Wednesday, 17 September 2025

केबीसी में हुई सुल्तानगंज की चर्चा

बिहार में मिली थी 'सुल्तानगंज बुद्ध' प्रतिमा 

हाल ही में टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति में सुल्तानगंज की चर्चा हुई। जी हां, वही भागलपुर वाले सुल्तानगंज की चर्चा। दरअसल केबीसी में 'सुल्तानगंज बुद्ध' के बारे में सवाल पूछा गया था। यह जब सवाल पूछा गया तब बहुत सारे लोगों को पता चला कि बिहार में भागलपुर के पास सुल्तानगंज नामक छोटे से शहर में बुद्ध की यह महान प्रतिमा सुल्तानगंज बुद्ध की प्रतिमा जमीन के नीचे से से निकली थी जिसे अंग्रेज उठाकर अपने देश ले गए थे।

सुल्तानगंज बुद्ध प्राचीन भारत की एक प्रमुख धातु प्रतिमा है, जो बौद्ध कला का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। यह गुप्त-पाल काल की संक्रमण अवधि (लगभग 500-700 ईस्वी) की मानी जाती है। यह दुनिया की सबसे बड़ी लगभग पूर्ण तांबे की बुद्ध प्रतिमाओं में से एक है। 

प्रतिमा की ऊंचाई लगभग 2.3 मीटर (7.5 फुट) है, चौड़ाई 1 मीटर और वजन 500 किलोग्राम से अधिक। यह शुद्ध तांबे (कॉपर) से बनी है, जिसे "सीर पेरड्यू" (Cire Perdue) तकनीक से ढाला गया था। प्रतिमा में बुद्ध खड़े मुद्रा में हैं, दाहिना हाथ अभय मुद्रा (भयमुक्ति का प्रतीक) में ऊपर उठा हुआ है, जबकि बायां हाथ नीचे की ओर खुला है। वस्त्र बहुत पतले और चिपके हुए दिखाए गए हैं, जो सारनाथ शैली की विशेषता है।

यह सारनाथ की पत्थर की बुद्ध प्रतिमाओं से प्रेरित है, जिसमें शरीर और अंगों की सुगठित गोलाई और पतली वस्त्र रेखाएं प्रमुख हैं। प्रतिमा में मरम्मत के निशान भी हैं, जो दर्शाते हैं कि इसे बनाने में तकनीकी चुनौतियां आईं।

यह प्रतिमा बिहार के भागलपुर के पास सुल्तानगंज नामक छोटे से शहर से मिली थी। यह शहर गंगा नदी के किनारे स्थित है। इसकी खोज 1861 में ईस्ट इंडियन रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान हुई। इंजीनियर ई. बी. हैरिस ने प्राचीन अवशेषों की खुदाई के दौरान इसकी खोज की। उन्होंने पहले बुद्ध का दाहिना पैर 10 फुट गहराई में पाया, जो संभवतः किसी मठ के मलबे में छिपाकर रखा गया था।

सुल्तानगंज प्राचीन बौद्ध केंद्र था, जहां कई मठ थे। खुदाई में अन्य छोटी प्रतिमाएं भी मिलीं, जैसे दो पत्थर की बुद्ध प्रतिमाएं (एक ब्रिटिश म्यूजियम में, दूसरी सैन फ्रांसिस्को के एशियन आर्ट म्यूजियम में) और एक बुद्ध का सिर (विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम, लंदन में)।

वर्तमान स्थिति

प्रतिमा को खोजने के बाद बर्मिंघम (ब्रिटेन) ले जाया गया, जहां इसे पिघलाने की योजना बनी लेकिन विरोध के कारण ऐसा नहीं हो सका। आज यह बर्मिंघम म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी का प्रमुख आकर्षण है। भारत में इसे वापस लाने की मांगें उठती रही हैं, क्योंकि यह भारतीय विरासत का प्रतीक है।

यह भारतीय धातु कला का सर्वोत्तम उदाहरण है और गुप्त काल की बौद्ध मूर्तिकला को दर्शाता है। यह बौद्ध धर्म के प्रसार और कला कौशल की गवाही देता है। 

यह प्रतिमा न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जो प्राचीन भारत की समृद्धि को उजागर करती है। 

अंग्रेजों के कब्जे से यह मूर्ति कब मुक्त होगी और भारत लौटेगी, इसका पता नहीं। 

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