पत्रकारिता वक्फ के रंग में रंग गई। अभी इस पर चर्चा चल ही रही थी कि मोदी सरकार ने जातियों की गणना का फैसला ले लिया। देश अब जाति गणना की राजनीति में डूब गई। पत्रकारिता में भी जाति गणना प्रमुखता से छा गई। इसके बाद अचानक 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला कर दिया और 25 पर्यटन समेत 26 लोगों की हत्या कर दी। देश और समाज की सोच में अचानक गुस्सा और ग़म का उफान उठ गया। पूरे देश में देशभक्ति का तूफान उठ गया। पत्रकारिता से फौरन सारे मुद्दे गायब हो गए और सिर्फ देशभक्ति का जज्बा हिलोरें लेने लगा। चारों तरफ पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा फैल गया, बदला लेने की मांग उठने लगी। पत्रकारिता भी बदल गई और अखबारों भी हर तरफ से लोगों की भावनाओं को समेटकर आवाज बुलंद करने का काम करने लगे।
पत्रकारिता के छात्रों को इस बदलाव को नोट करना चाहिए और हमेशा याद रखना चाहिए कि समाज ही पत्रकारिता को संचालित करता है और पत्रकारिता के एजेंडे को तय करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। लेकिन जब कोई शक्ति इस सामान्य प्रक्रिया में दखल डालता है तब इसे पीत पत्रकारिता कहा जाता है। पत्रकारिता में बाहरी शक्तियों की घुसपैठ से पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता का जन्म होता है। पत्रकारिता के छात्रों को इस बात पर भी नज़र रखनी चाहिए कि कब किन शक्तियों ने ऐसी कोशिश की और उसका परिणाम क्या हुआ। आमतौर पर ऐसी बाहरी शक्तियों को पत्रकारिता खुद नकार देती है लेकिन आज स्थितियां अलग है। अनेक प्रकार के प्रलोभन और दबाव है जो पत्रकारिता को लपेटे में लेने की कोशिश करती रहती हैं। इसके परिणामस्वरूप पत्रकारिता पर इस समय समाज का स्वाभाविक प्रवाह रुक गया है। अब फिर आते हैं मूल मुद्दे पर।
इसके बाद देश और समाज की सोच में फिर एकदम से देशभक्ति का जज्बा आ गया। पाकिस्तान से आर-पार करने की बात उठने लगी। पत्रकारिता में भी यही स्वर सुनाई पड़ने लगा। फिर जो हुआ, हम सबने देखा। इन स्थितियों का वर्णन करने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि मैं समाज और पत्रकारिता के रिश्ते को स्थापित कर सकूं। यह स्वाभाविक रिश्ता है। समाज जो भी करता है, पत्रकारिता उसी के हिसाब से चलती है। लेकिन जब समाज का कोई हिस्सा पत्रकारिता को अपने हिसाब से चलने को बाध्य करता है तब यहां कृत्रिम पत्रकारिता का जन्म होता है। आज कृत्रिम पत्रकारिता का दौर भी चल रहा है। पत्रकारिता के छात्रों को इस संदर्भ में सावधान रहना होगा। उन्हें स्वाभाविक और कृत्रिम पत्रकारिता में फर्क समझना चाहिए और फिर अपनी भूमिका तय करनी चाहिए।
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