Saturday, 12 July 2025

कंटेंट के 'मॉल' क्यों बन गए आज के अखबार

अखबार और मीडिया अब सिर्फ़ खबरें नहीं, बल्कि योग, खाना पकाना, फिटनेस टिप्स, सुंदर और स्मार्ट दिखने के तरीके, बीमारी को दूर रखने के उपाय, बच्चे पालने की कला, बच्चों को पढ़ाने का हुनर और यहां तक कि जीवन के हर तरह के काम सिखाने लगे हैं। अखबारों में जनरल नॉलेज की क्लास भी लगती और अंग्रेजी सिखाने की भी। कुछ अखबारों में यह काम सीरीज में किया जाता है ताकि जिस पाठक ने आज पढ़ा है, वह कल भी पढ़े। कुछ अखबारों में बजाप्ता क्लास लगाई जाती है जिससे पाठकों को जोड़े रखने की कोशिश की जाती है। अखबारों में पहेलियां भी दी जाती है और उसका रिजल्ट अगले दिन के संस्करण में दिया जाता है। कुछ अंग्रेजी अखबार अंग्रेजी शब्दों का ज्ञान दिया जाता है। कुछ अखबारों में विज्ञान पढ़ाया जाता है। अखबारों में चुटकुले भी होते हैं और व्यंग्य सामग्री भी। राजनीतिक कटाक्ष भी होते हैं और सामाजिक चिंतन भी। धर्म-कर्म अखबारों का बहुत पसंदीदा विषय है। इस विषय पर पुराने समय से अखबारों में सामग्री दी जाती रही है लेकिन आज के समय में इसे और भी बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है। धार्मिक यात्राओं पर पूरा पैकेज दिया जाता है। ऐसा लगता है कि अखबार या चैनल अंगुली पकड़कर अपने पाठकों को धर्मस्थलों का दर्शन करा रहे हों। अखबार वाले महिलाओं और बच्चों को भी टारगेट बनाते हैं। महिलाओं के लिए खास कंटेंट तैयार किया जाता है जिसमें सुंदर दिखने से लेकर स्वस्थ रहने तक का पैकेज होता है। बच्चों के लिए होमवर्क से लेकर करियर तक का गाइडलाइंस दिया जाता है। 

सुडोकू और क्रॉसवर्ड अखबारों का पुराना माल है। अब इसे और भी रोचक तरीके से और अलग-अलग फार्मेट में प्रस्तुत किया जाता है। कार्टून स्ट्रिप पहले अंग्रेजी के अखबारों में होते थे लेकिन अब हिंदी के अखबारों में भी इसका चलन शुरू हो गया है। फिल्म समीक्षा तो बहुत पहले से अखबारों में दी जाती रही है। अब अखबारों में यह भी बताया जाता है कि कौन सी फिल्म देखने लायक है और कौन सी देखने लायक नहीं है। इस तरह से अखबार अब फिल्मों का भविष्य भी बनाते हैं। एक तरह से कहा जा सकता है कि अखबार या न्यूज चैनल कंटेंट के 'मॉल' बन गए हैं, जहां हर तरह का कंटेंट परोसा जाता है। हर आयु वर्ग के लिए कंटेंट दिया जाता है।

कंटेंट की विविधता 

अखबारों की कोशिश होती है कि वे हर तरह का माल परोसें ताकि हर तरह की रुचि वाले पाठकों का वर्ग जुड़ सके। हर अखबार अपने-अपने पाठक वर्ग के हिसाब से फीचर कंटेंट तैयार करते हैं। इसके लिए थोड़ा रिसर्च भी किया जाता है। अखबार अपने-अपने प्रिंट एरिया में रहने वाले पाठक वर्ग के हिसाब से कंटेंट भी तैयार कराते हैं। इस कवायद के पीछे पाठक समूह को आकर्षित करने और उन्हें लंबे समय तक जोड़े रखने का लक्ष्य होता है। अखबारों की बढ़ती संख्या के कारण कंटेंट की जंग जबरदस्त होती जा रही है। 

पाठकों को जोड़े रखने का लक्ष्य 

इसका मतलब यह है कि अब पाठकों को लुभाने में सिर्फ खबरों की ही भूमिका नहीं होती है। तो क्या खबरों की ताकत कम हो रही है। खबरों की ताकत कम नहीं हो रही है बल्कि खबरें सर्व सुलभ हो गई हैं। खबरों के लिए लोग अब किसी एक माध्यम पर निर्भर नहीं हैं। खबरों के असंख्य माध्यम हैं। इसलिए पाठकों को जोड़ने रखने के लिए अखबारों या चैनलों को तरह-तरह के पैकेज देना होता है। पाठकों को जोड़े रखने में लाइफस्टाइल के इन पैकेजों की बड़ी भूमिका होती जा रही है। योग, रोग, भोग आदि के ये कंटेंट पैकेज पाठकों की संख्या बढ़ाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

कंटेंट का बढ़ता दायरा 

दिनों-दिन कंटेंट का दायरा बढ़ता जाता है। अब पर्यावरण भी एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। अखबारों में पर्यावरण से संबंधित सामग्री भी दिखाई देने लगी है। कुछ जगहों पर इसे लेकर स्थायी कॉलम से लेकर पूरे पेज की सामग्री भी दी जाने लगी है। एआई के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर अखबारों में भी सामग्रियों को परोसा जा रहा है। 

इन सबके पीछे असली जंग रीडरशिप या व्यूअरशिप बढ़ाने की होती है। टीआरपी की जंग में कोई चैनल पीछे नहीं रहना चाहता है। इसी तरह आईआरएस के सर्वे में हर अखबार अपने को नंबर वन साबित करना चाहता है। इस जंग में पत्रकारिता के असली मूल्यों के खो जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। जैसे-जैसे जंग तेज होती जा रही है, वैसे-वैसे पत्रकारिता के मूल्यों के गौण हो जाने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। इससे बचने का रास्ता निकालने की जरूरत है वरना पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों के खो जाने का डर है। 

#journalism #values #content 


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