Thursday, 16 October 2025

छौ नृत्य में क्यों पहना जाता है मुखौटा

छौ नृत्य (Chhau Dance) भारत का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य और नाट्य-शैली है, जो मुख्य रूप से झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में किया जाता है। यह नृत्य युद्ध, शौर्य, पौराणिक कथाओं और लोककथाओं पर आधारित होता है। विदेशों में भी इसकी मांग है।

छौ नृत्य के मुख्य राज्य-झारखंड (सारायकेला), ओडिशा (मयूरभंज), पश्चिम बंगाल (पुरुलिया)

शैली- लोकनृत्य, मुखौटा नृत्य (Mask Dance)

भाषा- नृत्य में संवाद नहीं होते — भाव, संगीत और नृत्य के माध्यम से कथा कही जाती है।

छौ नृत्य की तीन प्रमुख शैलियां हैं -

1. सारायकेला छौ- सरायकेला झारखंड का एक जिला है। इस इलाके में छौ नृत्य की शैली सबसे परिष्कृत यानी जाती है। इसमें नाट्यप्रधान रूप में प्रस्तुति दी जाती है। कलाकार सुंदर मुखौटे पहनते हैं। भावनाओं को मुखौटे और शरीर की भंगिमाओं से व्यक्त किया जाता है।

2. मयूरभंज छौ- यह शैली ओडिशा के मयूरभंज जिले में पाई जाती है। मुख्य बात यह है कि इसमें मुखौटे का उपयोग नहीं किया जाता। यह सबसे अभिनय प्रधान और मार्शल शैली है।इसमें शारीरिक चपलता और नृत्य कौशल पर जोर होता है।

3. पुरुलिया छौ- यह शैली पश्चिम बंगाल के पुरुलिया इलाके से संबंध रखती है। इसमें भव्य मुखौटे और रंगीन पोशाकें होती हैं। कथा अधिक लोक और पौराणिक होती है, जैसे – रामायण, महाभारत, देवी-देवताओं की कथाएं। नृत्य में नाटकीयता और शक्ति प्रदर्शन प्रमुख है।

छौ नृत्य की विषय-वस्तु-

छौ नृत्य के विषय अक्सर भारतीय महाकाव्यों और पुराणों से लिए जाते हैं जैसे, भगवान शिव और पार्वती की कथा, राम-रावण युद्ध, अर्जुन का धनुर्विद्या प्रदर्शन, देवी दुर्गा और महिषासुर का युद्ध।

संगीत और वाद्ययंत्र- छौ नृत्य के मुख्य वाद्ययंत्र हैं ढोल, धुमसा, शहनाई, नगाड़ा, महुरी, और झांझ। इनकी ध्वनि युद्ध, उल्लास या नाटकीय माहौल उत्पन्न करती है।

मुखौटे और पोशाक- मुखौटे स्थानीय कारीगर मिट्टी, पेपर-माशी, और कपड़े से बनाते हैं। हर देवता या राक्षस का मुखौटा अलग शैली में होता है। पोशाकें रंगीन और भारी होती हैं।

यूनेस्को मान्यता-

2010 में यूनेस्को ने "छौ नृत्य" को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage of Humanity)  के रूप में मान्यता दी है।

महत्व- 

छौ नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की पहचान, ग्रामीण समाज का सामूहिक उत्सव और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है।



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