Tuesday, 12 August 2025

जानवरों की सल्तनत में घुसपैठिए इंसान





बंगलुरु में अनेक आकर्षणों में से एक है बनेरगट्टा बॉयोलॉजिकल पार्क। इसे आम बोलचाल में बनेरगट्टा चिड़ियाघर भी कहते हैं। यह बनेरगट्टा नेशनल पार्क से अलग है। यह पार्क 2002 में अस्तित्व में आया। इसे बंगलुरु बनेरगट्टा बॉयोलॉजिकल पार्क (बीबीबीपी) का नाम दिया गया है। बंगलुरु से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित लगभग 731 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह पार्क एक व्यापक वन्यजीव और पर्यटन स्थल है जिसमें जू, सफारी, तितली पार्क और रेस्क्यू एवं पुनर्वास केंद्र शामिल हैं। 

अपनी इस बंगलुरु यात्रा के दौरान हमने यहां के जानवरों से मुलाकात की। हिरण, चीतल, सांभर, मगरमच्छ, चीता, बाघ-बाघिन, शेर-शेरनी, हाथी-हथिनी को देखा। इसमें पूरा एक दिन गुजारा। सफारी के अलावा तितलियों के मुहल्ले में भी समय बिताया। चिड़ियाघर के जीव-जंतुओं से भी मिले। जानवरों की खासी संख्या के साथ-साथ चिड़ियाघर में पक्षियों का एक बड़ा सा इलाका भी है।

इन सबमें खास सफारी लगा जिसमें आप पिंजरे में कैद होते हैं और सभी जानवर अपने-अपने घरों में सामान्य जीवन गुजार रहे होते हैं। सर्कसों में शेर, बाघ, चीता, भालू या हाथी को देखने और जंगल सफारी में इन्हें देखने में जमीन आसमान का अंतर है। इन्हें देखकर एक चीज का अहसास बार-बार हुआ कि हमारी गाड़ियों को देखकर इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। सड़क किनारे सोया हुआ भालू गाड़ी की आवाज सुनकर भी नहीं जागा। सड़क किनारे बैठे जंगल के राजा शेर की भी ऐसी ही प्रतिक्रिया रही। मानो वह जता रहा हो कि वह यहां का राजा है, इसलिए हमारे आने-जाने से उसे फर्क नहीं पड़ता। मानो यह भी कह रहा है, इस इलाके में बचना तुम्हें है। हम तो राजा हैं, हम क्यों किसी की परवाह करें। कुछ ऐसा एटिट्यूड बाघ और बाघिन ने भी दिखाया। बाघ हमें पेड़ों के झुरमुटों में सोया हुआ मिला। हमारी गाड़ी जब तक वहां खड़ी रही, उसने सिर नहीं उठाया। मानो वह भी कह रहा हो, रे मानव, तेरे लिए हम अपनी दोपहर की नींद खराब नहीं करेंगे। मुझसे मिलना है तो बाद में आना। हम निराश होकर आगे बढ़ गए। इस बॉयोलॉजिकल पार्क का एक बड़ा आकर्षण है सफेद बाघ यानी व्हाइट टाइगर। उसने भी यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वह भी जंगल के बॉस सिंडिकेट का बोनाफाइड सदस्य है‌। वह भी हमें सोया हुआ मिला। हमारे आने-जाने से उसको भी कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, तेंदुआ हमें जरूर टहलता हुआ मिला। लेकिन फिर भालू ने एटिट्यूड दिखाई। भालू सड़क पर सोया हुआ था और सोया ही रहा। हमारी गाड़ी में सवार हर व्यक्ति ने इत्मीनान से भालू का दीदार किया। उसकी तस्वीरें खींचीं, वीडियो बनाया लेकिन भालू ने सिर उठाने की जहमत नहीं उठाई। हमें हाथियों के झुंड मिले, उछल-कूद मचाते सियार भी मिले। झुंड के झुंड हिरण मिले, चीतल, सांभर और नीलगाय भी समूह में मिले। मगरमच्छ भी पानी से बाहर धूप में लेटे दिखाई पड़े। 

इस तरह से सफारी का सफर जब पूरा हुआ तब तक हम यहां के सारे सदस्यों से मिल चुके थे। लेकिन किसी भी जानवर ने हमें भाव नहीं दिया क्योंकि यह उनकी दुनिया है और हम वहां घुसपैठियों की तरह पहुंचे थे। वे सभी अपने-अपने घरों में थे, हम उनके घर घूमने गए थे। यह अच्छा ही हुआ कि किसी ने हम पर ध्यान नहीं दिया। यदि शेर ने ध्यान दे दिया होता तो क्या होता? 





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