पत्रकारिता को लेकर समझ के स्तर पर हमेशा से कुछ गलतफहमियां और कुछ खुशफहमियां रही हैं। आज से दो-तीन दशक पहले जब कोई व्यक्ति पत्रकार बनता था तब उसके दिमाग में पत्रकारिता को लेकर कुछ अलग तरह की खुशफहमियां होती थीं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं -
- पत्रकारिता से समाज बदल देंगे
- गरीबों की दशा सुधारेंगे
- देश में चेतना पैदा करेंगे
- शोषण के खिलाफ आवाज उठाएंगे
- सब-कुछ बदल देंगे
आज जब पत्रकारिता की डिग्री हाथ में लेकर बच्चे बाहर आते हैं तब उनके दिमाग में कुछ नई तरह की खुशफहमियां होती हैं। जैसे,
- डिग्री मिलते ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी
- मीडिया में बहुत अच्छी सैलरी मिलती है
- फौरन न्यूज चैनल में एंकर बन जाएंगे
- खूब तरक्की होगी, सैलरी भी खूब बढ़ेगी
- जीवन खुशहाल रहेगा
लेकिन जब सच्चाई सामने आती है तब निराशा छाने लगती है। ऐसी स्थितियों में खुद को संभालने के लिए आज के समय के अनुसार कुछ उपाय करने चाहिए ताकि पीड़ा कम हो सके। सामयिक उपाय इस प्रकार हैं -
- पत्रकारिता के जुनून को बचाकर रखें, भविष्य में काम आएगा, वर्तमान में दिक्कत कम होगी
- नौकरी को नौकरी समझकर करें, पैशन नहीं। पीड़ा कम होगी
- जीवन का टारगेट सेट करें, प्रेरणा मिलेगी
- एक-दो नए हुनर सीखें, मन लगा रहेगा
- थोड़ी बहुत हुज्जत भी कर लिया करें, ऊर्जा लेवल बना रहेगा
सच्चाई तो यह है कि पत्रकारिता से समाज नहीं बदल रहा है बल्कि समाज पत्रकारिता को बदल रहा है। पत्रकारिता की हदें तय कर रहा है।
दूसरी सच्चाई यह है कि पत्रकारिता से जीवन खुशहाल नहीं बन रहा है। पत्रकारिता से सिर्फ घर चल रहा है और वह भी रोते-गाते।
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