इमानदार बदहवास है
अपने मन का दास है
इनके लिए जज़्बात है
उनके लिए बकवास है।
कलम का दमदार है
हिम्मत का सरदार है
झूठों की इस बस्ती में
सच का तलबगार है।
कलम उठाई, सच की ख़ातिर
हर जख़्म को आवाज़ दी
जो दब गया भीड़ के नीचे
उस पीड़ा को पहचान दी।
दिन न देखा, रात न देखी
बस आंखों में अलख जली
कभी सड़क, कभी अदालत
हर मोर्चे पर क़लम चली।
मत पूछो अब इस मौसम में
कितना सच वह कह पाता है
पहरे, पर्दे, रोक-टोक को
कितना सह अब पाता है
इधर न झांको, उधर न ताको
कितना टिक अब पाता है
सच कहने की जुर्रत करके
कितना साबुत रह पाता है।
-श्रीचंद्र
२७.०७.२०२५
No comments:
Post a Comment