Friday, 4 July 2025

हिंदी के लिए हम दो क्यों दबाएं

मैं जब भी किसी कंपनी के कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव या बैंक के एक्जीक्यूटिव से बात करता हूं तो उधर अंग्रेजी में बोले गए वेलकम वाक्य का जवाब हिंदी में देता हूं। हिंदी सुनते ही उधर की आवाज एकदम तनाव रहित हो जाती है। आवाज में एक अनौपचारिक मिठास आ जाती है और पूरा माहौल अपना सा लगने लगता है। ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी में बोले गए वाक्य का जवाब अंग्रेजी में देने में मुझे कोई परेशानी है। 

फिर मैं ऐसा क्यों करता हूं। 

मैं ऐसा इसलिए करता हूं ताकि व्यावसायिक बातचीत बिल्कुल रूखा न रहे। इसमें देशज मीठापन घुल जाए, थोड़ा अपनापन उभर आए। यकीन मानिए ऐसा ही होता है। मेरे हिंदी में बोलते ही सामने वाला अनायास सहज हो जाता है। उसकी आवाज की सहजता को आसानी से महसूस किया जा सकता है। विडंबना यह है कि जिस भाषा में बात करने से सुकून मिलता हो, उसके लिए कंपनियों ने दो का बटन निर्धारित कर रखा है। 

इसलिए मैं चाहता हूं कि इस तरह की हर बातचीत हिंदी में की जाए ताकि कंपनियां की ओर से जो ऑटोमैटिक आवाज आती है - हिंदी के लिए दो दबाएं, इसे बदलकर हिंदी के लिए एक दबाएं कर दिया जाए। 

भारत में हिंदी को अपनाने से मना करने वाले बहुत लोग हैं। पूरा का पूरा प्रांत हिंदी के विरोध में कमर कसकर तैयार बैठा रहता है। इसके वाबजूद देश में हिंदी बोलने और समझने वाले हर जगह हैं। जहां हिंदी विरोधी नारे लगते हैं, वहां भी हिंदी बोलने और समझने वाले मिल जाएंगे। फिर भी हर कंपनी और कारपोरेट में हिंदी के लिए दो दबाने को ही कहा जाता है। आपने इस मुद्दे पर कभी विचार किया है। नहीं किया है तो करिए और सोचिए कि हम हिंदी बोलने वाले हिंदी के लिए दो क्यों दबाएं।

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