भारतीय समाज में जेनरेशन गैप हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। जब भी दो पीढ़ियों के बीच विचार या व्यवहार का टकराव होता है तब दोष जेनरेशन गैप को ही दिया जाता है। पिछली पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को यही समझाती है कि यह जेनरेशन गैप का दोष है। आखिर यह जेनरेशन गैप होता क्या है ?
जेनरेशन गैप एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो समय के साथ बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश के कारण उत्पन्न होती है। प्रत्येक पीढ़ी का जन्म अलग-अलग समय में होता है, जिसमें विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाएं (जैसे युद्ध, आर्थिक मंदी, स्वतंत्रता आंदोलन) उनके दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं। पुरानी पीढ़ी (जैसे बेबी बूमर्स) प्रिंट और रेडियो युग में पली-बढ़ी, जबकि युवा पीढ़ी (जैसे जेन Z या जेन अल्फा) डिजिटल और सोशल मीडिया युग में। यह तकनीकी अंतर उनके संचार और सोचने के तरीके को प्रभावित करता है। प्रत्येक पीढ़ी के सामाजिक मूल्य अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, पुरानी पीढ़ी परंपराओं और सामूहिकता को महत्व देती है, जबकि युवा पीढ़ी व्यक्तिवाद और स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती है। आर्थिक स्थिरता या तकनीकी नवाचारों से प्रभावित नौकरी के अवसर पीढ़ियों के बीच अंतर पैदा करते हैं।
भारत में जेनरेशन गैप विशेष रूप से स्पष्ट है क्योंकि यहां परंपराएं और आधुनिकता का मिश्रण है। पुरानी पीढ़ी धार्मिक रीति-रिवाजों और संयुक्त परिवार को महत्व देती है, जबकि युवा पीढ़ी वैश्विक संस्कृति (जैसे वेस्टर्न फैशन, सोशल मीडिया) की ओर आकर्षित है।
पत्रकारिता पर भी इन सभी अंतरों का असर पड़ता है। ये सभी अंतर साफ तौर पर उन लोगों को महसूस होते हैं जो दो-तीन पीढ़ियों को अपने सामने पलते और बढ़ते देख रहे हैं।
जेनरेशन गैप का असर
जेनरेशन गैप का असली असर तब दिखाई देता है जब किसी अखबार में दो या तीन जेनरेशन के लोग एक साथ काम करते दिखाई देते हैं। अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों की कार्यशैली, वैचारिक मूल्य और तकनीकी दक्षता अलग-अलग होती है। पुरानी पीढ़ी के पत्रकार जहां मूल्यों और सामाजिक सरोकार से जुड़ी जनपक्षीय लेखन की वकालत करती है तो नई पीढ़ी के पत्रकारों के दिमाग में इन चीजों के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि इनका विकास अलग माहौल में हुआ है और इन्हें जनपक्षीय विचारों से लैस ही नहीं किया गया है।
पुराने पत्रकार पारंपरिक खोजी पत्रकारिता और संपादकीय लेखन पर जोर देते हैं, जबकि युवा पत्रकार डिजिटल व्यूज, लाइक्स को प्राथमिकता देते हैं, जिससे कार्यशैली में मतभेद पैदा होते हैं। डिजिटल युग में विज्ञापन और दर्शक संख्या बढ़ाने का दबाव युवा पत्रकारों को सनसनीखेज और वाणिज्यिक कंटेंट की ओर ले जाता है, जो पत्रकारिता के मूलभूत उद्देश्य (जन सरोकार) से भटका सकता है।
भारत में हिंदी पत्रकारिता का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक सुधारों से जुड़ा है (जैसे उदन्त मार्तण्ड का ब्रिटिश विरोधी रुख)। युवा पीढ़ी के पत्रकार वैश्विक संस्कृति, मनोरंजन, और लाइफस्टाइल पर अधिक ध्यान देते हैं, जिससे परंपरागत मूल्यों का प्रभाव कम हो रहा है।
हिंदी पत्रकारिता में भारतेन्दु युग में सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना पर जोर था। आज युवा पीढ़ी की पत्रकारिता में मनोरंजन और वाणिज्यिक कंटेंट पर अधिक ध्यान ने देती है। इससे मूल्यों महत्व घट रहा है। समाचारों प्रतिस्पर्धा में गहन विश्लेषण और सामाजिक मुद्दों की गहराई कम हो सकती है, जो पुरानी पीढ़ी की पत्रकारिता की विशेषता थी।
निष्कर्ष यह है कि पुरानी पीढ़ी के पास सामाजिक सरोकार का बल था तो आज की पीढ़ी के पास तकनीकी ताकत है।
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