Saturday, 21 June 2025

नए जमाने की पत्रकारिता का जंतर-मंतर

जंतर-मंतर क्या है। सांप और बिच्छू का जहर उतारना हो, किसी की बुरी नजर उतारनी हो तो जंतर-मंतर की जरूरत पड़ती है। इसके लिए ओझा-गुणी को खोजना पड़ता है। फिर उसे मनाना पड़ता है। दान-दक्षिणा देना होता है। फिर शुरू होती है जंतर-मंतर की फूंक। लेकिन पत्रकारिता में कैसा जंतर-मंतर। कौन ओझा-गुणी। कैसा दान-दक्षिणा। 

पुराना समय होता है मैं यह कहता कि निष्पक्ष रहकर, स्वतंत्रता और निर्भीकता से रिपोर्टिंग करो, खबरें लिखो, प्रेस कॉन्फ्रेंस में ठोककर सवाल पूछो। यह मत देखो कि सामने
कौन है। कोई जवाब न दे तो फिर पूछो। तब तक पूछो जब तक जवाब नहीं मिल जाता क्योंकि सवाल पूछना तो पत्रकारिता का बुनियादी हक है और जवाब देना हर किसी की जिम्मेदारी। सवाल पूछना पत्रकारिता का काम भी है और फ़र्ज़ भी। इसलिए फ़र्ज़ निभाते रहो। यही पत्रकारिता का सबसे बड़ा मंत्र है। पत्रकारिता में इससे बड़ा ओझा-गुणी कोई नहीं है। 

लेकिन यह पुराना समय नहीं है। नया समय है, नया युग है। इस युग का जंतर भी अलग है और मंतर भी। इस युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता काम करती है, असली बुद्धि आराम करती है। अब कृत्रिम मेधा से कैसे कहूं कि ठोककर सवाल पूछो, ठोककर लिखो और जमकर पत्रकारिता करो। वैसे भी इस समय देश और समाज में विकास और निर्माण की आंधी चल रही है। हर कोई विकास के गीत गाए जा रहा है। इसलिए आज विकास ही जंतर है और विकास के रास्ते में कोई सवालिया रोड़ा नहीं अटकाना ही मंतर है। अभी सवाल पूछे नहीं जा सकते क्योंकि सवाल पूछना संदेह पैदा करना माना जाता है और संदेह करना अपराध जैसा माना जा रहा है। इसलिए आज के समय की पत्रकारिता का जंतर-मंतर और ओझा-गुनी इस प्रकार हो सकते हैं- 

- सवाल मत पूछो। यदि पूछना जरूरी है तो वही सवाल पूछो जिसका जवाब सबको पता है। यानी कोई ऐसा सवाल मत पूछो जो बवाल पैदा करे। 

- जितना दिखता है उतना ही जानो। इसके आगे जानने की ललक को दबाकर रखो। ललक की झलक बाहर नहीं निकलनी चाहिए क्योंकि यदि यह बाहर निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। 

- अपने काम से काम रखो। दूसरों के मामले में तांक-झांक नहीं करो। पत्रकारिता कर रहे हो तो पत्रकारिता करो। पत्रकारिता को जांच एजेंसियों में तब्दील मत करो। 

- मीडिया में रहने के लिए इसके अनुरूप व्यवहार भी करो। मीडिया का धर्म है अपने पाठकों को घटनाओं से अवगत कराना है। पाठकों को घटनाएं बताओ, घटना के पीछे की कहानी नहीं। ध्यान रहे कि यह सिर्फ उपदेश नहीं आज का वास्तविक ज्ञान है। 

- पत्रकारिता को नौकरी समझो और इसे नौकरी की तरह करो। यह मत समझो कि मीडिया में हो तो समाज को बदल दोगे। समाज बदलने की जिम्मेदारी किसी और ने उठा ली है। 

इस जंतर-मंतर को याद रखो। अच्छे से नौकरी करो, वेतन लो और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम गुजारो। कभी-कभी पहाड़ों की सैर पर भी निकला करो। इससे पता चलेगा कि दुनिया में चोटियां और भी हैं।

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