टूट चुका है हेडलाइन का अनुशासन
हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तब हैंड कंपोजिंग का जमाना था। खबरें हाथ से कंपोज किए जाते थे। लोहे के अक्षरों को जोड़ कर वाक्य बनते थे और फिर खबर और फिर पेज़। उस समय तय होता था कि सिंगल कॉलम की खबर की हेडिंग, 18, 20 या 24 प्वाइंट में जाएगी, डबल कॉलम की खबर की हेडिंग 30 से 48 प्वाइंट में जाएगी। पेज वन की लीड खबर 70-80 प्वाइंट में जाएगी। रूटीन खबरों की लीड है तो 70-72 प्वाइंट में जाएगी और यदि लीड में कोई बड़ी घटना या दुर्घटना हो तो 80 प्वाइंट की हेडिंग लगेगी। अंदर के पेजों की लीड खबर के लिए 65 प्वाइंट तय था।
यह भी तय था
इसी तरह यह भी तय होता था कि डबल कॉलम खबर की हेडिंग दो लाइन में जाएगी। तीन और तीन कॉलम से ज्यादा की खबर की हेडिंग एक लाइन में जाएगी। सिर्फ हर पेज की लीड खबर अपवाद थी। लीड तीन कॉलम में हो या चार कॉलम में, हेडिंग दो लाइन में जा सकती है लेकिन पांच और उससे अधिक कॉलम की लीड की हेडिंग एक लाइन में लेना मस्ट था। इन नियमों को किसी भी हाल में तोड़ा नहीं जा सकता था। इन्हें तोड़ने वाले चीफ सब एडिटर को कमजोर माना जाता था। इतनी छूट अवश्य मिली हुई थी कि एक लाइन की हेडिंग के साथ नीचे एक लाइन में सब हेड दे सकते थे या ऊपर एक लाइन में फ्लैग दे सकते थे। लेकिन किसी खबर में फ्लैग और सब हेड दोनों को अच्छा नहीं माना जाता था।
फायदा
इसका सबसे बड़ा फायदा तो यह था कि पेज संतुलित रहता था। देखने में अच्छा लगता था और खबरों को उनकी हैसियत के हिसाब से डिस्प्ले मिलता था। सबसे बड़ी बात शीर्षकों का अनुशासन बना रहता था। हर पेज पर एक जैसा संतुलन बना रहता था। लेकिन इस तरह के शीर्षकों की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि इसमें समय और मेहनत बहुत लगती थी। हेडिंग में पूरी कहानी नहीं, खबर का निचोड़ होता था।
तब अंगुलियों पर गिने जाते थे अक्षर
पुराने समय में चीफ़ सब एडिटर या अन्य पेजों के प्रभारी अंगुलियों पर गिन कर हेडिंग बनाते थे। उसका कारण यही था कि एक कॉलम में शब्दों की संख्या प्वाइंट साइज के हिसाब से तय होती थी और हेडिंग को उसी हिसाब से बनाना पड़ता था।
समय बदला तो बदल गई हेडलाइन
लेकिन जब समय बदला तब अंगुलियों पर शब्द गिनने की कला ही लुप्त हो गई। आज के हिंदी अखबारों को देख लीजिए। तीन कालम तो छोड़िए अब तो आठ कालम की खबर की हेडिंग भी दो लाइन में लगती है। इसके ऊपर फ्लैग और फिर नीचे सब हेड लगा दिया जाता है। इसके बाद भी डेस्क का मन नहीं भरता है तो चार क्रासर भी लगा दिए जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि खबर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती है।
कभी-कभी हास्यास्पद स्थिति तब हो जाती है जब फ्लैग, हेडिंग, सब हेड आदि की ऊंचाई खबर की ऊंचाई से ज्यादा हो जाती है। देखने में तो भद्दा लगता ही है, पाठकों को खबर पढ़ने में भी दिक्कत हो जाती है।
मल्टी डेकर हेडिंग
इसलिए डबल डेकर तो छोड़िए अब हेडिंग मल्टी डेकर होती हैं और कोई एतराज़ नहीं करता है क्योंकि पत्रकारिता में इस बात को जानने वाले बहुत कम लोग बचे हैं जिन्हें यह पता हो कि हेडलाइन का अनुशासन भी होता है, खबरों के वजन के हिसाब से हेडलाइन लगाई जाती हैं। नतीजा यह हुआ कि अखबार के पन्नों पर खबरों से ज्यादा हेडलाइन नजर आती हैं। इसके लिए किसी एक अखबार को दोष नहीं दे सकते हैं। आज लगभग सभी अखबारों में ऐसा ही होता है। यह मल्टीमीडिया का जमाना है तो हेडलाइन का मल्टी डेकर बन जाना अचरज पैदा नहीं करता है। बस अफसोस इस बात का होता है कि खबरों पर हेडलाइन भारी पड़ रही हैं। खबरें सिकुड़ रही हैं, हेडिंग फैल रही हैं।
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