Saturday, 27 September 2025

अब भी सीखने का नायाब मंच है अखबार

हर साल गर्मियों की छुट्टी में हमारे संस्थान में 15-20 बच्चे इंटर्नशिप करने आते हैं। कुछ साल पहले तक सिर्फ दिल्ली और यूपी के बच्चे आते थे अब जयपुर, भोपाल आदि दूर के शहरों से भी आने लगे हैं। कभी-कभी तो दक्षिण भारत के राज्यों के भी एक-दो बच्चे आ जाते हैं। इनमें हर लेबल के बच्चे होते हैं यानी फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर और फाइनल ईयर के होते हैं। डिग्री की पढ़ाई करने वाले और डिप्लोमा कोर्स कर रहे बच्चे दोनों होते हैं।

इनसे जब पूछा जाता है कि आगे क्या करना है तो दस में से आठ बच्चों का जवाब होता है-
चैनल में एंकर बनना है।
जब पूछा जाता है कि एंकर ही क्यों बनना है तो ज्यादातर बच्चे इसका स्पष्ट जवाब नहीं दे पाते हैं।
फिर उनसे पूछा जाता है कि चैनल में जाना है तो अखबार में क्यों आए?
उनके पास इसका स्पष्ट जवाब होता है।
वे कहते हैं - कुछ समय अखबार में काम करके सीखना है, काम को समझना है ताकि चैनल में कोई दिक्कत नहीं हो।
यानी अब पत्रकारिता के अधिकतर छात्रों का सपना अखबार में नौकरी करना नहीं है, चैनल में जाना है।  बच्चे अखबार को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। छात्रों को पता है कि चैनलों में उन्हें सीखने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए एक-दो साल अखबारों में काम करके पत्रकारिता की बारीकियों को समझ लेना जरूरी है। अखबारों में काम के दौरान उन्हें सीखने का भरपूर अवसर भी मिलेगा और सिखाने वाले भी मिल जाएंगे।

निष्कर्ष
पत्रकारिता में चाहे जैसी भी एआई तकनीक या रोबोट रिपोर्टर आ जाए, सीखने-सिखाने का गुरुकुल तो अखबार ही बना रहेगा।
#journlism #newspaper #AI
#Robot

No comments:

Post a Comment

AI का तूफ़ान: कौन बचेगा, कौन बहेगा

 AI कोई धीमी आंधी नहीं है, यह एक ऐसा तूफ़ान है जो दुनिया के हर पेशे, हर दफ्तर और हर स्क्रीन को हिला रहा है। आज की सबसे ईमानदार सच्चाई यही है...