Sunday, 31 August 2025

हिंदी पत्रकारिता की तीन जिम्मेदारी

-लोकतंत्र को मजबूत करना 

-सत्य को सामने लाना 

-समाज को जोड़ना


इन्हें निभाने के लिए हो क्या रहा है 

-सत्ता के साथ समीकरण बनाने में व्यस्त 

-करियर की चमक बढ़ाने में मस्त

-एजेंडा को लागू करने की होड़ 

-जो सामने आ गया, खबरें बन गईं

-अंदर तक झांकना बंद हो गया है 

-सच की खोज कम हो रही है 


परिणाम क्या निकल रहा 

-जुझारूपन घट रहा 

-खबरें बन रही हैं, खोजी नहीं जा रहीं

-रिपोर्ट हो रही है, रिसर्च नहीं 

-तकनीकी विकास हो रहा है, वैचारिक नहीं 

-सामाजिक सरोकार गायब हो रहा है 

-भ्रष्टाचार उजागर नहीं हो रहा है 


अगली पीढ़ी को क्या देंगे 

-कंफ्यूजन और विचारहीनता 

-डिजिटल मजबूती और सैद्धांतिक कमजोरी 

-जो है, उसे रिपोर्ट करो की कार्यशैली 

-जनता के सरोकार की कमजोर समझ

Saturday, 30 August 2025

इतवार

छोटा-बड़ा नहीं होता है इतवार 

इतवार तो बस होता है इतवार 

सुबह से फुसफुसाता, कुलबुलाता है 

दो दिन पहले से धमकाता है इतवार।

Tuesday, 26 August 2025

हिंदी की क्लास में शिक्षक भी आप और छात्र भी आप‌‌‌

अव्वल तो कमजोर भाषा (हिंदी या अंग्रेजी) वालों को पत्रकारिता में आना ही नहीं चाहिए और यदि किसी कारणवश आ गए तो सबसे पहले भाषा को सुधारने का काम करना चाहिए। इसके लिए हिंदी में सोचना शुरू कीजिए। फिर इसका अभ्यास हो जाए तो हिंदी सीखने के लिए रोजाना एक या दो घंटे का समय निकालिए। इस समय को पूर्णतः हिंदी की क्लास को दीजिए। अब आप पूछेंगे कि मैं किस क्लास की बात कर रहा हूं। यह क्लास लेगा कौन। तो भाई, यह क्लास आप खुद लेंगे। इस क्लास में शिक्षक भी आप ही होंगे और छात्र भी आप। फिर सवाल उठता है कि आप अपनी क्लास कैसे लेंगे। इसका तरीका मैं बताता हूं।

पहला कदम

सबसे पहले संकल्प लें कि मुझे अपनी हिंदी को मजबूत बनाना है। अपने संकल्प को तारीख के साथ नोट कर लीजिए। संकल्प के बाद यह तय करिए कि सुबह या अपनी सुविधानुसार एक घंटे का समय इस काम में लगाएंगे। फिर तीन काम शुरू करें 

- आज के अखबार को पूरा पढ़ना। ध्यान रहे अखबार ऑनलाइन नहीं होना चाहिए। 

- अखबार के किसी पेज की लीड खबर को अपनी डायरी में लिखना। खबर को हूबहू डायरी में लिख लीजिए। 

- अब इस खबर को अपने हिसाब से दोबारा लिखिए यानी इससे एक नई खबर बनाइए। इस खबर में नए-नए शब्दों का प्रयोग कीजिए। कुछ ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल कीजिए जिसे आप जानते हैं लेकिन उसकी स्पेलिंग में आपको कंफ्यूजन है। अब आप अपने लिखे हुए को किसी जानकार से चेक करा पाएं तो अति उत्तम है। आपको उचित सलाह मिल सकेगी और आपकी गलतियां सही हो जाएंगी। 

इस प्रक्रिया को एक माह तक करते रहिए। 

दूसरा कदम 

रोजाना अखबार पढ़ने के साथ-साथ अच्छी पत्रिकाएं और किताबें पढ़ने की आदत विकसित करिए। किताबों में बड़े साहित्यकारों की रचनाएं शामिल कर सकते हैं। 

इन दो कामों का आपको एक माह में रिजल्ट दिखने लगेगा। इन कामों को समझने में कोई उलझन महसूस हो तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं। 






Sunday, 24 August 2025

एआई युग में गहरी हो रही है नैतिक पिछड़ेपन की खाई

एआई युग में एक तरफ तकनीक पूरी ताकत के साथ अपना विकास कर रही हैं तो दूसरी ओर उससे दोगुनी शक्ति के साथ छल-कपट, काम, क्रोध, मद, लोभ भी अपना कोरस गा रहे हैं। तरक्की की ऊंचाइयों के बीच नैतिक पिछड़ेपन की गहरी और चौड़ी होती खाई डर पैदा करती है। लोग जितना ज्यादा विकास कर रहे हैं यह खाई उतनी ही गहरी होती जा रही है। खाई के गहरी होने से अधिक डर तब लगता है जब इस खाई में गिरने से डरने वाले लोगों की ही तादाद कम होती जा रही है। लोग धड़ाधड़ इस खाई में गिरते जा रहे हैं और जो लोग नहीं गिरे हैं, वे दुखी हो रहे हैं कि अब तक खाई में क्यों नहीं गिरे। लोग इस नैतिक पिछड़ेपन को समझ ही नहीं पा रहे हैं। जब समझ नहीं पा रहे हैं तो डरेंगे कैसे? कभी-कभी यह भी लगता है कि लोग इसके खतरे को समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समझना नहीं चाहते हैं।

यही एआई युग का युगधर्म है। इसी युगधर्म के हिसाब से पत्रकारिता का मिजाज तय होता है। 

मुखौटा आज की सच्चाई है

आज हर चेहरे पर मुखौटा है। प्रकट रूप में एक चेहरा, गुप्त रूप से दूसरा चेहरा। पहले भी ऐसे लोग समाज में होते थे लेकिन तब इनकी संख्या कम थी। अब यह संख्या बढ़ रही है लगातार। तभी तो एक सरकारी दफ्तर का मामूली कर्मचारी करोड़ों रुपए का मालिक निकलता है। मुहल्ले का एक छोटा-सा नेता अचानक चमचमाती महंगी गाड़ियों में घूमने लगता है। ऐसे छुपे रुस्तम से समाज भरा पड़ा है। छुपे रुस्तमों के जमाने में आप विशुद्ध पत्रकारिता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। समाज ने मुखौटा चढ़ाया तो पत्रकारिता ने भी नक़ाब पहन लिया है। यह मजबूरी है।

बुराई से डर नहीं लगता 

असली दिक्कत यह नहीं है। असली दिक्कत यह है कि मुखौटे के पीछे छिपे चेहरों को बेनकाब करने वाले लोग कम हो रहे हैं। कुछ दशक पहले समाज में यदि कोई बेईमान, भ्रष्टाचारी, दुराचारी आदमी होता था तो लोग उसकी बुराई करते थे, आलोचना करते थे और कभी-कभी उसकी भर्त्सना भी की जाती थी और वह भी सार्वजनिक रूप से। 

लेकिन आज जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी है, समाज में उसे उतना बड़ा ओहदा मिलता है। विजय माल्या जब टीवी पर आकर कहते हैं कि मैंने जितने की चोरी की थी उससे कहीं ज्यादा धन बैंक वाले हमसे वसूली कर चुके। इसलिए मैं चोर नहीं हूं। उनकी बात पर देश सोचने लगता है कि ठीक ही तो कह रहा है बिचारा। बैंक वाले बड़े बेरहम हैं। कोई यह नहीं सोचता कि चोरी का माल लौटा देने पर चोरी के अपराध को माफ करने का कानून किसी किताब में नहीं लिखा है। देश में इस तरह से हो रहे वैचारिक पतन से पत्रकारिता कैसे अछूती रह सकती है। 

किसे सम्मानित करता है समाज 

आज हम हत्या, बलात्कार के आरोपियों को सार्वजनिक मंचों पर सम्मानित करते हैं। समाज में उसको बड़ा महत्व मिलता है। जो जितना बड़ा आरोपी है, वह उतना बड़ा समाजसेवी बनता है। 

क्या लगता है कि पत्रकारिता पर इन घटनाओं का असर नहीं पड़ता है। मजबूरी में पत्रकारिता को इन घटनाओं को ग्लैमरस अंदाज में पेश करना पड़ता है। शायद ही कोई अखबार होगा जो ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट छापने से बच पाया हो। न छापें तो अखबारों के बहिष्कार का एलान होता है। 

तो एआई की तरक्कियों के बीच वैचारिक पतन को कौन संभालेगा? नैतिक पिछड़ेपन से कौन उबारेगा? ठीक है, इसमें एआई का दोष नहीं है। एआई तो तकनीकी विकास का एक हिस्सा है लेकिन समाज को गर्त में ले जानेवाले लोगों के लिए भी एआई एक बड़ी सुविधा और औजार तो है ही। पत्रकारिता को भी इन्हीं के बीच सांस लेनी है, जिंदा रहना है, उड़ान भरनी है। 

Monday, 18 August 2025

पुरानी और नई पीढ़ी की पत्रकारिता में अंतर

इस समय पत्रकारिता में जेनरेशन मिलेनियल्स, जेड और अल्फा का दौर चल रहा है। जेनरेशन जेड अभी पत्रकारिता में कमान संभाल रही है। इनके साथ जेनरेशन मिलेनियल्स भी है। ये दोनों जेनरेशन पत्रकारिता को किस तरह संचालित कर रहे हैं। इनके समय की पत्रकारिता पुराने समय की पत्रकारिता से कितनी अलग है। पुराने समय की पत्रकारिता में आज क्या-क्या बदलाव आया है। इसे समझना दिलचस्प होगा। आइए इसे समझते हैं -

1. माध्यम और प्रौद्योगिकी 

पुरानी पीढ़ी-पत्रकारिता का इतिहास प्रौद्योगिकी के विकास के साथ शुरू हुआ। भारत में पहला समाचार-पत्र 1776 में विलेम बॉल्ट्स द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के समाचारों पर केंद्रित था। 1819 में बंगाली भाषा में "संवाद कौमुदी" राजा राममोहन राय द्वारा प्रकाशित हुआ, जो भारतीय भाषा का पहला समाचार-पत्र था। प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत 1674 में हुई, लेकिन समाचार-पत्रों का वास्तविक विकास 19वीं सदी में हुआ। ये पत्र प्रायः सामाजिक सुधार और नए ज्ञान के प्रसार पर केंद्रित थे, लेकिन सीमित तकनीक के कारण धीमे और स्थानीय थे। इनमें मूल उद्देश्य गुलामी के खिलाफ आवाज बुलंद करना था। 

नई पीढ़ी-डिजिटल क्रांति ने पत्रकारिता को बदल दिया। इंटरनेट, सोशल मीडिया (ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब), और मोबाइल ऐप्स ने खबरों को त्वरित और वैश्विक बना दिया। आज, समाचार वेबसाइट्स, ब्लॉग्स, और पॉडकास्ट जैसे माध्यमों ने पारंपरिक प्रिंट और टीवी को पीछे छोड़ दिया है। रीयल-टाइम अपडेट और मल्टीमीडिया कंटेंट (वीडियो, इन्फोग्राफिक्स) अब आम हैं।

2. सामग्री की गति और गुणवत्ता

पुरानी पीढ़ी-समाचार-पत्रों का प्रकाशन दैनिक, साप्ताहिक या मासिक होता था, जिसके कारण खबरों में गहराई और तथ्य-जांच पर जोर था। उदाहरण के लिए, 1830 में राममोहन राय का "बंगदूत" हिंदी, बंगला, अंग्रेजी और फारसी में निकलता था, जो सामाजिक सुधारों पर केंद्रित था।

नई पीढ़ी- 24/7 न्यूज़ साइकिल के कारण खबरों को तुरंत प्रकाशित करने का दबाव है। इससे कभी-कभी सनसनीखेजी और क्लिकबेट की प्रवृत्ति बढ़ी है। हालांकि, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने डेटा पत्रकारिता और इंटरैक्टिव स्टोरीटेलिंग को बढ़ावा दिया है, जो पाठकों को गहन विश्लेषण प्रदान करता है।

3. पत्रकार की भूमिका और प्रशिक्षण

पुरानी पीढ़ी: पत्रकार मुख्य रूप से लेखक या संवाददाता होते थे, जिनका काम खबर इकट्ठा करना और लिखना था। संपादकीय नियंत्रण सख्त था, और पत्रकारों को औपचारिक प्रशिक्षण की कम आवश्यकता थी।

नई पीढ़ी: पत्रकार अब मल्टी-टास्किंग करते हैं—लेखन, फोटोग्राफी, वीडियो एडिटिंग, और सोशल मीडिया मैनेजमेंट। डिजिटल टूल्स जैसे SEO, डेटा एनालिटिक्स, और कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम (CMS) का ज्ञान आवश्यक है। फ्रीलांसिंग और स्वतंत्र पत्रकारिता का चलन बढ़ा है।

4. दर्शकों से जुड़ाव

पुरानी पीढ़ी: पाठकों से संवाद सीमित था, जो पत्रों या टेलीफोन के माध्यम से होता था। समाचार-पत्रों का प्रभाव स्थानीय या क्षेत्रीय था।

नई पीढ़ी: सोशल मीडिया ने दर्शकों से सीधा और त्वरित संवाद संभव बनाया। पाठकों की टिप्पणियां, लाइक्स, और शेयर सीधे कंटेंट को प्रभावित करते हैं। पत्रकार अब दर्शकों की रुचियों को एनालिटिक्स के जरिए समझते हैं और उसी के अनुसार सामग्री बनाते हैं।

5. आर्थिक मॉडल

पुरानी पीढ़ी: समाचार-पत्रों की आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन था। बड़े मीडिया हाउस का दबदबा था, और छोटे प्रकाशनों का जीवित रहना मुश्किल था।

नई पीढ़ी: डिजिटल विज्ञापन, पे-वॉल, क्राउडफंडिंग, और स्पॉन्सर्ड कंटेंट नए आय के स्रोत हैं। स्वतंत्र पत्रकार और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स भी अब प्रतिस्पर्धा में हैं। हालांकि, विज्ञापन-निर्भर मॉडल के कारण क्लिकबेट और सनसनीखेज सामग्री की समस्या बढ़ी है।

6. विश्वसनीयता और नैतिकता

पुरानी पीढ़ी: पत्रकारिता में नैतिक मानदंड और तथ्य-जांच पर सख्ती थी। समाचार-पत्र सामाजिक सुधार और जागरूकता पर केंद्रित थे, लेकिन सरकारी सेंसरशिप और नियंत्रण की चुनौतियाँ थीं।

नई पीढ़ी: फेक न्यूज़, गलत सूचना, और पक्षपातपूर्ण कवरेज की चुनौतियां बढ़ी हैं। सोशल मीडिया पर वायरल कंटेंट ने विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तथ्य-जांच और पारदर्शिता पर जोर दे रहे हैं।

7. वैश्वीकरण और पहुंच

पुरानी पीढ़ी: समाचार-पत्रों की पहुंच स्थानीय या राष्ट्रीय थी। भाषा की समस्या भी थी, जैसे कि शुद्ध हिंदी बनाम सुलभ भाषा का चयन।

नई पीढ़ी: इंटरनेट ने पत्रकारिता को वैश्विक बना दिया। एक खबर सेकंडों में दुनिया भर में फैल सकती है। मल्टीलिंग्वल कंटेंट और ऑटोमेटेड ट्रांसलेशन ने भाषा की बाधाओं को कम किया है।

8. सामाजिक प्रभाव और उद्देश्य

पुरानी पीढ़ी: पत्रकारिता का उद्देश्य सामाजिक सुधार, स्वतंत्रता संग्राम, और जनजागरूकता था। उदाहरण के लिए, "बंगदूत" जैसे पत्रों ने हिंदी को महत्व दिया और सामाजिक बदलाव की वकालत की।

नई पीढ़ी: पत्रकारिता अब मनोरंजन, शिक्षा, और सामाजिक बदलाव का मिश्रण है। डिजिटल युग में व्यक्तिगत कहानियों, नागरिक पत्रकारिता, और वायरल ट्रेंड्स का प्रभाव बढ़ा है।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि पुरानी पत्रकारिता गहन, सुधार-उन्मुख, और सीमित दायरे वाली थी, जबकि नई पत्रकारिता तेज, तकनीक-प्रधान, और वैश्विक है। पुरानी पीढ़ी ने सामाजिक सुधारों को प्राथमिकता दी, वहीं नई पीढ़ी में गति और पहुंच के साथ-साथ विश्वसनीयता की चुनौतियां हैं। दोनों के बीच संतुलन बनाना आधुनिक पत्रकारिता की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

(उपरोक्त जानकारी वेब पर उपलब्ध सामग्री, विशेष रूप से पत्रकारिता के इतिहास से संबंधित स्रोतों पर आधारित है।)

Friday, 8 August 2025

लालबाग का संत-व्हाइट कॉटन सिल्क ट्री

जब कभी आप बंगलुरु के लालबाग गार्डन यानी लालबाग बॉटनिकल पार्क में सैर के लिए जाएंगे तो गार्डन के किसी भी कोने से आपको एक ऊंचा पेड़ दिखाई देगा। पेड़ में इतना आकर्षण है कि यह आपको अपनी ओर खुद ब खुद खींच लेगा। इसकी जड़ों को देखकर आप इसके करीब खुद ही चले जाएंगे। इसे लालबाग का संत कहते


हैं। वैसे इसका नाम व्हाइट कॉटन सिल्क ट्री है जिसे आम बोलचाल में कॉटन सिल्क ट्री भी कहते हैं। इसकी ऊंचाई लगभग 26 मीटर (85 फीट) है और जड़ों का फैलाव भी विशाल है। इसका अंग्रेजी नाम है-Kapok tree। यह पेड़ लालबाग गार्डन का बहुत ही सम्मानित और बुजुर्ग सदस्य है क्योंकि इसकी उम्र 200-250 बर्ष बताई जाती है। 
यह पेड़ दक्षिण भारत के लंबे इतिहास का गवाह होने के साथ-साथ बसंत के मौसम में खूबसूरत फूल बिखेरता है।
ऐसी जानकारी है कि यह पेड़ 1760 के दशक में लगाया गया था, जब मैसूर के शासक हैदर अली ने इस बाग की नींव रखी थी। हैदर अली ने दुनियाभर से दुर्लभ पौधे मंगवाए थे। माना जाता है कि इस सिल्क कॉटन ट्री को म्यांमार या अफ्रीका से लाया गया था, जहां यह प्रजाति आम थी। बाद में टीपू सुल्तान ने इस बाग को और विकसित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान वैज्ञानिकों ने इसे वनस्पति अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया। उस काल में यह पेड़ प्रयोग और अध्ययन का विषय बना।
क्या हैं पेड़ की खासियतें 
यह पेड़ लगभग 250 साल से खड़ा है। न सिर्फ खड़ा है बल्कि मौसम के अनुसार रंगीन फूल और फल भी देता है। इसके तने का घेरा बहुत विशाल है और ऊंचाई इतनी अधिक कि इसे लालबाग के लगभग हर कोने से देखा जा सकता है।
पेड़ के पास एक जानकारी पट्टिका भी लगी हुई है, जो इसके इतिहास को संक्षेप में बताती है। 
पेड़ पर वसंत में बड़े नारंगी-लाल फूल होते हैं, और साल के अंत तक इसके फलों से सफेद रेशे (Kapok) निकलते हैं, जिनका उपयोग तकियों और गद्दों में होता है। यह पेड़ केवल एक वनस्पति ही नहीं बल्कि बंगलुरु के इतिहास का भी गवाह है। इसकी छाया में बैठकर कई चित्रकार, फोटोग्राफर और कवि रचनाएं भी करते रहे हैं। 
हम भी कुछ देर पेड़ की घनी छाया में रुके। उसे निहारा। शांति बिखेरता यह पेड़ इतना घना है कि इसके नीचे से आप आसमान नहीं देख सकते हैं। इसकी जड़ों को नाप नहीं सकते क्योंकि पेड़ के चारों ओर लोहे का घेरा बना हुआ है। इसलिए आप छू भी नहीं सकते। सिर्फ इस बुजुर्ग को देखिए और महसूस कीजिए क्योंकि आप इतिहास के नीचे खड़े हैं।






Saturday, 2 August 2025

टीपू सुल्तान के समर पैलेस में कुछ पल

तस्वीर में जिस महल के खंभे पर मैं पैर टिकाकर खड़ा हूं, वहां तक पहुंचने के लिए अंग्रेजों को चार युद्ध (मैसूर-एंग्लो) लड़ने पड़े थे। मैसूर के राजा टीपू सुल्तान को हराने में अंग्रेजों की सांसें फूल गई थीं। टीपू सुल्तान की मृत्यु 1799 में अंग्रेजों के साथ साइरिंगपट्टना की चौथी लड़ाई में हुई। उनके बाद मैसूर राज्य की सत्ता ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में आ गई। टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने वोडेयार वंश को फिर से सत्ता में स्थापित किया, जिन्हें टीपू सुल्तान और हैदर अली ने पहले अपदस्थ कर दिया था।

जब आप इस दो मंजिले महल में प्रवेश करेंगे तो आपको चारों ओर खूबसूरत नक्काशी वाले खंभे दिखाई देंगे। इन्हीं खंभों पर यह महल टिका है। खंभों की विशेषता यह है कि यह ऊपर से नीचे की ओर जाते हैं। दोनों मंजिलों को यह जोड़ते हैं। नीचे लंबा सा हॉल है। शायद यहां राजा का दरबार लगता हो। हॉल के छोर पर ऊपर जाने की सीढ़ियां बनी हुई हैं। सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर जाएंगे तो हॉल दिखेगा। हॉल के दोनों छोर पर कमरे बने हैं। बताया जाता है कि यहां राजा का निजी कक्ष था। ऊपरी मंज़िल में छज्जे और बॉलकोनी बने हैं, जहां से राजा दरबार की गतिविधियां देखते थे। पूरा महल लकड़ी (टीक वुड) से बना है। इसमें नक्काशीदार खंभे, झरोखे हैं। महल की दीवारों और छतों पर रंगीन चित्रकारी, फूलों की बेल-बूटियां और ज्यामितीय डिज़ाइन हैं।

महल में प्रवेश करते ही इसकी खूबसूरती का अंदाज मिलने लगता है। हालांकि अब खूबसूरती की चमक घटती जा रही है। इसके बावजूद अपनी भव्यता का अहसास कराने के लिए काफी है। महल के अंदरूनी हिस्से में रोशनी की थोड़ी कमी महसूस होती है लेकिन आपको इसकी कमी अखरेगी नहीं। हम जब पहुंचे तब एक-दो जोड़े वहां पहले से ही मौजूद थे और अपने पार्टनर की तस्वीरें खींचने में व्यस्त थे। महल के झरोखे के बीच खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाने का मन आपका भी हो जाएगा। झरोखे से झांकती तस्वीरें आपका मन मोह लेंगी। 

महल में नीचे एक बड़ा सा आंगन भी है। कहते हैं राजा इस आंगन में अपने अतिथियों के साथ मुलाकात करते थे। यहां टीपू सुल्तान की जनता से भेंट और दैनिक प्रशासन के कार्य भी होते थे। इस हिस्से में एक छोटा संग्रहालय बनाया गया है, जहां टीपू सुल्तान की वस्तुएं रखी हैं। इन वस्तुओं में एक तलवार की अनुकृति (असली लंदन के संग्रहालय में है), राजकीय पोशाक, युद्ध में प्रयुक्त चीजें, ब्रिटिश हुकूमत के साथ हुए युद्धों में उपयोग की गई कुछ चीजें शामिल हैं।

टीपू सुल्तान का समर पैलेस बेंगलुरु का एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। यह महल 18वीं शताब्दी में बना था और यह टीपू सुल्तान की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में कार्य करता था। हैदर अली ने इसका निर्माण वर्ष 1761 में शुरू किया था लेकिन इसे 1791 में टीपू सुल्तान ने पूरा कराया। इसकी वास्तुकला शैली इंडो-इस्लामिक और द्रविड़ का मिश्रण है। 





AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है...